
माहे रमजान का महीना मुस्लिमों के लिए बड़ा मुकद्दस, मुबारक और बरकतों का महीना है। दुनिया भर के मुसलमानों के लिए इस महीने की बेहद अहमियत है। देश के ज्यादातर हिस्सों में 3 अप्रैल से रमजान के महीने की इब्तिदा हो रही है। पिछले दो सालों से कोरोना वायरस कोविड-19 की वजह से रमजान की नमाज और तरावीह (वह नमाज, जिसमें मस्जिदों के अंदर कुरान सुनाया जाता है।) मस्जिद की बजाय घरों में ही हो रही थीं। अब जबकि इस बीमारी से निजात मिली है, ज्यादातर आबादी का वैक्सीनेशन हो गया है, नमाज और तरावीह पहले की तरह मस्जिदों में पढ़ी जाएंगी। रमजान, इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है। रमजान महीने की अहमियत इसलिए भी है कि इन्हीं दिनों पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब के जरिए कुरान शरीफ जमीन पर उतरा था।
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यही वजह है कि इस पूरे महीने मुस्लिम रोजे रखते हैं और अपना ज्यादातर वक़्त इबादत-तिलावतों (नमाज पढ़ना और कुरान पाठ) में गुजारते हैं।
रमजान माह के रोजे मुसलमानों के लिए फर्ज़ करार दिए गए हैं। रोजों की अहमियत इस मायने में है, ताकि इंसानों को भूख-प्यास का महत्व पता चले। भौतिक वासनाएं और लालच इंसान के वजूद से हमेशा के लिए जुदा हो जाएं और इंसान कुरआन के मुताबिक अपने आप को ढाल लें। रोजा जब्ते नफ़्स यानी खुद पर काबू रखने की तरबियत देता है।
रोजा रखने वालों में परहेजगारी पैदा करता है। लिहाजा रमजान का महीना इंसान को अशरफ और आला बनाने का महीना है। लेकिन यदि कोई सिर्फ अल्लाह की ही इबादत करे और उसके बंदों से मुहब्बत करने व उनकी मदद करने से हाथ पीछे खींचे, तो ऐसी इबादत को इस्लाम ने खारिज किया है।
इस्लाम का पैगाम है, ‘अगर अल्लाह की सच्ची इबादत करनी है, तो उसके सभी बंदों से प्यार करो और हमेशा सबके मददगार बनो।’ पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब ने फरमाया है, ‘रमजान सब्र का महीना है। रोजा रखने में कुछ तकलीफ हो, तो इसे बर्दाश्त करें।’ फिर आपने कहा, ‘रमजान गम बांटने का महीना है।
यानी गरीबों के साथ अच्छा बर्ताव किया जाए। अगर दस चीजें अपने रोजा इफ़्तार के लिए लाए हैं, तो दो-चार गरीबों के लिए भी लाएं। अपने इफ़्तार व सहर के खाने में गरीबों का भी खयाल रखें। अगर आपका पड़ोसी गरीब है, तो उसका खास तौर पर खयाल रखें कि कहीं ऐसा न हो कि हम तो खूब पेट भर कर खा रहे हैं और हमारा पड़ोसी थोड़ा खाकर सो रहा है।’
इस बारे में पैगम्बरे इस्लाम ने यहां तक फरमाया है, ‘जो शख़्स खुद पेट भर खाए और उसके पड़ोस में उसका पड़ोसी भूखा रह जाए, वह ईमान नहीं रखता।’ भूखे का कोई मजहब नहीं होता। जकात, सदका और फितरा बिना किसी भेदभाव के जो भी गरीब, जरूरतमंद हों उनको सबसे पहले दें। अपने आसपास जो गरीब हैं, उनकी दिल खोलकर मदद करें। यही सच्ची इंसानियत और सच्चे मुसलमान का फर्ज है।
वसीमा खान


