Monday, May 11, 2026
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कलम के सिपाही को ‘कलमकारों’ का आखिरी सलाम

  • मुनव्वर राना को बड़े शायरों ने पेश की खिराज-ए-अकीदत

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: ‘मिट्टी का बदन कर दिया मिट्टी के हवाले, मिट्टी को कहीं ताज महल में नहीं रक्खा’ और ‘हम नहीं थे तो क्या कमी थी यहां, हम न होंगे तो क्या कमी होगी’। अदब की महफिलों में अपने कलामों से चार चांद लगाने वाले अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के शायर मुनव्वर राना अपने चाहने वालों की आंखों में आंसू छोड़ इस दुनिया से भले ही रुखसत हो गए हों, लेकिन उनके कलाम सदियों तक लोगों की जुबां की रवानी बने रहेंगे।

मुनव्वर राना की दुनिया से रुखसती का रंज अदबी महफिल के दूसरे बड़े नामों को भी है। प्रसिद्ध शायर डॉ. वसीम बरेलवी मुनव्वर राना की मौत की खबर सुनकर देर रात से सदमें में हैं। सोमवार को बामुश्किल वो दैनिक जनवाणी से बात कर पाए। उधर डॉ. नवाज देवबंदी भी मुनव्वर राणा की मौत की खबर सुनकर बेहद आहत हैं।

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एजाज पॉप्यूलर मेरठी तो यहां तक कहते हैं कि आज हमारा डायस खाली हो गया। मौत को अक्सर याद रखने वाला एक शख्स यूं अचानक सबको रुसवा कर चला गया, ऐसे में उनका यह कलाम ‘तुम्हे भी नींद सी आने लगी है थक गए हम भी हैं, चलो हम आज यह किस्सा अधूरा छोड़ देते हैं’। सबकी जुबानी बन गया।

वो अदबी महफिलों की जान थे। मुझ से उम्र में 12 साल भले ही छोटे थे लेकिन मुशायरों की ‘बुजुर्ग हस्ती’ थे। बशीर बद्र साहब से लेकर नवाज देवबंदी और राहत इन्दौरी (जब वह जिन्दा थे) से लेकर दूसरे बड़े शायरों ने एक साथ बैठ कर साहित्य को और संवारा है। उनका जाना साहित्य जगत का बहुत बड़ा नुकसा है। -प्रो. वसीम ‘बरेलवी’

जब जब हम मुनव्वर साहब के साथ स्टेज शेयर करते थे तब हमारा फोकस भी मुनव्वर साहब की तरफ रहता था। वो अदबी महफिलों की शान थे। उनकी जिन्दगी का हर लम्हा एक प्रकार से साहित्य को समर्पित था। सदियों में इस तरह के कलमकार पैदा होते हैं। वो एक खुद्दार इंसान थे जिन्होंने कभी उसूलों से समझौता नहीं किया। -डॉ. नवाज ‘देवबंदी’

सबसे बड़ा नुकसान अदब का हुआ है। 1989 से मैं उन्हें जानता था। पहली मुलाकात उनसे आगरा में हुई थी। जितनी मकबूलियत (प्रसिद्धि) उनके हिस्से में आई उतनी किसी और के हिस्से में नहीं आई। पाकिस्तान से लेकर कतर, दुबई तथा खाड़ी के अन्य देशों में उनके साथ स्टेज शेयर किया। ‘मां’ विषय पर उनका फोकस सबसे ज्यादा रहता था। -एजाज पॉप्यूलर ‘मेरठी’

मुनव्वर राना उर्दू अदब की दरसगाह (शैक्षणिक संस्थान) थे। उनके जाने से उर्दू अदब को बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। इस नुकसान की भरपाई करना बहुत मुश्किल काम है। मुनव्वर साहब ने अदब की महफिलों को इज्जत बख्शी। साहित्य के लिए की गई उनकी खिदमत को हमेशा याद रखा जाएगा। वो मुशायरों की शान हुआ करते थे। -डॉ. यूसुफ कुरैशी

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