Thursday, March 26, 2026
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मायाजाल की भूल

Amritvani


बालक एकनाथ स्वभावत: श्रद्धावान तथा बुद्धिमान थे। देवगढ़ के जनार्दन स्वामी की विद्वत्ता, सदाचार और भक्ति देखकर इतने प्रभावित हुए कि एकनाथ उनके शिष्य हो गए। गुरु ने उन्हें आश्रम के हिसाब-किताब का काम सौंप दिया। एक दिन जब एकनाथ जी ने हिसाब और रोकड़ का काम किया तो एक पाई की कमी नजर आई। खूब सोचने के बाद आखिरकार उन्हें आधी रात को एक पाई का हिसाब मिला तो वे खुशी से चिल्ला उठे , खुशी से उछलते हुए, उन्होंने उसी समय अपने गुरुजी को जाकर यह बात बताई।

इस पर गुरु हंसे फिर बोले, बेटा! एक पाई की भूल मिलने से तुम इतने प्रसन्न हो और इस संसार के मायाजाल जैसी महाभूल को अपनाए हुए हो। इस पर कभी सोचा है? यह सुनते ही एकनाथ जी के भीतर वैराग्य जागा और दुनिया के कामकाज से उनका मोहभंग हो गया। उन्होंने उसी समय सब कुछ त्याग कर, अपने गुरु से दीक्षा लेकर पर्वत पर जाकर तपस्या करने लगे।

तपस्या के बाद वे अपनी जन्मभूमि के निकट पिपलेश्वर महादेव में रहने लगे। पर थोड़े ही समय बाद वे गृह संन्यासी बन गए। एकनाथ जी ने गुरू के आदेशानुसार अन्न दान और प्रभु कीर्तन जारी रखा। एक दिन कीर्तन में कुछ चोर घुस आए। उन्होंने घर का सभी सामान समेट लिया। फिर उन्होंने देवमूर्ति के आभूषण चुराने का प्रयास किया। वहीं एकनाथ जी ध्यानमग्न बैठे थे।

उन्होंने चोरों से कहा, तुम्हें इनकी बहुत अधिक आवश्यकता होगी अन्यथा इतनी रात गए भला कोई जोखिम क्यों उठाता? यह कहते हुए उन्होंने अपनी उंगली की अंगूठी भी उतार कर उन्हें दे दी। यह देख चोर बहुत लज्जित हुए। वे एकनाथ जी के चरणों में गिर गए और उन्होंने फिर कभी चोरी न करने का संकल्प लिया।

प्रस्तुति: राजेंद्र कुमार शर्मा


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