Tuesday, April 28, 2026
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जयंत के विचलन का अर्थ

Samvad 51


ROHIT KAUSHIK 1इस दौर के राजनीतिक माहौल को देखकर तो ऐसा लगता है कि अब राजनीति में विचारधारा का महत्व कम होता जा रहा है। विचारधारा की राजनीति गुजरे जमाने की बात हो गई है। अपने स्वार्थ के लिए विचारधारा बदल कर दूसरे पाले में बैठ जाना आम हो गया है। शायद यही कारण है कि इस दौर में ज्यादातर राजनेताओ की छवि विश्वसनीय नहीं रह गई है। हाल ही में आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी उस विचारधारा के साथ खड़े हो गए, जिस विचारधारा का वे कई वर्षों से विरोध करते आ रहे थे। 12 फरवरी को उन्होंने स्वयं यह स्वीकार किया कि वे एनडीए के साथ जा रहे हैं। हालांकि उनका वह वीडियो काफी वायरल हो रहा है जिसमें वे कह रहे हैं कि मैं कोई चवन्नी नहीं हूं, जो पलट जाऊं। एक सौदे के तहत अब वह पलट गए हैं। सवाल यह है कि क्या बदली हुई परिस्थितियों में वे चवन्नी हो गए हैं? क्या अब साम्प्रदायिकता उनके लिए कोई मुद्दा नहीं रहा है? कई लोगों को अपने हाथों से चवन्नी-अठन्नी उछालकर खेलने की आदत होती है। कही ऐसा न हो कि भविष्य में चवन्नी विभिन्न राजनीतिक हाथों द्वारा इधर-उधर उछाली जाती रहे। जयंत चौधरी के दादा चौधरी चरण सिंह ने अपने संघर्ष और आदर्शों से किसान राजनीति को एक नई दिशा दी थी। किसान हितों के लिए उन्होंने कभी भी समझौता नहीं किया। यही कारण है कि पूरे देश में किसान नेता के रूप में उन्हें बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। यह विडम्बना ही है चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह को वह सम्मान प्राप्त नहीं हो सका। अजित सिंह चाहते तो किसानों की राजनीति को गरिमा प्रदान कर चौधरी चरण सिंह की विरासत को आगे बढ़ा सकते थे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बहुत अच्छी राजनीति कर सकते थे। अजित सिंह ताउम्र इधर-उधर लुढ़कते रहें पर अपना स्वतंत्र अस्तिस्त नहीं बना सके। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में उन्हें अपने ही गढ़ बागपत और मुजफ्फरनगर में हार का सामना करना पड़ा। यह सही है कि राजनीति में हार-जीत चलती रहती है लेकिन जब राजनेता अपने निजी स्वार्थ के लिए बनी-बनी विरासत को छोड़कर पलटी मारने लगते हैं तो उनके समर्थक भी उन्हें बहुत गंभीरता से नहीं लेते हैं। ऐसे राजनेता केवल जातिगत राजनीति के चलते खिसकते रहते हैं। खोखले आदर्शवाद का लबादा ओढ़े राजनेताओं के सरोकार जब बदलते रहें तो उनकी दशा और दिशा का भी कुछ पता नहीं रहता है।

क्या चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न मिलने से उनका सम्मान और बढ़ जाएगा? क्या चौधरी साहब का सम्मान भारत के सर्वोच्च पुरस्कार का मोहताज है? अगर अब तक चौधरी साहब को यह सम्मान नहीं दिया गया था, तो क्या उनका व्यक्तित्व छोटा हो गया था? चौधरी चरण सिंह किसानों के दिल में बसते हैं। इससे बड़ा सम्मान कोई और नहीं हो सकता। सवाल यह है कि इतने वर्षों तक भाजपा की सरकार रहने के बावजूद चौधरी साहब को भारत रत्न क्यों नहीं दिया गया? जाहिर है कि राजनीति के तहत ही चौधरी साहब को यह सम्मान दिया गया है। निश्चित रूप से इस सौदे में कुछ सीटें और मंत्री पद हैं। तो क्या जयंत चौधरी भी अपने ऊपर हुए लाठीचार्ज को भूलकर सौदागर हो गए है? जयंत चौधरी का स्वार्थ लगभग 700 किसानों की शहादत पर भारी पड़ गया। पिछले कुछ वर्षों से जयंत किस मुंह से भाजपा को कोस रहे थे? एकदम से उन्हें भाजपा चौधरी चरण सिंह के आदर्शों पर चलती हुई दिखाई देने लगी। चौधरी साहब को भारत रत्न देने पर प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने राज्यसभा में अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि मैंने देखा है कि भाजपा सरकार की कार्यशैली में भी चौधरी चरण सिंह के विचारों की झलक है। सवाल यह है कि पिछले दस सालों में उन्हें यह झलक क्यों दिखाई नहीं दी। जयंत चौधरी ने राज्यसभा में यह भी कहा कि हम चौधरी चरण सिंह जैसी शख्सियत को किसी गठजोड़ के बनने और टूटने तथा चुनाव लड़ने और जीतने तक क्यों सीमित रखना चाहते हैं। लेकिन जयंत चौधरी ने तो भारत रत्न और नए गठजोड़ के चक्कर में चौधरी चरण सिंह को स्वयं ही सीमित कर दिया, फिर वे इसका दोष दूसरों को कैसे दे सकते हैं?

