
समद की सलाह पर रसीदन चुन्नी की शादी बबलू से करवाने को मन में ही सहमत हो जाती है, लेकिन उससे पहले ही चुन्नी बबलू के साथ कोलकाता भाग जाती है। पूरे उपन्यास में चुन्नी ही एक मजबूत चरित्र के रूप में उभर कर सामने आती है। अमीना का प्रेमी साबिर अपनी मां की तस्वीर लेने ननिहाल जाता है और वहीं का होकर रह जाता है। वह अपने पिता की तर्ज पर शहनाई बजाना सीखने लगता है। जीवन पहले की ही तरह चलता रहता है। हृषीकेश सुलभ ने अमीर खुसरो की अनेक रचनाओं का भी सहज प्रयोग किया है, लोकगीतों और भोजपुरी गीतों का भी इस्तेमाल है, जो उपन्यास को जीवंतता प्रदान करता है।
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हृषिकेश सुलभ का पहला उपन्यास ‘अग्निलीक’ 2019 में आया था। उन्हें नाटक और कहानियां लेखन के लिए जाना जाता है। ‘अग्निलीक’ में सुलभ ने घाघरा नदी के किनारे बसे गांवों की कथा कही है। उन्होंने आजादी के पहले और उसके बाद घाघरा व गण्डक नदियों के आसपास के इलाकों में बा‘ परिवर्तनों को चिन्हित करने के साथ-साथ वहां की सामन्ती संरचना में हो रहे अंदरूनी बदलावों पर भी कलम चलाई थी। जाहिर है इस उपन्यास का कैनवस बड़ा था।
उपन्यास का एक सबसे बड़ा गुण इसकी पठनीयता भी थी। अब 2022 में उनका दूसरा उपन्यास आया है ‘दाता पीर’ (राजकमल पेपरबैक्स)। संयोग से हृषीकेश सुलभ के पते में दर्ज है-पीरमुहानी, कब्रिस्तान के पास। यहां सुलभ कई दशकों से रह रहे हैं तो यह स्वाभाविक है कि कब्रिस्तान में जीवन के सुर-राग भी उन्होंने सुने होंगे। सुलभ ने दाता पीर में इन्हें ही अपना विषय चुना है।
कब्रिस्तान में रहने वाले और कब्रें खोदकर अपना जीवन यापन करने वाले लोगों की तकलीफें और सपने क्या हैं, उनकी दुनिया और जीवन कैसा है, क्या उनकी तरफ कोई ऐसी खिड़की खुलती है, जो उन्हें बाहर की दुनिया से जोड़ सके, क्या कब्रें खोदते समय उनके भीतर भी प्रेम के बीज अंकुरित होते हैं, इन सब सवालों की पड़ताल की है सुलभ ने दाता पीर में। लेकिन इसके समानांतर शहनाई बजाने वाले एक परिवार की भी कथा है। यह कथा सिर्फ एक परिवार की ही कथा नहीं है, बल्कि इसमें आम जनजीवन के विभिन्न चित्र भी दिखाई पड़ते हैं। सुलभ उनके जीवन संघर्षों को उनकी धार्मिक पहचान के नीचे दबने नहीं देते, यह उपन्यास की खास बात है।
अग्निलीक में भी यह बात देखी गई थी कि उप-कथाएं कथाओं में से ही बड़े सहज ढंग से फूटती थीं। यानी उपन्यास में ‘कनेक्टिविटी’ थी। उपन्यास में भी सुलभ यह बखूबी जानते हैं कि दृश्य कहां समाप्त करना है और कहां से खोलना है। संभव है ऐसा नाटककार और रंग समीक्षक होने के कारण होता हो। लेकिन इसी बात से उपन्यास का प्रवाह और पठनीयता बढ़ जाती है। ऐसा लगता है कि हर कड़ी, एक दूसरी कड़ी से जुड़ी है। फिर भी कब्रों, मैय्यतों और कब्रिस्तान का जीवन चित्रित करना खासा ऊबाऊ हो सकता था! लिहाजा उपन्यास में कई प्रेम कहानियां हैं, नशा है, पीर फकीर हैं, दरगाहें हैं, स्मृति की गलियां हैं, खानकाहों-दरगाहों-मजारों और पीर फकीरों की कहानियां हैं। मौसिकी के सदियों पुराने सिलसिले के सुर भी उपन्यास में सुनाई पड़ते हैं।
उपन्यास की नायिका चुन्नी या अमीना को माना जा सकता है। ये दोनों ही अपनी मां रसीदन के साथ कब्रें खोदने का काम करती हैं। चुन्नी कल्लू मियां के लड़के बबलू से इश्क करती है और अमीना साबिर से। फकीर कहे जाने वाले समद की प्रेम कहानी का भी खुलासा होता है। पता चलता है कि वह साथ में पढ़ने वाली जूबी नाम की एक लड़की से प्रेम करता था। लेकिन दोनों का निकाह नहीं हो पाया। जूबी की मौत हो जाती है और समद फकीर बनने के रास्ते पर चल पड़ता है। समद रिश्ते में रसीदन का भाई लगता है।
