
एक बार मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन अपने एक सहायक के साथ आॅफिस में काम कर रहे थे। काम खत्म हो जाने के बाद बहुत सारे कागज मेज पर जमा हो गए। उन सभी को बराबर करके बांधने के लिए आइंस्टीन पेपर क्लिप टूंढने लगे। उन्हें एक जगह व्यवस्थित करके रखना जरूरी था, नहीं तो वे इधर-उधर हो जाते। लेकिन उस समय आइंस्टीन व उनके सहायक को कहीं भी पेपर क्लिप नजर नहीं आ रही थी। आखिर आइंस्टीन को एक खराब सी मुड़ी हुई क्लिप मिली, मगर उसे सीधा करना जरूरी था, तभी वह काम आती। आइंस्टीन उस क्लिप को सीधा करने में जुट गए। काफी देर हो गई। इसी बीच उनका सहायक बाजार जाकर पेपर क्लिप का नया पैकेट खरीद लाया। उसने नई पेपर क्लिप लाकर कागजों में लगा दी, जिससे वह एक जगह जमा हो गए। यह काम करके सहायक अपने काम में जुट गया। एक-दो घंटे में अपना काम खत्म करने के बाद सहायक आइंस्टीन के पास आया तो यह देखकर दंग रह गया कि वह अभी भी उस खराब व मुड़ी हुई क्लिप को सीधा करने में लगे थे। सहायक ने कहा, सर, मुझे पेपरों को क्लिप में लगाए लगभग दो घंटे होने वाले हैं और आप अभी भी इसे सीधा करने में लगे हैं। अब इसकी कोई जरूरत नहीं है। अब तो बहुत सारी नई क्लिप आ गई हैं। अब कई महीनों तक ये क्लिप काम करेंगी। सहायक की बात सुनकर आइंस्टीन बोले, तुम अपनी जगह ठीक हो। लेकिन मैं एक बार जब अपना कोई लक्ष्य तय कर लेता हूं, तो उससे हटना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है। मैं उसे पूरी करके ही रहता हूं। यह सुनकर सहायक दंग रह गया। उसे आइंस्टीन की सफलता का राज समझ में आ गया।


