Wednesday, March 4, 2026
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17 अक्टूबर को सात बजकर 25 मिनट के बाद नवरात्रें आरंभ व दीप पूजा : पंडित ललित शर्मा

  • पहले दिन अश्व पर आएंगी माता
  • नवरात्रे आरंभ व कलश स्थापन के लिए सूर्याेदय के बाद दस घड़ी तक या माध्याह में अभिजित मुहूर्त का समय

जनवाणी ब्यूरो |

बिजनौर: धर्मग्रन्थों एवं पुराणों के अनुसार शारदीय नवरात्र मां दुर्गा की आराधना का श्रेष्ठ समय होता है। नवरात्र के पावन दिनों में प्रत्येक दिन मां के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा उपासना की जाती है। इस वर्ष शारदीय नवरात्र 17 अक्टूबर शनिवार से आरंभ हो रहे हैं।

इस वर्ष मां दुर्गा का वाहन अश्व होगा। शास्त्रानुसार मां प्रत्येक नवरात्रि के प्रथम दिन अलग अलग वाहनों पर सवार होकर भक्तों को आर्शीवाद देने आती है।

धार्मिक संस्थान विष्णुलोक के ज्योतिषविद् पंडित ललित शर्मा ने बताया कि सूर्योदय के बाद दस घड़ी तक या मध्याह में अभिजित मुहूर्त के समय आश्विन शुक्ल प्रतिपदा में नवरात्रारंभ व कलश स्थापन किया जाता है। प्रतिपदा तिथि की प्रथम 16 घड़ियां तथा चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का पूर्वद्धिभाग घटस्थापना के लिए वर्जित काल है।

इस वर्ष प्रतिपदा तिथि की प्रथम 16 घड़ियां 17 अक्तूबर को प्रात लगभग 7 बजकर 25 मिनट के बाद ही घटनास्थापन, नवरात्रारभ दीप पूजन करना चाहिए। शारदीय नवरात्रि स्थापना से लकर दशहरा तक का समय अत्यंत पवित्र और उत्साह से परिपूर्ण होता है।

इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा बड़े ही भक्तिभाव से की जाती है। उन्होंने बताया कि नवरात्रि के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह है कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधिया है, जिनमें से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते है।

इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियां बढ़ती है। इस समय स्वस्थ रहने के लिए शरीर कोे शुद्ध रखनें के लिए और तन, मन को निर्मल व पूर्णत स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम नवरात्र है।

नवरात्रों में कुमारी पूजा का फल

पंडित ललित शर्मा ने नवरात्र में कुमारी पूजा के फल के बारे बताया कि अष्टमी या नवमी वाले दिन नौ कन्याओं का पूजन करें। पूजा विधि से दो से दस साल वर्ष तक की कन्यायें ही आमंत्रित की जानी चाहिए।

दो वर्ष की कन्या जिसे कुमारी कहा जाता है, उसकी पूजा से धन, आयु व बल की वृद्धि होती है। तीन वर्षीय कन्या जिसे त्रिमूर्ति कहते है, के पूजन से अर्थ, काम, मोक्ष की प्रप्ति होती है। चार वर्षीय कन्या जो कल्याणी कहलाती है, के पूजन से विद्या, विजय और राज्य सुख निष्कंटक प्राप्त होता है।

पांच वर्षीय कन्या जिसे रोहिणी कहा जाता है के पूजन से रोगों का नाश होता है। छह वर्षीय कन्या कालिका कहलाती है, इसके पूजन करने से शत्रु का शमन होता है। सात वर्षीय कन्या जिसे चंडिका कहते है, के पूजन से ऐश्वर्य और धन की प्रप्ति होती है। आठ वर्षीय कन्या जिसे शम्भवी के पूजन से दुख, दारिद्रय हटता है।

नौ वर्षीय कन्या जो दुर्गा कहलाती है, के पूजन से समस्त मनोरथ पूर्ण होते है। इस प्रकार विधि-विधान से देवी का पूजन, हवन, कुमारी पूजन और ब्राह्मण भोजन इन चार कार्यों से नवरात्रि व्रत पूरा होता है।

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