
‘जिन्हें जुर्मे-इश्क पे नाज था…’ लिखते हुए पंकज सुबीर के जेहन में वे ढेरों मूलभूत प्रश्न रहे होंगे, जो हर नए दौर में अलहदा संदर्भों से उलझकर नए सिरे से जवाब मांगने लगते हैं। धर्म और समाज, इंसानियत और निजी स्वार्थ, सच और झूठ, हिंसा और सद्भावना, राग और द्वेष, मुहब्बत और नफरत, गोया आदमी की जिंदगी पर सवार हर शै पर चिंतन, विश्लेषण और कोई सहज-स्वीकार्य निष्कर्ष निकालने के प्रयास में लिखा गया है ये उपन्यास।
उपन्यास का एक रोमांचक और कसा हुआ प्लॉट है, जो दंगों की मानसिकता, खौफ और उसके इर्द-गिर्द रक्स करने वाले इंसानी जज्बों का नाटकीय मगर प्रामाणिक दृश्यांकन करता है। रामेश्वर नामक केंद्रीय पात्र पूरे घटना-क्रम का संचालन करता मालूम होता है, पर वह एक व्यक्ति नहीं एक विचार है, जो सदियों से चले आ रहे तमाम उदात्त मानवीय मूल्यों का प्रतीक है। वह धर्म और दर्शन की बारीक मीमांसा करता है, इतिहास के क्रूर पहलुओं का भी मानवीय भाष्य करता है।
वह दृढ़ है, ज़िद्दी और निर्भीक है पर आर्टिकुलेट भी है। वह बांटनेवालों की शातिराना चालों और तर्कों को समझता और उनके जवाब अपने पास रखता है। वह संवेदनहीन व्यवस्था को लेकर सीनिकल भी नहीं है, बल्कि अपने विवेकपूर्ण विचारों के बीज अपने अनुयायियों के जरिए वहां भी बो आने में यकीन करता है। लेखक उसके माध्यम से इस दौर के कठिनतम सवालों में एक पर तार्किक विवेचना कर समाधान खोजने की कोशिश में है।
इस उपन्यास में वर्णित एक अवश्यम्भावी दंगे को रोकने के बेहद रोमांचक घटनाक्रम में इस समाधान की रूपरेखा की एक झलक तो मिल ही जाती है। दंगों की पृष्ठभूमि में सामयिक ज्वलंत प्रश्नों को पूरे विस्तार से समुचित ऐतिहासिक हवाले देकर हर जुड़े पहलू को खंगालती कोई और ऐसी कहानी हाल में मैंने नहीं पढ़ी।
इसमें बहता हुआ विमर्श और उसका निष्कर्ष हर विवेकशील व्यक्ति को अपने ही विचारों का प्रतिबिम्ब लगेगा। इसके लिए पंकज के गहन शोध, तार्किक दृष्टि और सहज प्रस्तुति का कायल होने से नहीं बचा जा सकता।
पुस्तक : जिन्हें जुर्म-ए-इश्क पे नाज था, लेखक : पंकज सुबीर, प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सीहोर, मूल्य: 200 रुपये
कमलेश पांडेय


