
किसान और खेती किसानी पर अस्तित्व के संकट से आंदोलित किसान वायदा खिलाफी से नाराज होकर फिर दिल्ली की दहलीज पर है और सरकार व किसान आमने-सामने। किसानों का असंतोष ज्वालामुखी की तरह खदबदाता रहता है और हर 10-15 साल में फट पड़ता है। तीन कृषि कानून दो साल पहले विस्फोट का कारण बने थे। आक्रोश अलाभकारी खेती, बढ़ती बेरोजगारी, छोटी होती जोत और बदहाल अर्थव्यवस्था के कारण था, पर इसे इन तीन कानूनों में उलझा कर, फिर वापस कर सरकार किसी भी बडेÞ उलटफेर को टालने में कामयाब रही। हासिल कुछ हुआ या नहीं हुआ, भड़ास जरूर निकली। खेती किसानी राज की प्राथमिकता नहीं है। यह विषय जिक्र भी दो कारणों से पा जाता है। एक तो देश की बडी आबादी खेती से जुड़ी है और दूसरा आज भी दुनिया को किसी भी प्रयोगशाला या फैक्ट्री में अन्न का दाना नहीं बनता। जीने को खाना और खाने को अन्न चाहिए। अन्न उगाने को प्रक्रिया श्रम मांगती है, अत: किसान चाहिए। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कुछ दिनों के सिपाही विद्रोह की चर्चा आम है, पर तब बढेÞ लगान के विरुद्ध हुए कई महीने के किसान आंदोलन और खूनी संघर्ष की जानकारियां इतनी आम नहीं हैं। साम्राज्यवादी ताकतें सिर्फ उपनिवेशों की जमीन पर ही कब्जा नहीं करतीं, गुलाम देशों के प्राकृतिक संसाधनों और बाशिंदों का भी शोषण करती हैं।
आंशिक राहत और कुछ संशोधनों की लीपापोती किसानी की मूल बीमारियों का समाधान नहीं करते। कुछ राहतें तो कोढ़ में खाज भी साबित होती हैं। गलत इलाज जख्म को कैंसर बना डालते हैं। उन्नत या जीएम (जेनेटिकली मोडीफाईड) बीजों, रसायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों, महंगे कृषि यंत्रों, बिजली-डीजल की मशीनी सिंचाई ने श्रम को कम किया और शुरुआत में उपज बढ़ी देश को खाद्य संकट से उबारा, पर खेती को बहुत महंगा कर दिया। भूजल भंडार खाली किए, भूमि का बंजरीकरण, कटान और दलदलीकरण बढ़ाया। हवा, पानी और मिट्टी विषाक्त हुए। गांव में बीमारी बढ़ी। शहरी विकास के लाभार्थी किसान खेती से दूर प्रोपर्टी डीलर बन गए। खेत बने प्लाट और कंक्रीट। हरित क्रांति का लाभ जिस तरह कुछ क्षेत्रों, फसलों, वर्गों तक ही सीमित रहा, उसी तरह शहर क्षेत्र विस्तारीकरण का आर्थिक लाभ सबको मिलना संभव नहीं था। हां, इसने आम किसान के मनोबल और संयम को जरूर तोड़ा। गांव का चरित्र बदल दिया, आर्थिक-सामाजिक समीकरण भी। किसान आंदोलनों में वाजिब दाम, समय से भुगतान व कर्जा माफी के अलावा भूअर्जन मुक्ति और बढेÞ मुआवजे की मांग भी जुड़ गई। औद्योगिकरण व रसायनों से पर्यावरण की हानि भी अब मुद्दा बनी। मशीनीकरण, निजीकरण ने प्राकृतिक संसाधनों के प्रजातांत्रिकरण के आंदोलनों को भी झुलसा दिया। जल, जंगल, जमीन के मुद्दों ने मछुआरों और आदिवासियों को भी इन आंदोलनों से जोड़ा। इन वर्गों के हित आपस में भी टकरावे। ये बंटे भी पर बड़ी चुनौतियों ने इन्हें एकजुट भी किया। जो आंदोलन किसान बनाम खेत मजदूर या छोटा किसान बनाम बड़ा किसान में फंसता रहता है, उसका दायरा भी बड़ा हुआ। परस्पर सहयोग सहजता बढ़ी।
90 के दशक के बाद से निजीकरण, भूमंडलीकरण, और उदारीकरण की अन्तराष्ट्रीय चुनौतियों ने कृषि की महत्ता को घटाया और औद्योगिक शहरीकरण को गति दी। देश की सरकारों पर भी दबाव बढ गया। किसान आंदोलन के मुददे और स्वरूप भी बदला। किसान की खेती अपनी जरूरतों के लिए कम हो गई और बहुराष्ट्रीय र्कंपनियों का मोहरा बन नकदी फसलों के लिए ज्यादा। कई फसलें तो गायब ही हो गर्इं। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से दूर इन कंपनियों का उद्देश्य सिर्फ मुनाफा है और इनकी कोई राष्ट्रीयता भी नहीं थी। गांव किसान की सुनवाई कम हो गई।
