Saturday, April 11, 2026
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पति की दीघार्यु को वट सावित्री का व्रत रखेंगी सुहागिन

  • वैवाहिक जीवन में सौभाग्य के लिए शिव-पार्वती और सावित्री पूजा का विशेष महत्व

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाती है। इस साल वट सावित्री व्रत शुक्रवार के दिन रखा जाएगा। वट सावित्री व्रत में बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है। वहीं पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बरगद के पेड़ में त्रिदेव का वास होता है। यानी की बरगद में जड़ ब्रह्म जी का, तने में श्रीविष्णु जी का और शाखाओं में शिवजी का वास होता है। नारद पुराण में इसे ब्रह्म सावित्री व्रत भी कहा है।

इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र की कामना के साथ बिना कुछ खाए निर्जल व्रत करती हैं। साथ ही वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा और परिक्रमा कर के सौभाग्य की चीजों का दान करती हैं। ज्योतिषाचार्य मनीष स्वामी ने बताया कि पौराणिक कथाओं के मुताबिक माना जाता है कि वट वृक्ष के मूल यानी जड़ों में भगवान शिव, मध्य में भगवान विष्णु और अग्रभाग में ब्रह्माजी रहते हैं।

इसीलिए वट वृक्ष यानी बरगद को देव वृक्ष भी कहा गया है। इनके साथ देवी सावित्री का वास भी इसी पेड़ में माना जाता है। व्रत वाले दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले उठकर घर की सफाई कर के नहाती हैं। इसके बाद पूजा की तैयारियों के साथ नैवेद्य बनाती हैं। फिर बरगद के पेड़ के नीचे भगवान शिव-पार्वती और गणेश की पूजा करती हैं। इसके बाद उस पेड़ को पानी से सींचती हैं।

21 22

फिर पेड़ पर सूती धागा लपेटती हैं। श्रद्धानुसार कुछ महिलाएं 11 या 21 बार पेड़ की परिक्रमा के साथ धागा लपेटती हैं। परिक्रमा करने के बाद हाथ में भीगा चना लेकर सावित्री सत्यवान की कथा सुनें और फिर भीगा चना, कुछ धन और वस्त्र अपनी सास को देकर उनका आशीर्वाद लें और वट वृक्ष की कोंपल खाकर उपवास समाप्त करें।

वट सावित्री व्रत शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, इस बार अमावस्या तिथि की शुरूआत 18 मई को रात 9 बजकर 42 मिनट पर होगी और इसका समापन 19 मई को रात 9 बजकर 22 मिनट पर होगा। उदयातिथि के अनुसार, वट सावित्री व्रत इस बार 19 मई को ही रखा जाएगा ।

शनि जयंती पर बन रहा गजकेसरी योग

शनि देव को न्याय का देवता कहा जाता है। शनि देव हर जातक को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। शनि दोष लगने से व्यक्ति को जीवन में कई परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है। शनि हिन्दू ज्योतिष में नौ मुख्य ग्रहों में से एक हैं। शनि अन्य ग्रहों की तुलना मे धीमे चलते हैं इसलिए इन्हें शनैश्चर भी कहा जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार शनि के जन्म के विषय में काफी कुछ बताया गया है और ज्योतिष में शनि के प्रभाव का साफ संकेत मिलता है। शनि ग्रह वायु तत्व और पश्चिम दिशा के स्वामी हैं।शास्त्रों के अनुसार शनि जयंती पर उनकी पूजा-आराधना और अनुष्ठान करने से शनिदेव विशिष्ट फल प्रदान करते हैं ।

सूर्य, चंद्र और मंगल हैं शनि के शत्रु

ज्योतिषाचार्य आचार्य मनीष स्वामी ने बताया कि शनि देव सूर्य, चंद्र और मंगल से शत्रुता रखते हैं। बुध, शुक्र शनि के मित्र हैं। गुरु ग्रह के साथ शनि सामान्य रहते हैं। शनि तुला राशि में उच्च का रहता है। इस राशि में शनि की शक्ति बढ़ जाती है। मेष राशि में नीच का यानी कमजोर रहता है। ये ग्रह मकर और कुंभ राशि के यह स्वामी है।

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