Sunday, May 10, 2026
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गुर्जर पर खेला दांव नहीं जमे हाथी के पांव

  • अरसे से किठौर पर गुर्जर प्रत्याशी लड़ा रही बसपा

जनवाणी संवाददाता |

किठौर: किठौर की सियासत से अधिक दिलचस्प है यहां के आवाम की बदलाव नीति। बदलाव की बयार में सियासत यहां कई बार चित होती देखी गई, दिग्गज भी लाज नहीं बचा पाए। यहीं वजह है कि इस सीट पर किसी भी दल या नेता का एकछत्र राज नहीं रहा। किठौर की जनता ने अधिकतर दलों को अपने प्रतिनिधित्व का मौका दिया। मगर यहां हमेशा से गुर्जर पर दांव खेल रही बसपा को अभी यह मुकाम हासिल नहीं हो सका है।

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विधानसभा चुनाव के शुरुआती दौर की बात करें तो 1952 में किठौर से स्थानीय दलित नेता डा. रामजीलाल सहायक कांग्रेस पार्टी से विधायक बनें। उनके बाद 1957 से 1967 तक लगातार दो बार श्रद्धा देवी यहां कांग्रेस से विधायक रहीं। मगर 1967 के चुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के मंजूर अहमद ने श्रद्धा देवी को 16000 मतों से हराया। 1969 में मंजूर अहमद ने सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर 569 मतों से दोबारा जीत दर्ज की। बताया जाता है कि इस चुनाव में मंजूर अहमद ढाई हजार वोटों से पीछे चल रहे थे।

समर्थक उम्मीद तोड़ चुके थे। मगर मंजूर अहमद को विश्वास था कि वह हारेंगे नहीं। अभी उनके मामा का गांव बाकी है और ऐसा ही हुआ। अंत में महलवाला और उनकी ननिहाल जड़ौदा ने उनकी लाज बचा ली। 1974 में भारतीय क्रांतिदल के रामदयाल, एसएसपी के मंजूर अहमद को 3200 मतों से हराकर विधायक बनें।

बताते हैं कि 1975 में घोषित आपातकाल के बाद 1977 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का जानाधार खो गया और प्रदेश में जनता पार्टी की लहर आई। रामदयाल जनता पार्टी के टिकट पर यहां से दोबारा विधायक चुने गए। लेकिन 1980 के विधानसभा चुनाव में स्थिति बदली और किठौर की जनता ने फिर से कांग्रेस पर विश्वास जताते हुए भीम सिंह सीना को विधायक बनाया। भीम सिंह ने लोकदल के सखावत हुसैन को 6000 मतों से हराया।

1985 के चुनाव में डीएमकेपी के प्रभुदयाल 8500 मतों से भीम सिंह को हराकर विधायक बनें। 1989 में जनता दल के परवेज हलीम ने कांग्रेस के सरदार सिंह को 11500 मतों से पराजित किया। उधर, 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद स्थितियां फिर बदलीं और भाजपा के रामकृष्ण वर्मा ने परवेज हलीम को 6000 मतों से हरा दिया। परवेज हलीम ने अपनी हार का बदला 1996 में रामकृष्ण वर्मा से लेते हुए उन्हें 8500 मतों से हराया।

मुकाबले में रही मगर जीत नहीं पाई बसपा

2002 में शाहिद मंजूर ने अपने सियासी सफर का आगाज करते हुए सपा के टिकट पर किठौर से पहला चुनाव लड़ा और तत्कालीन सीटिंग एमएलए परवेज हलीम को 4000 मतों से हराकर विधायक बनें। हालांकि इस चुनाव में मुख्य मुकाबला सपा बसपा के बीच रहा। बसपा के केदारनाथ गुर्जर 3200 वोटों से हारे।

लोकदल तीसरे पायदान पर खिसक गई। इसी तरह 2007 में सपा के शाहिद मंजूर के सामने बसपा के बिजेंद्र सिंह और 2012 में पूर्व मंत्री लखीराम नागर हारे। 2017 के चुनाव में भाजपा के सत्यवीर त्यागी सपा के शाहिद मंजूर को 10,822 वोटों से पराजित कर विधायक बनें। जबकि बसपा के गजराज नागर तीसरे पायदान पर रहे।

बात 2022 की करें तो भाजपा ने सीटिंग एमएलए सत्यवीर त्यागी को पुन: मैदान में उतारा है तो कांग्रेस ने बबीता गुर्जर को। सपा-रालोद गठबंधन ने शाहिद पर विश्वास जताया है, लेकिन बसपा ने यहां केपी मावी को टिकट देकर फिर गुर्जर कार्ड खेला है। अब देखना यह है कि इस बार गुर्जर कार्ड क्या गुल खिलाएगा।

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