सारी दुनिया में बिकवाली 4 चीजों की होती है। प्राकृतिक संसाधन, श्रम-मानसिक हो या शारीरिक, उत्पाद और सेवाएं। सेवाएं श्रम ही है। उत्पादन में श्रम चाहिए, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में भी, मशीनों के निर्माण में भी। सारा खेल प्राकृतिक संसाधनों और श्रम की लूट का है या उत्पाद और श्रम की कीमत लगाने में हेरफेर का। सारी व्यवस्था इसी लूट पर आधारित है। हजारों साल से इस मुनाफाखोरी और लूट का सबसे बड़ा अड्डा खेती रहा, और आज भी है किसान भुक्तभोगी। तुर्रा यह कि आज किसान पर ही सब्सिडी पर पलने का आरोप है, जबकि हकीकत में किसान हजारों साल से सब्सिडी ले नहीं, दे रहा है।
वो दिन लद गए जब किसान गांव के बाहर से सिर्फ नमक और लोहा लाता था। आज किसान बड़ा उपभोक्ता है। सामान्य किसान उत्पादन तो एक आध चीज का ही कर रहा है, जिसकी कीमत भी वो खुद तय नहीं कर सकता। अपनी ज्यादातर जरूरत के उत्पाद और सेवाएं वो बाजार से खरीद रहा है और उस पर टैक्स भी देता है। किसान से उलट इन बाजार के उत्पादों और सेवाओं का मूल्य उत्पादक तय करते है। किसान की व्यक्तिगत और किसान पेशे की जरूरत की चीजों की कीमत बेहताशा बढ़ी पर किसान की फसलों की कीमत नहीं। इसने खेती को घाटे का सौदा बनाया। छोटी छोटी जोत के कारण किसान का एक भाई नौकरी भी तलाशता है।
महंगाई और बेरोजगारी कृषि संकट को गहरा देती है। उत्तम खेती, मद्दम बान, अधम चाकरी, भीख निदान की परम्परा और गौरवशाली किसानी का गणित बिगड़ चुका है। बुजुर्गों के स्वाभिमानी तेवरों को याद कर आज किसान का बालक आंदोलनों में किसानी के उस सम्मान की भी लालसा और नाराजगी रखता है। अग्निवीर जैसी योजनाएं ग्रामीण इलाकों में फौज की उपयोगिता और सम्मान दोनों गिराएंगीं। खेती को अलाभकारी और असम्मानजनक जान किसानों की नस्लें किसानी से और तेजी से विमुख होंगी। एक बडेÞ तबके का यूं मनोबल भर टूटना भी राष्ट्रीय आपदा ही है। किसानी को लाभकारी और सम्मानजनक बनाना राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए वरना खेत के लिए किसान और सीमा पर खडे जवान कहां से आएंगे…जवान कहां से आएंगे और आ भी गए तो क्या उस शिद्दत से टिक पाएंगे?
कृषि एक जीवन शैली है, एक संस्कृति है। इसकी जरूरतें किसी ट्रेड यूनियन की मांग पत्र की तरह संभव नहीं, हालांकि इन्हें ट्रेड यूनियनों की तरह इस्तेमाल की लालसा वोट की राजनीति को हमेशा रहेगी। किसान वोट बैंक बन पाता तो किसानी के मुद्दे भी सध जाते, पर चुनावी राजनीति किसान को जाति-संप्रदाय में उलझाकर सत्ता साध ही लेती है। खेती किसानी ने कभी जंगलों को उजाड़ा था, वनवासियों को खदेड़ा था। प्राकृतिक वनस्पतियों को बर्बाद किया और वन जीवों को बेघर। औद्योगिक विकास व शहरीकरण ने गांवों-किसानों के साथ वैसा ही कुछ किया, गांव के स्वस्थ बेटों को बीमार, बेरोजगार, दरबदर, फैक्ट्री मजदूर बनाकर। मानव विकास की यात्रा में खेती किसानी के बाद ही घूमन्तु वनवासियों की जिंदगी में बस्तियां आर्इं, महामारियां भी। गांव-खेतों ने जंगलों को निगला था, आज शहर गांवों को निगल रहे है। यह एक सभ्यता, संस्कृति का भी संकट है।


