Wednesday, June 17, 2026
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कर्म, अकर्म और विकर्म

 

Sanskar 6


Ghanshayam Badalकाम व क्रोध मन बुद्धि में सदा बैठे रहते हैं और नित्य शुद्ध ज्ञान को ग्रहण की तरह आच्छादित कर जीवात्मा को मोहित करते हैं। इसलिए मनुष्य न चाहता हुआ भी पाप का आचरण करता है। अत: भलाई इसी में है कि मनुष्य विकर्मों से बचे अन्यथा मोक्ष तो प्राप्त हो ही नहीं सकता, जीते जी भी पूरी संभावना रहती है कि वह अपयश का भागी बनकर जीता है।
कलिकाल को कर्म युग कहा जाता है। इस युग में आत्मा परमात्मा की बजाय कर्मशीलता पर ज्यादा जोर है । ‘नो पेन्स पो गेन्स’ की उक्ति बार बार दोहराई जाती है । पर, भारतीय तो आज भी ‘कर्म कर फल की इच्छा मत कर’ का अनुसरण करते हैं । आखिर है क्या कर्म? कर्म को तीन अलग अलग वर्गों में बांटकर देखा जाना चाहिए ये हैं:- कर्म, अकर्म और विकर्म।
कर्म क्या है?

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गीता में भगवान श्री कृष्ण कर्म की व्याख्या करते हुए कहते हैं-ईश्वर ने जीवों के कर्म के अनुसार सृष्टि की रचना करने का जो संकल्प किया उसका नाम कर्म है अर्थात जैसा कर्म वैसा फल । अत: शास्त्र सम्मत अथवा श्रेष्ठ पुरुषों के समान कर्म करना श्रेष्ठ है। खाली बैठने से कर्म करना श्रेष्ठ है। शुभ कर्म होंगे तो शुभ फल होगा गलत कर्म करेंगे तो फल भी खराब ही मिलना तय मानिए , हां फल मिलने में विलंब हो सकता है पर आज नहीं तो कल फल मिलेगा ही यह भी तय है। कलिकाल में अच्छे कर्म का फल मिलने में वैसे ही ज्यादा वक्त लग सकता है जैसे कि बरगद का पेड़ बड़ा होने में अधिक समय लेता है पर जब वह बड़ा हो जाता है तो दूसरे छोटे छोटे पौधों से कहीं अधिक टिकता है।
क्या है अकर्म ?

कर्महीनता का दूसरा नाम अकर्म है। कर्महीनता संभव नहीं है। हां, हठ पूर्वक कर्महीन बने रहना मूर्खता का लक्ष्ण है। वास्तव में मानव कुछ करने योग्य या फिर करने में कठिन लगने वाले, कष्टदायी कर्म से भाग सकता है। चालाकी से उसे दूसरों पर डालने में कामयाब हो सकता है, धूर्ततापूर्वक उसका फल या श्रेय अपने नाम करने में कुछ समय हेतु सफल हो सकता है, पर वह एकदम कर्महीन रह ही नहीं सकता है। जब तक वह जीता है सांस लेना, पलकें झपकाना, चाहे अनचाहे देखना, सुनना रोक नहीं सकता। अत: कर्महीन होने की कल्पना एक मूर्ख ही कर सकता है।

विकर्म किसें कहें ?

भगवान श्री कृष्ण विकर्म की व्याख्या करते हुए अर्जुन को बताते हैं कि निषिद्ध कर्म ही विकर्म है। स्वभाव के विपरीत कर्म भी, विकर्म हैं। अर्जुन श्री कृष्ण से पूछते हैं, मनुष्य न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है? साधारण मनुष्य गलत रास्ते पर चले तो समझा जा सकता है परंतु विद्वान व्यक्ति भी गलत रास्ते पर चले जाते हैं।

काम व क्रोध मन बुद्धि में सदा बैठे रहते हैं और नित्य शुद्ध ज्ञान को ग्रहण की तरह आच्छादित कर जीवात्मा को मोहित करते हैं। इसलिए मनुष्य न चाहता हुआ भी पाप का आचरण करता है। अत: भलाई इसी में है कि मनुष्य विकर्मों से बचे अन्यथा मोक्ष तो प्राप्त हो ही नहीं सकता , जीते जी भी पूरी संभावना रहती है कि वह अपयश का भागी बनकर जीता है ।

निष्काम कर्म

जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है, अकर्म में कर्म देखता है अर्थात समस्त कर्म करता हुआ निस्पृह भाव से तटस्थ रहता है, कर्म तथा उनके फलों में आसक्त नहीं होता है, ‘तेन त्यक्तेन भुंजिथा’ अर्थात त्यागते हुए भोगता है|

‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ का पालन करते हुए कर्म करता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और समस्त कर्मों को करते हुए भी अकर्ता पुरुष है। वह दम्भ व अभिमान से दूर रहने में कामयाब होकर अनेक पाप विकर्मों से बच जाता है जिससे उसे यश तो मिलता ही है वह जन्म मरण के बंधन से भी मुक्त हो जाता है।

डा घनश्याम बादल


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