
मनुष्य अपने जीवन में सर्वत्र विकास एवं सुखमय जीवन जीने की चेष्टा रखता है। परंतु उसकी इन्द्रियां वासनाओं के वशीभूति होकर उसके आत्मबोध को नष्ट कर देती हैं, जिसके चलते मनुष्य के चिंतन, चेतन क्षीण हो जाते हैं। उसके द्वारा किए जा रहे कर्म दूषित हो जाते हैं, जिससे उसे चारों ओर आशंका, अविश्वास, अवरोध, घृणा, असंतोष और उद्वेग के रूप में फुफकारती वातावरण को विषक्तता घेरे रहती है। आत्मबोध हीन इन्द्रियां विषदंतविहीन सर्प की भांति प्रतीत होती हैं। जिस प्रकार से विषदंतविहीन सर्प से कोई भय नहीं रह जाता है, उसी प्रकार से बोधहीन व्यक्ति है। आत्मबोध की पहली सीढ़ी यह है कि लोकचिंतन की अवांछनीयता को समझा जाए।
अब तक के ढर्रों पर लुढ़कती हुई मान्यताओं के औचित्य को अस्वीकार किया जाए। आत्मबोध कोई दैवी शाक्ति, वरदान, जादू या किसी बाबाओं द्वारा सुझाया गया चमत्कार नहीं है। यह सिर्फ उस मान्यता और उपासना का नाम है, जो अपने स्वरूप को सही अर्थों में खुद को समझने का अवसर, सामर्थ्य प्रदान करती है कि हम अपने पिछले ढर्रों को बदलकर एक नए सिरे से वस्तुस्थिति के अनुरूप सोचने की एक पद्धति अपना कर खुद को कार्यान्वित करती है। मनुष्य जीवन को आत्मबोध प्राप्ति हो जाने से उसके मस्तिष्क की सोच में एक नई ऊर्जा का आगाज होती है। ये ऊर्जा मनुष्य को सुखशाक्ति, शांत प्रदान करती हंै। अंधकार रूपी जीवन प्रकाश में परिणित होते देर नहीं लगती। आत्मबोधी मनुष्य इच्छाओं के अनवरत प्रवाह से विचलित नहीं होते। जिस प्रकार से नदियों के जल के निरंतर प्रवेश करते रहने और सदा भरते रहने पर भी समुद्र शांत रहता है, ठीक इसी प्रकार से आत्मबोधी मनुष्य होता है। -अजय प्रताप तिवारी