चौधरी चरण सिंह पूरे देश के नेता थे लेकिन अजित सिंह सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक क्यों सिमट गए थे? पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी वे बहुत अच्छा प्रभाव क्यों नहीं बना पाए थे? इन सवालों के जवाब स्वयं राष्ट्रीय लोकदल को गंभीरता के साथ खोजने होंगे। राष्ट्रीय लोकदल अगर इन सवालों पर लीपापोती करता है तो इसका खामियाजा भी और किसी को नहीं उसे को ही उठाना पड़ेगा। दरअसल जयंत चौधरी पिछले कुछ वर्षों से अपनी अलग राह पर चल रहे थे। उनके क्रियाकलाप देखकर ऐसा लग रहा था कि वे चौधरी अजित सिंह से अलग छवि बनाएंगे और स्वतंत्र अस्तित्व बनाकर अपनी छाप छोड़ेंगे। दरअसल चौधरी चरण सिंह ने एक लंबी लकीर खींची थी। इसीलिए आज भी भारतीय राजनीति में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान है लेकिन अजित सिंह एक लंबी लकीर नहीं खींच पाए। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जयंत चौधरी भी अजित सिंह की राह पर ही चल पड़े हैं। अगर वह चाहते तो लंबी लकीर खींच सकते थे लेकिन उन्होंने भाजपा को लकीर लंबी करने में दिलचस्पी दिखाई और पिछले दस वर्षों की अपनी ही मेहनत पर पानी फेर दिया। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि आरएलडी के विधायक और कार्यकर्ता भी उन पर ऐसा न करने का दबाव नहीं बना पाए। भारत रत्न के मोह और अपने स्वार्थ के लिए विधायक और कार्यकर्ता भी उनकी जयकार करने लगे।

गौरतलब है कि अखिलेश यादव ने जयंत को राज्य सभा भेजकर अपनी दोस्ती निभाई थी। अब मुख्य रूप से मुजफ्फरनगर सीट पर पेंच फंस गया था, जबकि भाजपा भी यह सीट उन्हें नहीं दे रही है। क्या एक-दो सीटों के लिए अपनी विचारधारा बदली जा सकती है? किसानों को आज तक एमएसपी की कानूनी गांरटी नहीं मिली है। एक बार फिर किसान अपनी समस्याओं को लेकर भाजपा के खिलाफ सड़कों पर हैं। किसान आंदोलन के दौरान लंबे समय तक भाजपा की हठधर्मिता के जयंत भी गवाह रहे हैं। क्या अब किसानों के लिए वास्तव में रामराज्य आ गया है? क्या अब किसानों की समस्याएं खत्म हो गई हैं? किसानों के लिए रामराज्य आए या न आए लेकिन जयंत चौधरी के लिए रामराज्य जरूर आ गया है। इस रामराज्य में किसान की झोली भरे या न भरे लेकिन जयंत की झोली अवश्य भर जाएगी। बेचारे किसानों का क्या है। वे तो संघर्ष करने के लिए ही बने हैं। जातिगत आधार पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान तो अब भी जयंत के जयकारे ही लगाएंगे। इस समय जयंत के समर्थक यह कुतर्क दे रहे हैं कि भाजपा के साथ जाने पर वे किसानों के काम करा कर उन्हें फायदा पहुंचाएंगे। इस कुतर्क के आधार पर तो दस साल पहले ही उन्हें भाजपा के साथ चला जाना चाहिए था। बहरहाल इस सौदे से जंयत ने एक बड़े नेता बनने की संभावना खो दी है। जयंत के इस विचलन पर अफसोस ही किया जा सकता है।


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