
‘धन्य है आम आदमी’ में 41 व्यंग्यों को संकलित किया गया है। यह तमाम व्यंग्य साहित्य जगत और विशेष रूप से व्यंग्य विधा में सिद्धहस्त रचनाकार फारूक आफरीदी की कलम से निकले हैं। पुस्तक में संकलित प्रत्येक व्यंग्य की एक अलग दास्तान है चाहे अधिकतर व्यंग्य एक ही पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। फारूक आफरीदी के व्यंग्यपढ़ने पर यह भी पता चलता है कि हर व्यंग्य की एक गरिमा है और व्यंग्य लिखने का उद्देश्य भी है।
तमाम घटनाक्रम इस तरह से वर्णित किए गए हैं कि आपके चेहरे पर दृष्टिपात करनेवाले को यह कहना ही नहीं पड़ता,‘स्माइल प्लीज’ क्योंकि आप स्वत: ही मुस्कराते रहते हैं। शीर्षक रचना ‘धन्य है आम आदमी’ में मतदाता को जागरूक बताया गया है, जो कि सच भी है। नेताओं को अब किसी से वोट मांगने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है। वैसे तो आम आदमी को मुफ्त का माल खाने की आदत हो गई है लेकिन यह आम आदमी भी जानता है कि सरकार इसे किसी न किसी तरीके से वसूल लेगी। आम आदमी के आत्मनिर्भर होने की बात भी इसी व्यंग्य में है।
कुल मिलाकर आम आदमी के वोट के बिना नेता जी की जीत मुश्किल लगती है इसलिए नेता लोग लोक-लुभावन की बात कहीं न कहीं से ले आते हैं और तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। वैसे भी देश देख चुका है कि घोषणाएँ अक्सर कागजों तक ही सीमित रहती हैं। इस व्यंग्य के माध्यम से एक मतदाता को सर्वोपरि बताने का भी प्रयास किया गया है जो सच तो है लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी भी है।
अधिकांश व्यंग्यों की पृष्ठभूमि राजनीति है और उसका सबसे बड़ा कारण यह भी है कि व्यंग्यकार ने राजनीति का क्षेत्र नजदीक से देखा है। उनकी पैनी नजर राजनीति के सभी पहलुओं को विभिन्न कोणों से देखने में सक्षम रही है। जहां विसंगति नजर आई, वहीं उन्होंने अपनी कलम चलाई।
राजनीति जैसे गंभीर विषय पर उनके पूर्ववर्ती व्यंग्यकारों ने भी लिखा है लेकिन आफरीदी की भाषा मनोरंजक भी है। भाषा में भक्ति रस भी शामिल है और निंदा रस भी, प्रेम रस भी शामिल है तो रौद्र रस भी।
पुस्तक: धन्य है आम आदमी, लेखक : फारुक आफरीदी, प्रकाशक : कलमकार मंच, जयपुर, मूल्य : 180 रुपये


