Tuesday, April 21, 2026
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मीठी मक्का की उन्नत उत्पादन तकनीक

KHETIBADI


मक्का विश्व के लगभग सभी देशों में उगाई जाने वाली फसल हैं जो कि विश्व के सकल खाद्यान्न उत्पादन में एक चौथाई से भी ज्यादा का योगदान देती है। विश्व के कुल मक्का उत्पादन में भारत का 3 प्रतिशत योगदान है। अमेरिका, चीन, ब्राजील एवं मेक्सिको के बाद भारत का पांचवा स्थान हैं। मक्का भारतवर्ष के लगभग सभी क्षेत्रों में उगाया जाता हैं। मक्का मुख्यतया राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, बिहार, हिमाचल प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर तथा उत्तरी पूर्वी राज्यों में उगाई जाती है। मक्का को विश्व में खाद्यान्न फसलों की रानी कहा जाता है क्योंकि इसकी उत्पादन क्षमता खाद्यान्न फसलों में से सबसे अधिक है।

मक्का एक ऐसी फसल है जो विविध परिस्थितियों, जलवायु, मृदा आदि में पूरे वर्ष भर के मौसम में उगाई जा सकती है अपितु यह विविध उपयोगों जैसे दाना, भुट्टा, बेबीकॉर्न, पॉपकॉर्न, चारा आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली विविधता वाली फसल है। इसलिए इसे मीठी मक्का (स्वीट कॉर्न) कहते हैं। इस मक्का को दूधिया अवस्था में ही तोडकर काम लिया जाता है। मीठी मक्का की फसल को परागण के 20 से 22 दिन बाद भुट्टा की तोड़ाई कर लें। स्वीट कॉर्न की खेती वर्ष भर की जा सकती हैं। ये फसल कम समय में तैयार हो जाती है। अत: इससे कम समय में अधिक लाभ कमाया जा सकता हैं। मीठी मक्का के भुट्टे बाजार में काफी महंगे बिकते हैं अत: किसान इसकी खेती कर अधिक मुनाफा एवं पौष्टिक हरा चारा प्राप्त कर सकता है।

भूमि का चुनाव व खेत की तैयारी

मीठी मक्का के लिए रेतीली-दोमट से चिकनी दोमट मिट्टी जिसका जल निकास की उचित व्यवस्था उत्तम रहती हैं। लवणीय व क्षारीय भूमि इसके लिए उपयुक्त नहीं होती हैं। एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करके 2-3 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करें तत्पश्चात पाटा लगाकर खेत को समतल कर लें। अंतिम जुताई के समय 10-15 गाड़ी अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर भूमि में मिला दें।

बीज दर एवं बीजोपचार

मीठी मक्का का बीज हल्का होने के कारण 10-12 किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहता है। अगर अच्छा अंकुरण चाहिए तो बीजों को रात भर पानी में भिगो कर तथा सुबह छाया में सुखाकर बोने से अंकुरण जल्दी हो जाता है। फसल को मृदा व बीज जनित बीमारियों से बचाव हेतु बीज को थाइरम 2.5-3.0 ग्राम/किग्रा की दर से अथवा 4 ग्राम/किग्रा बीज को एप्रोन 35 एसडी नामक कवकनाशी से उपचारित कर बोयें जिससे पौधों में रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ती है। बीजों का उपचार क्लोरोपायरीफॉस 20 ईसी की 5 मिली लीटर या थायोमेथोक्सम 25 ईसी की 6 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करें, इससे दीमक तथा तना छेदक कीटों से पौधों की प्रारम्भिक सुरक्षा होगी। अगर बीजों को ट्राइकोर्डमा 5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से भी उपचरित कर बुवाई करें।

बुवाई का समय

वैसे तो मीठी मक्का की बुवाई दिसम्बर एवं जनवरी माह को छोड़ कर वर्षभर की जा सकती है। लेकिन अच्छा उत्पादन लेने हेतु खरीफ के मौसम में जून-जुलाई एवं रबी में 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर के मध्य कर दें।

बुवाई की विधि

मीठी मक्का बुवाई कतारों या मेढ़ों पर ही करें। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 से 75 सेमी एवं पौधे से पौधे के दूरी 20 से 25 सेमी. रखें, जिससे तुड़ाई में सुविधा रहती है। बीज को 4-5 सेमी गहराई पर बोयें। इसमें पौधे की संख्या 65,000 से 83,000 हजार प्रति हेक्टेयर हो।

