Thursday, March 5, 2026
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वेलेंटाइन डे की मदनोत्सव संस्कृति का सच

Nazariya


VISHESH GUPTAवेलेंटाइन दिवस पर आर्चीज के कार्डस, गुलाब के फूलों का विशाल बाजार, होटल, रेस्ट्रा, पब यहां तक कि सार्वजनिक स्थान भी अब प्रेम के बाजार की कहानी स्वत: ही अभिव्यक्त कर रहे हैं। प्रिंट और इलैक्ट्रानिक मीडिया ने तो वेलेंटाइन डे के कई दिन पहले से ही लोगों की वेलेंटाइन स्मृतियों को ताजा करना शुरू कर दिया है। आप चाहें इसे पसंद करें या न करें यह दिवस अब सभी वर्गों के युवाओं के लिए एक विशाल उत्सव का रूप ले चुका है। इस उत्सव का कड़वा सच यह है कि 1500 करोड़ रुपयों के बाजार से जुड़ा यह दिवस अब केवल उपहारों के आदान-प्रदान तथा प्रेम के मासूम पलों की साझेदारी का ही बहाना नहीं रह गया है, बल्कि अब यह प्रेम के स्थान पर पारस्परिक यौन आकांक्षाओं की खुली अभिव्यक्ति का दिवस भी बन रहा है। इसलिए समय रहते इस वेलेंटाइन डे की आक्रामक होती संस्कृति के इस मनोविज्ञान पर दृष्टिपात करना बहुत जरुरी है। हर वर्ष 14 फरवरी आते ही वेलेंटाइन डे के पक्ष में वैश्विक युवा संस्कृति का खुमार एवं विपक्ष में समाज की भौंहे चढ़नी शुरू हो जाती हैं। परंतु इस प्रकार के दिवसों के पीछे हम कभी उस विचारधारा को समझने का प्रयास नहीं करते जो विचाराधारा इस प्रकार के दिवसों पर अपनी गुस्सैल भूमिका अदा करती है। दरअसल यह वह विचारधारा है जो लोगों में घटते प्रेम व वात्सल्य के एहसास को उदारीकृत बाजार से प्राण वायु लेकर विस्तार देने का प्रयास कर रही है। जरा इतिहास में झांकने की कोशिश करें तो हमें उस संत वेलेंटाइन के बारे में कोई पुष्ट जानकारी प्राप्त नहीं होती जिसके नाम पर यह वेलेंटाइन डे मनाया जाता है। 14 फरवरी के साथ सीधे तौर पर एक मान्यता यह जुड़ी है कि वेलेंटाइन नामक पादरी को उस समय के यूनानी शासक क्लाउडियस ने ईसा के मत के प्रचार के अपराध में जेल में डाल दिया और इस दिन उसे मृत्युदंड देते हुए उसका सिर धड़ से अलग कर दिया था। ऐसा माना जाता है कि जिस दिन उसे मौत के घाट उतराया गया उसी रात उसकी मृत्यु से पहले उसने जेलर की बेटी को अलविदा का एक पत्र लिखा था, जिसके अन्त में उसने लिखा था-‘तुम्हारा वेलेंटाइन’। ऐसी संभावना है कि उसे उस लड़की से प्यार हो गया था। तभी से दंडित किए गए सेंट वेलेंटाइन के मार्मिक और अपूर्ण रहे प्रेम की स्मृति में यह दिवस मनाया जाता है। इसी के साथ दूसरी मान्यता यह भी जुड़ी है कि वेलेंटाइन जब जेल में था तो उसे रोम के बच्चों के असंख्य पत्र प्राप्त हुए थे जो उसे बेतहाशा प्यार करते थे। कुछ इस दिवस की जड़ें उस पुरानी यूरोपीय लोकमान्यता के भीतर भी तलाशते हैं जहां यह धारणा उन दिनों खूब प्रचलित थी कि 14 फरवरी के दिन संसार भर की सभी प्रजातियों के पक्षी 14 फरवरी के दिन अपना जोड़ा बनाकर प्रेम की अभिव्यक्ति करते हैं।

