Friday, May 1, 2026
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दुनिया में ध्यानचंद से होती थी भारत की पहचान 

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राकेश थपियाल
एक समय था, जब अंग्रेजों ने हमें गुलामी की बेड़ियों में बुरी तरह जकड़ा हुआ था। तब दुनिया भर में भारत की पहचान महात्मा गांधी, ध्यानचंद और हॉकी से होती थी। हम हॉकी में ओलंपिक चैंपियन थे। 1928 से 1980 के बीच हॉकी में हमारे आठ स्वर्ण पदक जीतने के ओलंपिक रिकॉर्ड की बराबरी कोई नहीं कर सका है। इसके अलावा भारत के पास ध्यानचंद के रूप में हॉकी का ऐसा हीरा भी  रहा जिसने अपने जादुई खेल की चमक से अनेक वर्षों तक हॉकी जगत को चमत्कृत किए रखा। उन दिनों हॉकी खेलने वाला हर देश यह सपना देखता था कि काश उसके पास ध्यानचंद होता। विश्व में ध्यानचंद को बतौर खिलाड़ी जितना प्यार और सम्मान मिला उतना किसी अन्य हॉकी खिलाड़ी को नहीं मिला। वह हॉकी के बेताज बादशाह थे। मेजर ध्यानचंद के नाम पर देश-विदेश में जितनी मूर्तियां, सड़क, और स्टेडियम हैं उतने किसी अन्य हॉकी खिलाड़ी के नाम पर नहीं मिलेंगे।
मेजर ध्यानचंद का जीवन शुरू से अंत तक संघर्ष की कहानी रहा। वह कभी भी कुछ मांगने में विश्वास नहीं रखते थे। उनके यशस्वी बेटे पूर्व ओलंपियन अशोक कुमार के अनुसार, बाबूजी करने में यकीन रखते थे। मैंने अगर कभी  उनसे कहा कि सरकार से कुछ मांग लो, गैस एजेंसी के लिए आवेदन कर दो, तो वह बोलते थे। मैं इस देश का सिपाही हूं जिंदगी भर जो आदेश दिया गया वह मैंने उसका पालन किया। खेलने के लिए कहा गया तो मैं खेला। अब सरकार ने क्या देना है, यह उसे ही तय करने दो। मैं कुछ नहीं मांग सकता। यही वजह है कि जब मेजर ध्यानचंद को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की मांग होती है तो अशोक को थोड़ा दु:ख भी होता है कि उनके पिता के लिए यह सम्मान मांगना पड़ रहा है, लेकिन हॉकी प्रेमी कहां मानते हैं वह तो भारत सरकार से गुहार लगाते रहते हैं और जब तक ध्यानचंद के नाम के साथ भारत रत्न का सम्मान नहीं जुड़ जाता उनका प्रयास जारी रहेगा। केंद्र सरकार ने 1995 में मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन 29 अगस्त को खेल दिवस घोषित किया था। तब देश के सबसे पुराने और ऐतिहासिक नेशनल स्टेडियम का नाम मेजर ध्यानचंद स्टेडियम भी  रखा गया था और स्टेडियम के मुख्यद्वार के नजदीक ध्यानचंद की आदमकद मूर्ति भी लगाई गई थी। 29 अगस्त को प्रतिष्ठित राष्ट्रीय खेल पुरस्कार देने की परंपरा शुरू करने से उनके जन्मदिन की महत्ता और भी  बढ़ गई। उनके नाम पर ध्यानचंद अवॉर्ड भी दिया जाने लगा। इसमें दो राय नहीं कि भारत सरकार ने मेजर ध्यानचंद के योगदान को सम्मान देने और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में स्थापित करने के लिए बहुत कुछ किया। कुछ वर्ष पूर्व केंद्र सरकार ने एक कदम ऐसा उठाया जिससे मेजर ध्यानचंद की आत्मा को भी दु:ख जरूर पहुंचा होगा। नई दिल्ली स्थित मेजर ध्यानचंद स्टेडियम की