Wednesday, March 4, 2026
- Advertisement -

घाटे का सौदा सिद्ध हो रहे बांध

Samvad


PANKAJ CHATURVEDIअभी तो सावन की पहली फुहार ने ही धरती को सुवासीत किया था कि गुजरात और महाराष्ट्र पानी पानी हो गया। इसमें कोई शक नहीं कि गुजरात के शहरों में विकास और नगरीकरण स्तरीय है लेकिन अहमदाबाद से ले आकर नवसारी तक सब कुछ एक बरसात की झड़ी में ही पानी में धुल गया। महाराष्ट्र के वे हिस्से जो अभी एक हफ्ता पहले एक एक बूंद तो तरस रहे थे, अब जलमग्न हैं। इन दोनों प्रदेशों की जल कुंडली बांचें तो लगता है कि प्रकृति चाहे जितनी वर्षा कर दे, यहां की जल-निधियां इन्हें सहेजने में सक्षम हैं। लेकिन अंधाधुध रेत-उत्खनन, नदी क्षेत्र में अतिक्रमण, तालाबों के गुम होने के चलते ऐसा हो नहीं पा रहा है और राज्य के चालीस फीसदी हिस्से में शहर में नदियां घुस गई हैं। इससे बदतर हालात तो तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के हैं। गोदावरी नदी अब गांव-नगरों में बह रही है। जहां आधा देश अभी बारिश की बात जोह रहा है, कुछ राज्यों, खासकर गुजरात में कुदरत की नियामत कहलाने वाला पानी अब कहर बना हुआ है। जब बांध के दरवाजों से अकूत जल निधि छोड़ी तो गांव डूबे और खासकर गुजरात में तो जब बांध भर गए तो उस पानी की पिछली मार (बेक वाटर) से भी जम कर बर्बादी हुई।

जरा बारीकी से देखें तो इस बाढ़ का असल कारण वे बांध हैं जिन्हें भविष्य के लिए जल-संरक्षण या बिजली उत्पापन के लिए अरबों रूपए खर्च कर बनाया गया था। किन्हीं बांधों की उम्र पूरी हो गई है तो कहीं सिल्टेज है और कई जगह जलवायु परिवर्तन जैसे खतरे के चलते अचानक तेज बरसात के अंदाज के मुताबिक उसकी संरचना ही नहीं रखी गई। जहां-जहां बांध के दरवाजे खोले जा रहे हैं या फिर ज्यादा पानी जमा करने के लालच में खोले नहीं जा रहे, पानी बस्तियों में घुस रहा है। संपत्ति का नुकसान और लोगों की मौत का आकलन करें तो पाएंगे कि बांध महंगा सौदा रहे हैं।

बाढ़ स्थिति की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक यदि असम और पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़ दें तो करीब एक करोड़ लोग बाढ़ से प्रभावित हो चुके हैं। अकेले गुजरात और महाराष्ट्र में जल भराव से मरने वालों की संख्या ढेढ़ सौ पार कर चुकी है। ये मौतें असल में पानी के बस्ती में घुसने या तेज धार में फंसने के कारण हुई हैं। अभी तक बाढ़ के कारण संपत्ति के नुकसान का सटीक आंकड़ा नहीं आया है, लेकिन सार्वजनिक संपत्ति जैसे सड़क आदि, खेतों में खड़ी फसल, मवेशी, मकान आदि की तबाही करोड़ो में ही है।

महाराष्ट्र के भंडारा में एक तरफ भारी बरसात है तो दूसरी तरफ लबालब भर गए बांध। यहां गोसीखुर्द बांध के 27, मेडीगड्डा बांध के 65, इरई और बेंबला बांध के दो-दो दरवाजें खोल दिए गए हैं, जिससे अनेक नदी-नालों में बाढ़ आ गई है। बाढ़ के कारण सैकड़ों गांव संपर्क क्षेत्र से बाहर हैं। हजारों हेक्टेयर क्षेत्र की फसलें बर्बाद हो गर्इं। पिछले तीन दिनों से गड़चिरोली जिले में बाढ़ का प्रकोप जारी है। नालों में बाढ़ की स्थिति निर्माण होने से जिले के बाढ़ग्रस्त 11 गांवों के 129 परिवारों के 353 लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया है। जिले के विभिन्न स्थानों पर कुल 35 मकान धराशायी होने की जानकारी मिली है।

