Monday, March 30, 2026
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अंतर से रिश्ता

Amritvani


साईं बुल्ले शाह 17वीं-18वीं शताब्दी के सूफी फकीर हुए हैं। बुल्ले शाह का असली नाम अब्दुल्लाह शाह था जो बदलते बदलते बुल्ले शाह हो गया। अपने गुरु हजरत इनायत शाह के पास पहुंचने से पहले भी बुल्लेशाह कोई ना कोई रूहानी अभ्यास किया करता थे।

जब जिज्ञासु बुल्ले शाह, साईंनाथ की बगीची के निकट पहुंचे तो देखा कि सड़क के किनारे लगे वृक्ष आमों से लदे हुए थे और निकट ही साईं जी प्याज की पनीरी लगा रहे थे। बुल्लेशाह ने बिस्मिल्लाह कहकर आमों की और दृष्टि डाली तो आम अपने आप धड़ाधड़ नीचे गिरने शुरू हो गए।

साईं जी ने पीछे मुड़कर देखा कि बिना कारण आम गिर रहे हैं। साईं जी शीघ्र समझ गए कि यह सामने खड़े नवयुवक की शरारत है। साईं जी ने उसकी और देखकर कहा, क्यों जवान! आम क्यों तोड़े हैं? बुल्लेशाह, साईं जी के समीप जाकर कहने लगा, साईं जी, ना तुम्हारे पेड़ों पर चढ़े, ना कोई कंकर पत्थर फेंका, मैंने तुम्हारे फल कैसे तोड़े?

साईं जी बोले, अरे! चोर भी और चतुर भी। तूने आम नहीं तोड़े तो और किसने तोड़े हैं? दृष्टि पड़ते ही बुल्ला साईं जी के चरणों पर गिर पड़ा। साईं जी ने पूछा, अरे तेरा क्या नाम है और तू क्या चाहता है? बुल्ले ने कहा, जी मेरा नाम बुल्ला है, मैं रब को पाना चाहता हूं।

साईं जी ने कहा, अरे तू नीचे क्यों गिरता है, ऊपर उठ और मेरी ओर देख। ज्यों ही बुल्ले सिर उठाकर हजरत इनायत शाह की ओर देखा, उन्होंने उसी तरह प्यार भरी दृष्टि डाली और कहा, बुल्ल्या! रब्ब दा की पौना, एधरों पुटना, ते उदरों लाना।

इसका अर्थ था रूह को बाहर और संसार की ओर से मोड़कर अंतर में परमात्मा की ओर जोड़ने से है। क्योंकि रूहानियत कहती है रब तेरे अंदर है, जरा अंदर झांक कर तो देख। बाहर से नाता तोड़ और अंतर से नाता जोड़ फिर देख रब कैसे मिलता है।

प्रस्तुति: राजेंद्र कुमार शर्मा


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