ऐतिहासिक इमारत के मुख्य हिस्से में गृह मंत्रालय का कार्यालय खोल दिया गया है। पिछले हिस्से में पहले से ही नमामि गंगे का कार्यालय चल रहा था। सरकार के इस कदम से हॉकी ही नहीं, बल्कि सामान्य खेल प्रेमियों में बेहद निराशा है। दिलचस्प बात यह है कि दो पूर्व खेलमंत्री  विजय गोयल और कर्नल राज्यवर्द्धन सिंह राठौड़ अपने कार्यकाल के दौरान इसका विरोध करते हुए हट गए। अब किरेन रीजीजू खेल मंत्री हैं। जब वह गृह राज्य मंत्री थे तभी  ध्यानचंद स्टेडियम में गृह मंत्रालय का कार्यालय खोला गया था।
जब विजय गोयल खेल मंत्री थे तो गृह मंत्रालय का कार्यालय खोले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। इस बारे में मैंने उनसे बात की थी तो उन्होंने कहा था कि मैं प्रयास कर रहा हूं कि ऐसा न हो। राठौड़ तो बहुत आशावान थे कि गृह मंत्रालय ने जो एडवांस किराया दिया हुआ है उसे वापस कर जगह खाली करा ली जाएगी। गोयल और राठौड़ की लाख कोशिशों के बावजूद ऐसा नहीं हो पाया और दोनों को खेल मंत्रालय से हटा दिया गया। कुछ समय पूर्व मैंने किरेन रीजीजू से पूछा था कि मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में गृह मंत्रालय का कार्यालय क्यों खोला गया? इस पर खेल मंत्री ने अपनी मजबूरी बताते हुए कहा था, हमें स्पोर्ट्स अथॉरिटी के कर्मचारियों के वेतन के लिए धनराशि की जरूरत होती है। जब मैं गृह राज्य मंत्री था तो यह तय किया गया था कि ध्यानचंद स्टेडियम में यह जगह किराए पर लेकर इसमें इस कार्यालय को खोला जाए। वैसे मैंने इस बारे में काफी लोगों से बात की थी और किसी को कोई परेशानी नहीं थी। इसके बाद मेरे यह बताने पर कि दो पूर्व खेल मंत्री, जो भाजपा से हैं, इसका विरोध खुलकर कर चुके हैं। रीजीजू ने उनके  नाम पूछे और बोले खिलाड़ियों को कोई परेशानी नहीं होने दी जाएगी।
ध्यानचंद स्टेडियम में गृह मंत्रालय का कार्यालय होने से यहां अंतरराष्ट्रीय  स्तर का हॉकी टूर्नामेंट नहीं हो सकता है। यहां की मुख्य टर्फ पर राष्ट्रीय हॉकी अकादमी का प्रशिक्षण कार्यक्रम चलता है। कभी  यह स्टेडियम अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिताओं के आयोजन का गढ़ था लेकिन अब यहां ऐसा नहीं हो पा रहा है। हैरानी इस बात कि है कि सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालय खोलने के लिए स्टेडियम ही क्यों तलाशे जाते हैं? एक तरफ तो खेल मंत्रालय दावा करता है कि खेल और खिलाड़ियों के विकास के लिए धन की कोई कमी नही होने दी जाएगी दूसरी तरफ किराए के रूप में धनराशि पाने के लिए स्टेडियमों की इमारतों को किराए पर दिया जा रहा है। अब प्रधानमंत्री से उम्मीद है कि ध्यानचंद स्टेडियम से गृह मंत्रालय का कार्यालय हटवा कर वहां अंतरराष्ट्रीय हॉकी आयोजन की रौनक फिर से लौटाने में अहम भूमिका निभाएंगे। हॉकी के श्रेष्ठतम खिलाड़ी को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। ——- (लेखक खेल टुडे पत्रिका के संपादक हैं) 
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