उर्वरक प्रबंधन

मीठी मक्का का अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए के लिये नत्रजन 20 किग्रा, फास्फोरस 60 किग्रा, पोटेशियम 40 किग्रा एवं जिंक सल्फेट 25 किग्रा प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। इसमें से नत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस, पोटेशियम व जिंक सल्फेट की पूरी मात्रा बुवाई के समय 10-15 सेमी की गहराई पर कतारों में ऊर कर दें। नत्रजन की शेष आथी मात्रा को 2-3 बार अलग-अलग अवस्थाओं पर दें, जैसे कि पौधे की 8 पत्ती एवं पुष्पन अवस्था।

खपतवार प्रबंधन

मीठी मक्का की फसल तीनों ही मौसम में खरपतवारों से प्रभावित होती है। समय से खरपतवार नियंत्रण न किया जाए तो उपज में 40-50 प्रतिशत तक कमी हो सकती है। बुआई से 30-45 दिन तक क्रांतिक समय माना जाता है। मक्का में प्रथम निराई 3-4 सप्ताह बाद की करें, उसके 1-2 सप्ताह बाद बैलों से डोरा चला कर कतार के बीच की भूमि खोल देने से लाभ होता है। प्रारंम्भिक 30-40 दिनों तक एक वर्षीय घास व चैड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण हेतु एट्राजिन नामक खरपतवारनाशी 1.0 किलो सक्रिय तत्व को 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के तुरंत बाद खेत में छिडकें। छिडकाव के समय मृदा सतह पर पर्याप्त नमी का होना अतिआवश्यक होता है। इसके अलावा एलाक्लोर 50 ईसी (लासो) नामक रसायन 3-4 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 600 लीटर पानी में मिलाकर बोआई के बाद खेत में समान रूप से छिडकने से भी फसल में 30-40 दिन तक खरपतवार नियंत्रित रहते हैं। बाद में उगने वाले खपतवारों के लिये एक बार अन्तराशस्य क्रियाएं करके नियंत्रित किया जा सकता है।

सिंचाई प्रबंधन

खरीफ में यदि वर्षा न हो तो आवश्यकता अनुसार सिंचाई करें। लेकिन रबी के मौसम में 4-6 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। नरमंझरी आने व दाने में दूधिया अवस्था पर सिंचाई अवश्य करें।

अंत: फसल

मीठी मक्का के साथ में खरीफ में कम समय में पकने वाली फसल (सोयाबीन, मूंग एवं उड़द) बोई जा सकती हैं। इसके लिये मक्का की 30-30 सेमी पर दो कतार बोई जाती हैं तथा इसके बाद मूंग, उड़द या सोयाबीन की दो कतारें 30-30 सेमी पर बोयें। मक्का व अरहर को 1:1 कतार के अनुपात में बुवाई की जा सकती है। जिससे बोनस के रूप में अंतरवर्तीय फसल मिल जाती है एवं कीट-बीमारी का प्रकोप कम होता है।

भुट्टों की तुड़ाई

बीज के अंकुरण में लगभग 45-50 दिनों के बाद नर मंजरी आती है और इसके 2-3 दिनों के बाद मादा मंजरी (सिल्क) आती है। खरीफ के मौसम में परागण के 15-20 दिनों के बाद मीठी मक्का के भुट्टों की तुड़ाई की जा सकती हैं। इस अवस्था की पहचान भुट्टे के ऊपरी भाग यानी सिल्क के सूखने से की जा सकती है या इस अवस्था में भुट्टे को नख से दबाने दूध जैसा- तरल प्रदार्थ निकलने लगता है। इसके बाद शर्करा स्टार्च में परिवर्तित होने लगती है जिससे मिठास व गुणवत्ता कम होने लगती है। भुट्टे की तुड़ाई सुबह या शाम करें। हरे भुट्टे को तोड?े के बाद बचे हुए हरे पौधे को चारे के रूप में इस्तेमाल करें।

भुट्टों की तुड़ाई उपरांत प्रबंधन

भुट्टे को तुड़ाई के ठीक बाद संसाधन इकाई या मंडी में पहुंचा दें। भुट्टे को ढेर लगाकर नहीं रखें, बल्कि इसे लकड़ी के डिब्बे या कार्टून आदि में रखें। कमरे के तापमान पर 24 घंटे के अंदर मीठी मक्का के भुट्टे का 50 प्रतिशत या उससे अधिक भाग शर्करा के दूसरे रूप में बदल जाता हैं। अत: इन्हें हाइड्रोकुलिंग पैकेजिंग करके शीत गृह में रखा जाता हैं। भुट्टे को एक जगह से दूसरे जगह ले जाने में भी बर्फ की मदद से ठंडा करके रखें। भुट्टे को प्लास्टिक के ट्रे में भी रखकर ले जा सकते हैं।
-नरेन्द्र कुमावत, नेहा रहंगडाले, शिशुपाल सिंह


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