- कोरोना ने बच्चों को किताबों से दूर किया, आंखों की परेशानी भी बढ़ी
ज्ञान प्रकाश |
मेरठ: कोरोना ने पूरी दुनिया की मानसिकता ही बदल दी है। इंसान को जहां मजबूरी में रहना सिखा दिया वहीं बच्चों को मुसीबत में भी डालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। हैरानी की बात यह है कि पहले स्कूलों में प्रधानाचार्य परिसर में किसी छात्र के पास मोबाइल मिलने पर उसे न केवल दंडित करते थे बल्कि उसका मोबाइल जब्त कर लेते थे। कोरोना काल में जब स्कूल कालेज बंद हुए तो स्कूलों ने आॅनलाइन पढ़ाई शुरु की तो बच्चों ने मोबाइल से चिपकना सीख लिया। इससे बच्चों को आंखों की तकलीफ बढ़ने की शिकायतें भी धड़ल्ले से आनी शुरु हो गई है।
मोबाइल पर पहले बच्चों को बिगाड़ने का आरोप लगता था। मां बाप अपने बच्चों के मोबाइल प्रेम से खासे परेशान थे। मोबाइल के दुष्प्रयोग के परिणाम जब सामने आने लगे तो सीबीएसई स्कूलों की संस्था सहोदय ने स्कूल परिसर में मोबाइल के प्रयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था।
छात्र और छात्राएं चोरी छुपे मोबाइल लाकर साइलेंट मोड पर डालकर बातें करते थे, स्कूलों ने इसकी काट ढूंढी और तलाशी अभियान के तहत सैकड़ों मोबाइल पकड़े और अभिभावकों को बुलाकर न केवल जलील किया बल्कि छात्रों को दंडित तक किया जाने लगा लेकिन यह व्यवस्था बाद में स्कूल प्रबंधकों के लिये गले की हड्डी बनने लगी। इस दौरान कोरोना ने हिंदुस्तान में जबरदस्त एंट्री मारी और 22 मार्च से स्कूल कालेज बंद कर दिये गए। हालांकि हाईस्कूल और इंटर के छात्रों को बाद में जरुर बुलाया जाने लगा।
कोरोना काल के 10 महीने में स्कूलों ने बच्चों को आन लाइन पढ़ाना शुरु किया। इसके लिये घर वालों ने बच्चों के हाथों में मोबाइल पकड़ा दिये। बच्चा सुबह दस बजे से लेकर दोपहर साढ़े बारह बजे तक मोबाइल से चिपका रहने लगा। शिक्षकों से डर के मारे बच्चा पूरे समय मोबाइल लेकर कमरे में एक कोने में बैठकर पढ़ाई करने में लग गया। कक्षा एक से लेकर इंटर तक के छात्र और छात्राओं को रोज मोबाइल से जुड़ने की आदत पड़ गई।
आनलाइन टेस्ट और परीक्षा होने के कारण मां बाप ने भी बच्चों को मोबाइल का आदी बना दिया। लगातार मोबाइल देखने से बच्चों की आंखों पर फर्क पड़ने लगा है। पूरे देश में कोरोना काल के कारण हुए शिक्षा के नुकसान का आकलन करने निकले बुकमैन इंडिया के अध्यक्ष अनुज गुप्ता ने बताया कि आनलाइन क्लासेज से बच्चों को फायदा पहुंचाने के नुकसान ही पहुंचाया है।
मोबाइल से चिपके रहने से उसका किताबों के प्रति मोह खत्म तो हुआ ही साथ में अपनी आंखों में परेशानी पाल ली। मेरठ बुकसेलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष आशीष धस्माना और महामंत्री संजय अग्रवाल ने बताया कि इन दस महीनों में बच्चे इस कदर मोबाइल के आदी हो चुके हैं कि उनको किताब खोलने में परेशानी हो रही है। परीक्षा और टेस्ट में मां-बाप ने बच्चों को नकल करना भी सिखा दिया।
अब बच्चों को किताबों से दोबारा जोड़ने में मेहनत करनी पड़ेगी और मोबाइल का आदी बन जाने के कारण नई समस्याएं जन्म ले रही है। नेत्ररोग विशेषज्ञ डा. आशीष जैन का कहना है कि लगातार मोबाइल से चिपके रहने से आंखों पर बुरा असर पड़ता है। खासकर छोटे बच्चों को ज्यादा परेशानी हो रही है।
ईस्टर्न रोड स्थित कृष्णा आप्टिकल के पंकज अग्रवाल ने बताया कि बच्चों के चश्मा लगने की शिकायतें काफी आ रही हैं और कोरोना काल में इस तरह के मामले काफी आए हैं। वहीं जिला अस्पताल के नेत्ररोग विभाग में बड़ों के मुकाबले बच्चों की आंखे ज्यादा टेस्ट कराई जा रही है।

