Friday, May 15, 2026
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महज वातावरण की नहीं, ये अंत:करण की कहानियां हैं!

RAVIWANI


Sudhanshu Gupta 1 2वरिष्ठ कथाकार और पत्रकार मधुसूदन आनन्द का मानना है कि कहानियों से क्रांति नहीं होती। कहानियां वह जमीन तैयार करती है, जिसपर चलकर आप क्रांति तक पहुँच सकते हैं। वह यह भी मानते हैं कि कहानी में सहजता, सादगी और नैसर्गिकता जरूरी तत्व हैं। 1979 में उनकी पहली कहानी सारिका में प्रकाशित हुई थी। तब से वह निरंतर लिख रहे हैं। बेशक वह कम लिखते हैं, लेकिन उनकी कहानियों के मुरीद आज भी हैं। उनके चार कहानी-संग्रह-करौंदे का पेड़, साधारण जीवन, बचपन और थोड़ा-सा उजाला प्रकाशित और चर्चित हो चुके हैं। उनका पांचवां कहानी संग्रह ‘कब्रिस्तान में कोयल’ (संभावना प्रकाशन) हाल ही में आया है। संग्रह में 15 कहानियां हैं। इनमें अलग-अलग समय का यथार्थ है और उस यथार्थ का बदलते जाना भी है।

निजी तकलीफ को कैसे समाज और दूसरे लोगों की तकलीफ बनाया जा सकता है, यह बात ‘नन्नू की गुड़िया’ कहानी में देखी जा सकती है। कोलोन (जर्मनी) में एक भारतीय परिवार रहता है। उनकी एक छोटी बेटी है नन्नू। उसके पास एक गुड़िया है। नन्नू चंचल है। नन्नू गुड़िया को सुलाती, उसे अपनी किताब पढ़ाती। लेकिन नन्नू दुनिया को छोड़कर चली जाती है। गुड़िया रह जाती है।

अपना दुख यह दंपती अखबार में छपी उन खबरों में तलाशते हैं, जो बताती हैं कि एक गरीब और अकेला असहाय आदमी साइकिल के कैरियर पर बच्चे की लाश लिए जा रहा है, उसे दफनाने के लिए। आनन्द जी मार्मिक कहानियां आमतौर पर नहीं लिखते, लेकिन इस कहानी में नन्नू की मृत्यु का दुख किसी को भी दुखी कर सकता है-करता है। आनन्द जी के सरोकार हाशिये पर रहने वालों से भी गहरे जुड़े हैं। यही वजह है कि वे ‘कब्रिस्तान में कोयल’ जैसी कहानी लिख पाए।

कहानी में वाचक दिल्ली में एक ऐसे दफ्तर में काम करता है, जहां खिड़की से कब्रिस्तान के पेड़ दिखाई देते हैं। अखबार के इस दफ़्तर में वाचक से मिलने आने वाले लोग पेड़ों को देखते हैं तो कहते हैं-क्या हराभरा दृश्य है, सचमुच का। वाचक का मन खुशी से भर जाता है। वह उन्हें नहीं बताता कि इस दृश्य के नीचे कब्रिस्तान है। ‘इस दृश्य के नीचे कब्रिस्तान है’ इस वाक्य के निहितार्थ क्या हो सकते हैं।

क्या लेखक यह संकेत दे रहा है कि जितनी भी खुशहाली दिखाई दे रही है, उसके नीचे दुखों का कब्रिस्तान है या इस वाक्य का अर्थ यह है कि अखबारों की दुनिया लोगों के शवों पर खड़ी है या इस वाक्य का इशारा वर्ग संघर्ष को चित्रित करता है! कहानी में वाचक कोलोन शहर में अपने प्रवास के दौरान कब्रिस्तान देखने जाता है।

वहाँ वह देखता कि कब्रिस्तान के बाहर लोग कॉफी- चाय पी रहे हैं, आइसक्रीम खा रहे हैं। वाचक को लगता है कि आदमी मरने के बाद भी बने रहना चाहता है। कोलोन से, वाचक एक दिन अनायास दफ़्तर के पिछवाड़े के कब्रिस्तान में पहुंच जाता है। कब्रिस्तान में उसे कोयल की मीठी आवाज सुनाई पड़ती है। वह कब्रों को देखता है।

अधिकांश कब्रों पर न किसी का नाम था न पता। न जन्म की तारीख न मरण की तारीख। जैसे अनाम वे जिए। वैसे ही अब यहां मुर्दों की बस्ती में रहते हैं। मरकर वे और भी अप्रसांगिक हुए। कहानी के अंत में वाचक को रूसी कवयित्री मारीना त्स्वेतायेवा की पंक्ति याद आती है: जो कब्रों में सोए हुए हैं क्या वो सच में मर चुके हैं और जो कब्रों के बाहर हैं क्या वे सचमुच जिदा हैं?