गुजरात में पंचमहाल जिले के हालोल क्षेत्र में देव नदी डैम के 6 दरवाजे आंशिक तौर पर खोलने के बाद वडोदरा की वाघोडिया तहसील के 19 व डभोई तहसील के 7 गांव के लोगों को घर बार छोड़ कर भागना पड़ा है। बांधों में जलस्तर बढ़ रहा है। नर्मदा बांध का जलस्तर क्षमता के मुकाबले अब 47.71 फीसदी हो गया है। राज्य के इस सबसे बड़े बांध में सात दिनों में सात फीसदी जलसंग्रह बढ़ा है। अन्य प्रमुख 206 बांधों में क्षमता का 33.61 फीसदी जल संग्रह हो गया है। हाल में 18 बांधों में 90 फीसदी से अधिक संग्रह होने पर हाइअलर्ट हैं। जबकि आठ में 80 फीसदी से अधिक और 90 फीसदी से कम संग्रह होने पर अलर्ट और 11 बांधों में 70 फीसदी से अधिक और 80 फीसदी से कम संग्रह है, इन बांधों को सामान्य चेतावनी पर रखा है।

जिस सरदार सरोवर को देश के विकास का प्रतिमान कहा जा रहा है, उसे अपनी पूरी क्षमता से भरने की जिद में उसके दरवाजे खोले नहीं गए और सरदार सरोवर बांध स्थल से मध्य प्रदेश के धार जिले के चिखल्दा तक नर्मदा नदी की दिशा विपरीत हो गई है। नदी पूर्व से पश्चिम की तरफ बहती है, लेकिन अब पश्चिम से पूर्व की तरफ बह रही है।

द एशियन डेवलपमेंट बैंक के अनुसार भारत में प्राकृतिक आपदाओं में बाढ़ सबसे ज्यादा कहर बरपाती है। देश में प्राकृतिक आपदाओं के कुल नुकसान का 50 प्रतिशत केवल बाढ़ से होता है। बाढ़ से 65 साल में लोगों की मौत 1,09,414 हुई और 25.8 करोड़ हेक्टेयर फसलों को नुकसान हुआ। अनुमान है कि कुल आर्थिक नुकसान 4.69 लाख करोड़ का होगा। कभी इसका अलग से अध्ययन हुआ नहीं लेकिन बारिकी से देखें तो सबसे ज्यादा नुकसान बांध टूटने या दरवाजे खालने से आई विपदा से हुआ है। मौजूदा हालात में बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों का त्रासदी है। बड़े बांध जितना लाभ नहीं देते, उससे ज्यादा विस्थापन, दलदली जमीन और हर बरसात में उससे होने वाली तबाही के खामियाजे हैं। यह दुर्भाग्य है कि हमारे यहां बांधों का रखरखाव हर समय भ्रष्टाचार की भेट चढ़ता है।

ना उनकी गाद ठिकाने से साफ होती है और ना ही सालाना मरम्मत। उनसे निकलने वाली नहरें भी अपनी क्षमता से जल-प्रवाह नहीं करतीं क्योंकि उनमें भरी गाद की सफाई केवल कागजों पर होती है। कुछ लोग नदियों को जोड़ने में इसका निराकरण खोज रहे हैं। हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के ऊंचाई-स्तर में अंतर जैसे विषयों का हमारे यहां कभी निष्पक्ष अध्ययन ही नहीं किया गया और इसी का फायदा उठा कर कतिपय ठेकेदार, सीमेंट के कारोबारी और जमीन-लोलुप लोग इस तरह की सलाह देते हैं। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना, नदियों को उथला होने से बचाना, बड़े बांध पर पाबंदी, नदियों के करीबी पहाड़ों पर खुदाई पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेड़छाड़ को रोकना कुछ ऐसे सामान्य प्रयोग हैं, जो बाढ़ सरीखी भीषण विभीषिका का मुंह-तोड़ जवाब हो सकते हैं।

पानी इस समय विश्व के संभावित संकटों में शीर्ष पर है। पीने के लिए पानी, उद्योग, खेती के लिए पानी, बिजली पैदा करने को पानी। पानी की मांग के सभी मोर्चों पर आशंकाओं और अनिश्चितताओं के बादल मंडरा रहे हैं । बरसात के पानी की हर एक बूंद को एकत्र करना व उसे समुद्र में मिलने से रोकना ही इसका एकमात्र निदान है। इसके लिए बनाए गए बड़े भारी भरकम बांध कभी विकास के मंदिर कहलाते थे। आज यह साफ हो गया है कि लागत उत्पादन, संसाधन सभी मामलों में ऐसे बांध घाटे का सौदा सिद्ध हो रहे हैं।


janwani address 4

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

Holi 2026: क्यों खेलते हैं होली पर रंग? जानें इसके पीछे के सांस्कृतिक कारण

नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत...

Chandra Grahan 2026: ग्रहण समाप्ति के बाद तुरंत करें ये 5 काम, जीवन में सुख-शांति का होगा वास

नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत...

US: टेक्सास में गोलीबारी में भारतीय मूल की छात्रा समेत चार की मौत, 14 घायल

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: अमेरिका के टेक्सास राज्य की...
spot_imgspot_img