वेलेंटाइन डे से जुड़ा इतिहास व किंवदन्तियां चाहें जो हों। परन्तु इतना अवश्य है कि कहीं न कहीं यह दिवस प्रेम की प्राकृतिक भावनाओं को संजोते हुए श्रृंगार को अभिव्यक्त करने का दिवस है। हम जिस समाज में रह रहे हैं वह समाज अब प्रतिर्स्पधा से जुड़े वैश्विक व उदारीकृत समाज की शक्ल ले रहा है। परन्तु यह भी कड़वी सचाई है कि भारतीय समाज को विदेशी बाजारों के लिए खोल देने के बाद पश्चिमी संस्कृति का प्रवेश न हो, यह कतई सम्भव नहीं। इस सच्चाई से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि वेलेंटाइन डे जैसे उत्सव हमारी अपनी स्वदेशी संस्कृति से मेल नहीं खाते। आज के बच्चे यदि इस संस्कृति को अपनाने, रेव पार्टियों के आयोजित करने अथवा वेलेंटाइन डे के प्रति समर्पण करने में जो अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, उसमें परिवारों की घटती भूमिका प्रमुख रूप से उत्तरदायी है। बल्कि यों कहें कि सेवा क्षेत्र के विस्तार ने इसे आॅक्सीजन देने का काम किया है। कड़वा सत्य यह है कि बच्चों के व्यक्तित्व के विकास में परिवारजनों की घटती भूमिकाएं, बच्चों के मध्य पारिवारिक साझेदारी एवं उनसे प्रेम करने की भावना बच्चों में प्रेममय सुख एवं सुरक्षा की भावना का संचार करती है। घर का प्रेम व वात्सल्य बच्चों में एक प्रकार की सुरक्षा का आवरण प्रदान करता है। परन्तु अफसोस की बात यह है कि परिवार की भावमयी एवं वात्सल्य से ओत-प्रोत संकल्पना के पीछे छूट जाने से आज बाल व किशोर मन की संवेदनाएं घायल अवस्था में हैं।

निश्चित ही वेलेंटाइन डे की भावना में कोई दोष नहीं है। दोष तो केवल एक दिवसीय मदनोत्सव की संस्कृति में है, जो सारी वर्जनाओं को ध्वस्त करके एक बड़े बाजार की संस्कृति का हिस्सा बनकर आक्रामक स्वरूप अपना रही है। इसलिए यदि वेलेंटाइन डे के वर्तमान गुस्सैल स्वरूप को रोकना है तो हमें अपनी पारिवारिक गिरेबां में झांककर भी देखना पड़ेगा कि कहीं हमारा बच्चों से भावनात्मक व रागात्मक अलगाव कहीं उन्हें इस प्रेम की अस्थायी ज्वाला में तो नहीं झोंक रहा। कहीं हमारी खुदगर्जी व मौज मस्ती का हमारा यह आलम बच्चों का रोल मॉड़ल बनकर उन्हें प्रेम की अंधी गली की ओर तो नहीं ले जा रहा है। यदि हमें इस युवा पीढ़ी के इस प्रकार के दिवसों में शामिल होने की संस्कृति को रोकना है तो हमें बच्चों की बीच पनपते प्रेम व वात्सल्य के मधुर सम्बन्धों की सुरक्षा देकर ही इस प्रकार के विरोध अथवा एक दिवसीय बाजारू प्रेम की संस्कृति से बचा जा सकता है। हम सब मिलकर इस वेलेंटाइन डे की संस्कृति को स्वदेशी स्वरूप प्रदान करते हुए इसे मां-बाप और बच्चों, शिक्षक व शिक्षार्थी व अन्य सामाजिक संस्थाओं के बीच घटते प्रेम, वात्सल्य की संस्कृति को विकसित करते हुए समाज में क्षरण होते हुए नैसर्गिक प्रेम को अपने आंचल की छांव का सुरक्षा कवच प्रदान करें। ताकि हमारी यह वर्तमान युवा पीढ़ी एक दिवसीय मदनोत्सव की संस्कृति से बाहर आ सके।


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