चेखव की तरह ही मधुसूदन आनन्द साधारण जीवन से कहानी का विषय चुनते हैं। इनमें सहज किरदार होते हैं, खान-पान, रहन-सहन, मनुष्य के दुख-सुख, उसकी इच्छाएँ-आकांक्षाएं और तकलीफें होती हैं। और होता है बदलता परिवेश। ‘पोर्क’ एक ऐसे परिवार की कहानी है, जो पाकिस्तान से लुटपिट कर गुजरांवाला से भारत आया है। वाचक की एक बुआ(चन्दो) की शादी सरदारों के परिवारों में कर हो जाती है।

सनातनी शाकाहारी परिवार और दूसरी तरफ ‘सब कुछ’ खाने वाले सरदारों का परिवार। यह सांस्कृति मतभेद की कहानी है। विभाजन की पीड़ा भी इसमें दिखाई देती है। सरदारजी की एक दिन सिस्टी सिरकोसिस नामक बीमारी से मौत हो जाती है। कुछ दिन बाद बुआ की भी मौत हो जाती है।

बुआ सरदारजी और अपने बेटे को अन्तिम संस्कार के अधिकार से वंचित करके जा चुकी होती है। ‘कहानी का अन्तिम वाक्य है-पहली बार लगा कि चिता पर चढ़ने से पहले बुआ मुस्कराई थी।’ यह मुस्कराहट मुक्ति की भी हो सकती है और अपने संघर्ष पर विजय की भी। या इस बात की भी कि आखिर मैंने तुम लोगों से बदला ले लिया।

‘देखना’ कहानी में वह देखने के हमारे नजरिये और सौंदर्य बोध पर बात करते हैं। वह कला और कलाकृतियों को देखना और समझना सिखाते हैं तो ‘बड़ा फूल’ कहानी में वह दिखाते हैं कि बच्चों से प्यार न करने वाला व्यक्ति फूलों से भी प्यार नहीं कर सकता। आनन्द जी सुन्दरता को ‘कॉन्स्टेन्ट टर्म’ नहीं मानते।

‘लम्बे बालों वाली लड़की’ में नायक लम्बे बालों वाली एक लड़की को पसन्द करने लगता है। बाद में दोनों की शादी भी हो जाती है। लेकिन एक दिन(लगभग चालीस साल बाद) नायक देखता है कि पत्नी के बाल तेजी से गिर रहे हैं। नायिका कहती है ‘हम दोनों लम्बे बालों को तो याद करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि सृष्टि की तरह हमें भी एक दिन झरना है, नष्ट होना है।

प्रकृति और जीव जन्तुओं के प्रति प्रेम आनन्द जी कहानियों में खूब दिखाई देता है। ‘मेंढक’ कहानी बहूत से जीवों की नष्ट होती जा रही प्रजातियों को बचाने की गुहार है।
मधुसूदन आनन्द छोटे-छोटे वाक्यों से वह पूरा परिवेश रचते हैं। उनकी कहानियों के किरदार भी अमूमन आम लोग ही होते हैं। जीवन की तरह उनकी कहानियां चलती हैं।

कहानी कहाँ है और क्या है यह आपको पूरी कहानी पढ़ने के बाद ही पता चलता है। उनकी कहानियों में ‘जादू’ या ‘चमत्कार’ नहीं होता। लेकिन इतनी ‘क्रिस्प्ड’ होती हैं कि उन्हें सम्पादित किया जाना लगभग असम्भव है। उनकी कहानियां एक स्तरीय भी नहीं होतीं, वह जो बात कह रहे हैं, उसके समानांतर भी बहुत कुछ कह रहे होते हैं।

‘रैंप पर कैटवॉक’ में वह बेहद सहजता से दिखाते हैं कि कैटवॉक जैसे ईवेंट बच्चों पर क्या असर डाल रहे हैं। इसी तरह ‘पिस्तौल’ कहानी में वह दिखाते हैं कि बेरोजगारी किस तरह युवाओं को नक्सलवाद और माओवाद की तरफ धकेल रही है

सांप्रदायिकता का जहर भी पिछले कुछ सालों में भारतीय समाज की जड़ों तक फैलता दिखाई दे रहा है। ‘हसन कहां रहता है?’ कहानी में यह दिखाया गया है कि किस तरह स्कूल के छोटे बच्चों तक के मस्तिष्क में यह जहर डाला जा रहा है। आनन्द जी अपनी स्मृतियों में ठहरे कुछ किरदारों की कहानियां भी कहते हैं। मंगत, बिच्छू और सुरैया का किशोर प्रेमी ऐसी ही कहानियां हैं।

इन कहानियों को पढ़कर आपके जेहन में तीन चार दशक पहले का समय जीवित हो जाता है। साथ ही आनन्द जी इन कहानियों के माध्यम से बदल गए या बदल रहे मूल्यों-यथार्थ को भी पकड़ते हैं। इस संग्रह की कहानियां पढ़ने के बाद लगता है कि मधुसूदन आनन्द की कहानियां महज वातावरण (परिवेश) की नहीं अंतकरण की कहानियां हैं, इसलिए इनका प्रभाव देर तक रहता है।


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