
क्या सखी सुबह से ही पूंछ फटकार दरवाजे पर तशरीफ का टोकरा रख दिया। भाई साहब का लंच नहीं बनाना? पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ। हमारे साहब तो लंच लेकर जाना तौहीन समझते हैं। डिपार्टमेंट ही ऐसा है, कोई न कोई मुर्गा मिल जाता है। ऐसे लंच में मुर्गा हो या मछली या फिर पनीर यह देने वाले पर है। कभी-कभार लंच के साथ डिनर भी। बड़े ईमानदार हैं, हमारे साहब डिनर हमेशा परिवार के साथ करते हैं। लंच और डिनर का मतलब होता है, सामने वाला का नमक खाना। जब एक बार नमक खा लिया तो फिर नमक हरामी कैसे?
जीवन है तो नमक है। बिना नमक के जीवन नहीं। कुछ आदिवासी भाई तो नमक के लिए मूंगी (चींटियों का) सेवन करते हैं। नमक के बगैर जीवन की कल्पना अधूरी है। नमक है तो दुनिया नमकीन है। नमक नहीं दुनिया नहीं। दुनिया के निर्माण में नमक का बड़ा योगदान है। नमक के पानी में जीने वाले जन्तू मीठे पानी में रह सकते हैं, लेकिन मीठे लोग नमक में कुछ घंटे भी बड़ी मुश्किल से गुजार पाते हैं। टूथ पेस्ट से लेकर रोटी तक में नमक है। नमक के नाम से कितना पेस्ट बिकता है। दारू बिना नमकीन के नहीं हो सकती। देसी-विदेशी कई नुस्खे ऐसे हैं जो बिना नमक के पूरे नहीं होते।
डॉक्टर से लेकर वैद्य तक कहते हैं नमक कंट्रोल करो। जिनका नमक पर कंट्रोल होता है वे स्वस्थ माने जाते हैं। शरीर में बीमारियां नमक का अनुपात बिगड़ने से पैदा होती हैं। दिमाग की गर्मी नमक पर निर्भर करती है। दिल नमक की मेहरबानी पर निर्भर है। नमक ज्यादा हुआ तो बी पी बढ़ा और बी पी बढ़ा तो दिमाग फट जाएगा। कम है तो भी गए और ज्यादा है तो भी गए। किसी से भी नमक हरामी कर लें, खुद से नमक हरामी खुदागंज का रास्ता दिखा देगी। बहरहाल… नमक जहां भी पाया जाता है, उसकी कीमत बढ़ जाती है। समुद्र में नमक, हल्दीराम की भुजिया में नमक, आटे में नमक, दाल में नमक। करेले का कड़वापन दूर करने में नमक। एक साबुन का विज्ञापन आता था ‘तंदुरस्ती है वहां’ नहीं साहब कहना यही है कि नमक दूर करने के लिए साबुन जरूरी है। नमक सटीक हो तो भोजन का प्रभाव बढ़ जाता है। लंच बिना नमक के पूरा नहीं होता। कुछ स्थानों पर थाली में नमक अलग से परोसा जाता है, ताकि स्वादानुसार मिलाया जा सके।
भाई साहब को बड़े साहब ने लंच पर बुलाया है। मतलब साफ है। जब लंच दिया जाता है तो काम लेना है, तारीफ करवाना हो, झुकाना हो, समर्थन लेना हो या अपने लिए पुरस्कार की सिफारिश करवानी हो। भारत में लंच का अलग महत्व है। कन्या से लेकर बामन तक को भोजन कराया जाता है और बाद में दक्षिणा दी जाती है। लेकिन लंच में इस परम्परा के उल्टा होता है। पहले लंच कराया जाता है फिर अपना काम निकलवाया जाता है। लंच के बाद पुरस्कार की सिफारिश करनी है या स्पेस का इस्तेमाल करना है? लंच करने वाला पुरस्कार के नाम की घोषणा नहीं करता तो, लंच करवाने वाले को पूरा अधिकार है-कह दे-जब नमक हरामी करनी थी तो लंच पर क्यों आए?


