- अधिकारियों की जानकारी में आते ही हटाया गया बोर्ड
- कर्मचारियों को सरकारी संपत्ति की जानकारी तक नहीं
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: ये जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने, लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई। कैराना के शायर मुजफ्फर इस्लाम रजमी के इस यादगार शेर की नगर निगम ने याद उस वक्त दिला दी जब रोशनपुर डोरली की एक निजी जमीन पर नगर निगम ने सरकारी संपत्ति का बोर्ड लगा दिया। जब निगम कर्मचारियों की लापरवाही और बेवकूफी की जानकारी नगर निगम के अधिकारियों को हुई तो तत्काल बोर्ड हटा दिया गया। भले ही नगर निगम की तरफ से जानबूझ कर बोर्ड न लगाया गया हो लेकिन भूमि मालिक की प्रतिष्ठा को खतरे में डालने का काम जरुर कर दिया।
रोशनपुर डौरली के खसरा नंबर 18/1 में 4620 मीटर जमीन नगर निगम की है। नगर निगम के कर्मचारियों को अपनी सरकारी जमीनों का पता नहीं कि किस हद तक लोगों ने अवैध कब्जे कर रखे हैं, लेकिन लापरवाही की हद देखिये नगर आयुक्त के आदेश का बोर्ड बजाय सरकारी जमीन पर लगाने का एक प्राइवेट जमीन पर लगा दिया। हैरानी की बात यह है कि जिस जमीन पर बोर्ड लगाया गया उसका क्षेत्रफल सिर्फ 350 मीटर है।

कर्मचारियों ने यह भी देखने की जरूरत नहीं समझी कि जिस जगह पर बोर्ड लगाया जा रहा है। क्या वो 4620 मीटर जमीन है। सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा करवाने में लिप्त इन कर्मचारियों को यह भी नहीं पता होता है कि उनकी अपनी जगह कौन-सी है। सरधना तहसील के अंतर्गत आने वाले रोशनपुर डौरली के सिजरे को देखने की जरूरत भी लापरवाह कर्मचारियों ने नहीं समझी।
गलत बोर्ड लगने की जानकारी जब जमीन के मालिक को हुई तो नगर निगम के अधिकारियों से संपर्क किया गया। कार्यवाहक नगर आयुक्त और संपत्ति अधिकारी ने इसको गंभीरता से लेते हुए न केवल नगर निगम के बोर्ड को हटवाया बल्कि लापरवाह कर्मचारियों को हड़काया था। सवाल यह उठ रहा है कि नगर निगम ने अपनी गलती मानते हुए बोर्ड तो हटवा दिया, लेकिन निजी भूमि पर लगे इस सरकारी बोर्ड का गलत संदेश जो लोगों के बीच जाएगा उसकी भरपाई कौन करेगा। यह तो वही हुआ न नगर निगम के द्वारा लम्हों में की गई गलती सदियों तक भूमि मालिक भुगतता रहे।

