Saturday, April 25, 2026
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आखिर कैसे हो बाघों की सुरक्षा?

Nazariya 22


ALI KHANबाघ, जंगल की शान माना जाता है। यह वन्यजीव अपनी शक्ति और खूबसूरती के लिए विश्व प्रसिद्ध है। जंगल की सुरक्षा भी बाघ के हाथ में होती है। जिस जंगल में बाघ मौजूद हों, वहां के दूसरे वन्यजीव और वनस्पतियां सुरक्षित रहते हैं क्योंकि बाघों के भय से शिकारी जंगल में प्रवेश नहीं करते। लेकिन चोरी-छिपे शिकार, अवैध तस्करी और अन्य मानवीय गतिविधियों के चलते जंगलों से बाघों की संख्या कम हो रही है। यह चिंताजनक है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण यानी एनटीसीए के मुताबिक, भारत में 2021 में कुल एक सौ छब्बीस बाघों की मौत हुई, जो एक दशक में सबसे ज्यादा है। साल 2021 के 29 दिसंबर तक एनटीसीए के आंकड़ों के मुताबिक, मरने वाले एक सौ छब्बीस बाघों में से 60 संरक्षित क्षेत्रों के बाहर शिकारियों, दुर्घटनाओं और मानव-पशु संघर्ष के शिकार हुए हैं। गौरतलब है कि भारत में बाघों की स्थिति-2018 की गणना के मुताबिक, भारत 2967 बाघों का घर था। देश में बाघों की आबादी के मामले में पहले स्थान पर मध्यप्रदेश (526), दूसरे स्थान पर कर्नाटक (524), उत्तराखंड (442) तीसरे और महाराष्ट्र (312) तथा तमिलनाडु (264) क्रमश: चौथे और पांचवें स्थान पर रहे थे। उल्लेखनीय है कि एनटीसीए ने 2012 से सार्वजनिक रूप से बाघों के मौत के आंकड़ों को रखना शुरू किया। साल 2021 में एनटीसीए के मुताबिक, मध्य प्रदेश में 42 बाघों की मौत की पुष्टि हुई, महाराष्ट्र में 26 बाघों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और कर्नाटक में 15 बाघों का काल के गाल में समा जाना, साथ ही साथ उत्तर प्रदेश से 9 मौतें दर्ज होना वाकई बेहद चिंताजनक है।

आंकड़ों की मानें तो इससे पहले 2016 में बाघों के मौतों की संख्या लगभग 121 रही थी, जो साल 2021 में होने वाली मौतों के तकरीबन बराबर रही। जबकि 2020 में दर्ज 106 बाघों की मौत की तुलना में 2021 में 126 बाघों की मौत लगभग 20 फीसदी की वृद्धि दिखाती है। पर्यावरण मंत्रालय ने कहा है कि वर्ष 2012 से 2021 के दौरान देश में हर साल औसतन 98 बाघों की मौत होती रही है। लेकिन इस साल के आंकड़ों ने चिंता बढ़ा दी है, विशेषज्ञों ने कठोर संरक्षण प्रयासों की मांग की है, विशेष रूप से उन्होंने वन रिजर्व जैसे स्थानों को और अधिक सुरक्षित बनाने की जरूरत पर जोर दिया है। हालांकि विशेषज्ञों ने चेताया है कि मरने वाले बाघों की संख्या अधिक भी हो सकती है, क्योंकि जंगलों के अंदर प्राकृतिक मौतों की एक बड़ी संख्या के बारे में अक्सर रिपोर्ट नहीं की जाती है।

इस बीच आम-आदमी के मस्तिष्क में इस सवाल का कौंधना स्वाभाविक है कि आखिर सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद भारत में बाघों की मौत के मामले लगातार क्यों बढ़ रहे हैं? हर साल 29 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जाता है, बावजूद इसके बाघों की आबादी की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सरकारें नाकाम क्यों साबित हो रही हैं? हालांकि राहत भरी खबर यह है कि पिछले कुछ सालों से बाघों की आबादी में लगातार इजाफा हुआ है। मालूम हो कि खाद्य श्रृंखला में बाघ शीर्ष के जीवों में से एक है, जिस पर पूरा पारिस्थितिकी तंत्र निर्भर करता है। ऐसे में पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने के लिए बाघों का संरक्षण बहुत ही आवश्यक है।

जैसा कि बाघ एक अम्ब्रेला स्पीशीज है, लिहाजा इसके संरक्षण के जरिए अनगुलेट्स यानी खुर वाले जीव, परागणकारी जीव और अन्य छोटे जानवरों की कई अन्य प्रजातियों का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सकता है। लेकिन चिंताजनक पहलू यह है कि पिछले 100 वर्षों में वैश्विक स्तर पर बाघों की आबादी में भारी गिरावट देखने को मिली है और कई क्षेत्रों में बाघों की आबादी पूर्णतया समाप्त हो चुकी है। इसी कारण प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ यानी आईयूसीएन ने बाघों को लुप्तप्राय प्रजातियों की लाल सूची में वर्गीकृत किया है।

दु:ख की बात यह है कि आज भी बाघों का शिकार शक्ति प्रदर्शन के लिए किया जा रहा है। साथ ही बाघों के शरीर के प्रत्येक हिस्से का बाजार में अच्छा मूल्य प्राप्त करने के लिए अवैध शिकार की प्रवृत्ति में इजाफा हुआ है। इसके अलावा जनसंख्या वृद्धि, औद्योगिक विकास और अनियंत्रित शहरीकरण के कारण वन्य जीवों के प्रवास क्षेत्र का लगातार ह्रास हो रहा है। लिहाजा मानव और प्रकृति के दरम्यान दिनों-दिन संघर्ष बढ़ता ही जा रहा है। हमारे देश में रॉयल बंगाल टाइगर का सबसे बड़ा घर कहे जाने वाले पश्चिम बंगाल के सुंदरबन इलाके में भी इंसानों और बाघों के बीच संघर्ष लगातार तेज हो रहा है। आबादी के बढ़ते दबाव और पर्यावरण असंतुलन की वजह से सुंदरबन लगातार सिकुड़ रहा है। इसके चलते आसपास रहने वाले लोग बाघ की चपेट में आ रहे हैं। तेजी से कटते जंगल की वजह से बाघों का यह घर यानी जंगल लगातार सिकुड़ रहा है। एक हालिया अध्ययन में इलाके के मैंग्रोव जंगलों के तेजी से घटने पर चिंता जताते हुए कहा गया था कि हालात पर अंकुश नहीं लगाया गया तो वर्ष 2070 तक सुंदरबन में बाघों के रहने लायक जंगल नहीं बचेगा। इस इलाके में भोजन की तलाश में बाघ अक्सर जंगल से बाहर निकलकर बस्तियों में पहुंचते रहते हैं। इस दौरान अपनी जान बचाने के लिए लोग कई बार इन जानवरों को मार देते हैं।

इस पर विशेषज्ञों का कहना है कि मानव-पशु संघर्ष को कम करने के लिए बेहतर संरक्षण योजनाओं को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। जानवर के लिए अन्य जंगलों में प्रवास के लिए एक स्पष्ट मार्ग सुनिश्चित किया जा सकता है। साथ ही, आज मानव-पशु संघर्ष के कारण बाघों की मौत को टालने के लिए तत्काल सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है।


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