
नेपाल की सड़कों पर आज वही नजारा है जो कभी श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान में दिखा था। बेरोजगारी से तंग युवा, भ्रष्टाचार से नाराज जनता और दमनकारी सत्ता के खिलाफ भड़का गुस्सा। तिरंगे लहराते हाथ, नारे लगाते गले, और शाम तक खून में सनी सड़कों पर बिखरे शरीर। लोकतंत्र का यह सबसे कड़वा सच है—जब जनता की आवाज दबाई जाती है, तो वह सड़कों पर उतरकर सत्ता को ध्वस्त कर देती है। नेपाल में यह विस्फोट अचानक नहीं हुआ। 65 फीसदी आबादी युवा है, मगर उनमें से 40 फीसदी बेरोजगार। शिक्षित युवा नौकरी के लिए भटक रहे हैं, महँगाई ने कमर तोड़ दी है, भ्रष्टाचार हर दफ्तर में बैठा है। और जब इन युवाओं ने सोशल मीडिया के जरिये अपनी आवाज उठाई तो सरकार ने वही मंच छीन लिया। सोशल मीडिया बैन का फैसला दरअसल लोकतंत्र के गले पर डाला गया फंदा था। यही चिंगारी सुलगकर ज्वालामुखी बन गई।
यह दृश्य नया नहीं है। श्रीलंका में जनता राष्ट्रपति भवन तक घुस आई थी। पाकिस्तान में आज भी सत्ता का चरित्र डगमगाया हुआ है। बांग्लादेश और म्यांमार भी इसी राह पर हैं। और अब नेपाल। सबक साफ है—जहां सरकार जनता की बुनियादी जरूरतों से मुंह मोड़ लेती है, वहां लोकतंत्र नहीं टिकता। भारत को इस आईने में देखना चाहिए। बेरोजगारी दर अगस्त 2025 में 8 फीसदी रही, लेकिन युवाओं में यह 20 फीसदी से ऊपर है। अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्गों के युवाओं में तो हालात और बदतर हैं। यानी सामाजिक न्याय के नारे केवल चुनावी मंच तक सीमित हैं, जमीन पर नहीं। रोटी का हाल और शर्मनाक है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2023 में भारत 125 देशों में 111वें नंबर पर है। 22 करोड़ भारतीय अब भी कुपोषण का शिकार हैं। यह वही देश है जो दुनिया को अनाज निर्यात करता है। सवाल उठता है—फसलें किसके पेट भर रही हैं और किसके घर चूल्हे ठंडे पड़े हैं?
स्वास्थ्य व्यवस्था पर नजर डालें तो तस्वीर और डरावनी है। 1000 नागरिकों पर सिर्फ़ 0.8 डॉक्टर। अस्पतालों में दवा नहीं, बेड नहीं, और इलाज महंगा इतना कि गरीब कर्ज़ में डूब जाते हैं। पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का तमगा रखने वाला देश अपनी जनता को बुनियादी स्वास्थ्य तक नहीं दे पा रहा। जनसंख्या का दबाव सब पर भारी है। 1.44 अरब लोगों वाले भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य पर जीडीपी का मात्र 6 से 7 फीसदी खर्च होता है। विकसित देशों में यह दुगुना है। नतीजा—स्कूलों में पढ़ाई का नाम पर भीड़, विश्वविद्यालयों में डिग्रियों का अंबार, पर नौकरियां नहीं। असल में सत्ता का चरित्र ही बदल चुका है। लोकतंत्र जनता की सेवा का माध्यम होना चाहिए था, लेकिन आज यह उद्योगपतियों के हित साधने का औजार बन गया है। किसानों की आत्महत्या पर चुप्पी, युवाओं की बेरोजगारी पर लाठी, और उद्योगपतियों के अरबों के कर्ज़ माफ—यही आज की राजनीति है। मीडिया का बड़ा हिस्सा भी सत्ता का बाजार बन चुका है। यही लोकतंत्र का क्षरण है। यही लूटतंत्र की परिभाषा है।
इतिहास गवाह है—फ्रांस की क्रांति से लेकर अरब स्प्रिंग तक, श्रीलंका से नेपाल तक, जब जनता की सहनशीलता टूटी है, तब सत्ता की दीवारें गिरकर धूल में मिल गई हैं। भारत को समझना होगा कि अगर बेरोजगार और भूखे युवा सड़कों पर उतर आए, तो यहां भी वही हाल होगा। समस्या का हल कठिन नहीं, बस नीयत चाहिए। हर साल कम से कम एक करोड़ नौकरियां सृजित करनी होंगी। सरकारी नौकरियों के साथ-साथ निजी उद्योग, कृषि, तकनीक और स्टार्टअप को बढ़ावा देना होगा।
सबसे बड़ी जिम्मेदारी जातीय बेरोजगारी को पहचानने और उस पर ठोस नीति बनाने की है। स्वास्थ्य पर जीडीपी का कम से कम 10 फीसदी खर्च करना ही होगा। हर जिले में आधुनिक अस्पताल और मुफ्त दवाओं की व्यवस्था करनी होगी। शिक्षा को रोजगार और कौशल से जोड़ना होगा। केवल डिग्री नहीं, बल्कि युवाओं के लिए अवसर पैदा करना होगा। सत्ता को अपने चरित्र में भी बदलाव लाना होगा। पारदर्शिता, ईमानदारी और जनता की सीधी भागीदारी अनिवार्य है। भ्रष्टाचार पर शून्य सहिष्णुता, नीति निर्माण में युवाओं की भूमिका और जनता के प्रति जवाबदेही ही लोकतंत्र को बचा सकती है। यह भारत के लिए भी चेतावनी है। लोकतंत्र तभी जीवित रहता है जब जनता को रोटी, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य मिले। वरना सत्ता के महल ताश के पत्तों की तरह ढहते देर नहीं लगती।
जनता की चुप्पी सबसे बड़ा तूफान है। जब यह चुप्पी टूटती है, तो राजसिंहासन हिल जाते हैं। नेपाल की गलियों से उठी आवाज यही कह रही है—‘हम हक मांग रहे हैं, भीख नहीं।’ भारत को तय करना होगा कि वह लोकतंत्र की राह पर चलेगा या लूटतंत्र की।

