Thursday, March 19, 2026
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चने को नुकसान पहुंचा रहा है नया रोग

 

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देश के कई राज्यों में बड़े पैमाने पर चने की खेती होती है। वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि जलवायु परिवर्तन से भविष्य में चने के पौधों की जड़ सड़न जैसी मिट्टी जनित बीमारियों के होने की आशंका बढ़ सकती है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि पिछले कुछ वर्षों में चने की फसल में शुष्क जड़ सड़न बीमारी का प्रकोप बढ़ा है। जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ते तापमान वाले सूखे की स्थिति और मिट्टी में नमी की कमी से ये बीमारी तेजी से बढ़ती है।

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यह रोग चने की जड़ और धड़ को नुकसान पहुंचाता है। शुष्क जड़ सड़न रोग से चने के पौधे कमजोर हो जाते हैं, पत्तियों का हरा रंग फीका पड़ जाता है, ग्रोथ रुक जाती है और देखते-देखते तना मर जाता है। अगर ज्यादा मात्रा में जड़ को नुकसान होता है, तो पौधे की पत्तियां अचानक मुरझाने के बाद सूख जाती हैं।
क्लाइमेट चेंज की वजह से जैसे-जैसे तापमान बढ़ा रहा है और मिट्टी में नमी कम हो रही है।

इसके साथ ही कई नई बीमारियां आने लगी हैं, जो पहले नहीं देखी जाती थी। मैक्रोफोमिना फेजोलिना नाम के रोगाणु के कारण चने में जड़ सड़न रोग होता है, यह एक एक मिट्टी जनित परपोषी है। फसल में फूल और फल लगते हैं तो उस समय अगर तापमान बढ़ता और मिट्टी में नमी कम हो जाती है तो इस रोग से चने में काफी नुकसान होने लगता है, इससे पौधे हफ्ते 10 दिन में सूखने लग जाते हैं।

वैज्ञानिकों ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे राज्य जहां पर चने की खेती ज्यादा होती है, वहां पर किसानों से बात की। वैज्ञानिकों ने पाया है कि इस बीमारी से इन राज्यों में फसल का कुल 5 से 35 प्रतिशत हिस्सा संक्रमित होता है। वैज्ञानिकों ने देखा कि जब तापमान 30 डिग्री से ज्यादा और नमी 60 प्रतिशत से कम है तो यह बीमारी ज्यादा बढ़ती है।

चने में इस रोग का पता लगाने की शुरुआत वैज्ञानिकों ने साल 2016-17 में की थी, जब उन्हें पता चला कि चने में नई बीमारी लग रही है। विश्व में चने की खेती लगभग 14.56 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल में होती है, जिसका वार्षिक उत्पादन 14.78 मिलियन टन होता है, जबकि भारत में चने की खेती लगभग 9.54 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में होती है, जोकि विश्व का कुल क्षेत्रफल का 61.23 प्रतिशत है।

वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि मैक्रोफोमिना पर्यावरण की परिस्थितियों की एक विस्तृत श्रृंखला में जीवित रहता है। यहां तक कि तापमान, मिट्टी के पीएच और नमी की चरम स्थिति में भी यह जिंदा रह सकता है। भविष्य में इस रोगजनक की विनाशकारी क्षमता की संभावित स्थिति जानने के लिए यह शोध किया गया है। वैज्ञानिक अब रोग का प्रतिरोध करने के क्षेत्र में विकास और बेहतर प्रबंधन रणनीतियों के लिए इस अध्ययन का उपयोग करने के तरीके की तलाश कर रहे हैं।

-डॉ. ममता शर्मा


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