उपन्यास में प्रेम कहानियां और भी गुंथी हुई हैं, जो उपन्यास में रोचकता और पठनीयता बढ़ाती हैं। उपन्यास में और भी बहुत से किरदार हैं कब्रिस्तान के बाहर ही चाय की दुकान चलाने वाला राधे है, पीएचईडी के ठेकेदार रामसकल शर्मा हैं, मोहन विश्वकर्मा, भोज मिठाई भंडार वाले भोजलाल साह, राम भजन तिवारी, छोटे सिंह और सत्तार मियां हैं। ऐसा लग रहा था कि सुलभ जी का यह उपन्यास सांप्रदायिकता जैसे मुद्दों को भी छुएगा।
लेकिन वह इससे बचकर निकल गए। भूलोटन के बेटे मुन्ना सिंह यादव के माध्यम से राधे मातबर लोगों के साथ एक बैठक करता है। इस बैठक में बबलू (चुन्नी का प्रेमी) की कुटाई और मोहल्ले में आने जाने पर प्रतिबंध लगाए जाने की मांग को लेकर सारे लोग सहमत थे। लेकिन बात आई गयी हो गयी। कोई बहुत जरूरी भी नहीं था कि घटनाओं को सांप्रदायिक रंग दिया ही जाए।
समद की सलाह पर रसीदन चुन्नी की शादी बबलू से करवाने को मन में ही सहमत हो जाती है, लेकिन उससे पहले ही चुन्नी बबलू के साथ कोलकाता भाग जाती है। पूरे उपन्यास में चुन्नी ही एक मजबूत चरित्र के रूप में उभर कर सामने आती है। अमीना का प्रेमी साबिर अपनी मां की तस्वीर लेने ननिहाल जाता है और वहीं का होकर रह जाता है।
वह अपने पिता की तर्ज पर शहनाई बजाना सीखने लगता है। जीवन पहले की ही तरह चलता रहता है। हृषीकेश सुलभ ने अमीर खुसरो की अनेक रचनाओं का भी सहज प्रयोग किया है, लोकगीतों और भोजपुरी गीतों का भी इस्तेमाल है, जो उपन्यास को जीवंतता प्रदान करता है। संगीत की कुछ बंदिशें भी इसमें मौजूद हैं।
एक पुरानी संगीत बन्दिश इस प्रकार है:
गांठ री मैं कौन जतन कर खोलूं,
मोरे पिया के जिया में पड़ी रे।
ऐ गुइयां मोरे पिया के जिया में
दैया रे मोरे पिया के जिया में पड़ी ।
निस्संदेह सुलभ ने ऐसे समाज को लेखकीय आँखों से देखा है, जिसे आमतौर पर हम अनदेखा कर देते हैं। कब्रिस्तान में रहने वाले लोगों के जीवन को सुलभ ने करीब से देखा है और संभवत: उसे ‘जस का तस’ चित्रित किया है। लेकिन उपन्यास पढ़ने के कुछ दिन बाद पाठक की मन:स्थिति क्या होती है, उपन्यास की कौन सी चीजें उसके जेहन को उद्वेलित करती हैं, उसके मन में किस तरह के सवाल उठते हैं, यह जानना भी जरूरी है।
एक पाठक के रूप में मेरे मन में भी जिज्ञासाएं पैदा हुईं। 246 पृष्ठ के इस उपन्यास के लगभग सभी चरित्र अंत तक वैसे ही क्यों रहे जैसे शुरू में थे? चुन्नी जैसी थी, वैसी ही रही, अमीना जैसी थी, वैसी ही रही, रसीदन जैसी थी, वैसी ही रही, सत्तार मियां का किरदार जिस तरह का था, अंत तक वैसा ही रहा, बबलू भी यथावत ही रहा। हां, साबिर जरूर थोड़ा सा बदला, या कह सकते हैं उसका परिवेश बदल गया और वह अपने ननिहाल जाकर शहनाईवादन में लग गया। क्या इस तरह के समाज में चरित्रों में समय के साथ कोई बदलाव नहीं होते, या परिस्थितियां इनमें बदलाव के अवसर ही मुहैया नहीं कराती? या चरित्रों में बदलाव उपन्यास के प्रवाह को प्रभावित करता है?
जबकि अग्निलीक में ऐसा नहीं था। वहां चरित्र ‘ग्रो’ कर रहे थे। बावजूद इन सवालों के हृषीकेश सुलभ का यह नया उपन्यास ‘दाता पीर’ एक अन्चीन्ही और अनदीखी दुनिया की अनेक खिड़कियां खोलता है और पठनीयता तो इस उपन्यास में है ही। कब्रिस्तान में आप प्रेम और जीवन के सुर सुन सकते हैं!
सुधांशु गुप्त


