एक दिन शोले के ठाकुर ने कहा- ‘गब्बर! डकैत बनकर क्या उखाड़ लिया? असली हिम्मत तो सड़कों पर गाड़ी चला कर दिखा दो। रामगढ़ पूरी उम्र तुम्हारे पांवों में पड़ा रहेगा।’ गब्बर को भी चुनौती अच्छी लगी। उसने कड़क आवाज में ऐलान किया-‘ठाकुर! आज से गब्बर सिंह नहीं, ड्राइवर गब्बर कहलाएगा।’ गब्बर ने गाड़ी स्टार्ट की। धड़ाम-भड़ाम आवाज आई। गब्बर ने सोचा, ‘वाह! गाड़ी भी मेरे जैसी खतरनाक लगती है।’ गाड़ी अभी सौ मीटर ही चली थी कि सामने एक गड्ढा आ गया। गब्बर ने सोचा- ‘अरे छोटा सा गड्ढा है, गब्बर सिंह को क्या रोक पाएगा!’ गाड़ी धड़ाम से गड्ढे में गिरी और गब्बर का सिर स्टीयरिंग से टकराया। गब्बर चिल्लाया-‘अरे ओ सांभा! कितने गड्ढे हैं इस सड़क पर?’ सांभा ने खिड़की से झांककर कहा- ‘सरदार, गड्ढे गिनने की कोशिश की थी…सौ में से 25 तक गिन पाया, फिर खुद गड्ढे में गिर गया!’
थोड़ी दूर चला तो सड़क गायब और कीचड़ हाजिर। गाड़ी फिसली और पूरा कीचड़ गब्बर के ऊपर होते हुए सांभा पर फैल गया। तुरंत डायलॉग निकला- ‘ये हाथ हमें दे दो ठाकुर…ताकि हम इस सड़क बनाने वाले को पकड़ कर मार दें!’ लोग हंस पड़े-‘अरे गब्बर! ये गड्ढे और कीचड़ हमारे गांव तो क्या पूरे शहर की पहचान हैं। इस देश की शान है! तू तो नया-नया आया है, हम तो सालों से इस झूले का मजा ले रहे हैं।’ गब्बर गुस्से में बोला- ‘गब्बर के सामने जो हंसा, वो मरा समझो…लेकिन ये गड्ढे तो मुझे ही मार रहे हैं!’
फिर गब्बर ने ब्रेक दबाया, पर गाड़ी रुकी नहीं। गड्ढा ही उसका ब्रेक बन गया। गब्बर तड़पकर बोला-‘ये गाड़ी रुके ना रुके, पर गड्ढा कहीं भी गाड़ी रोक सकता है। ठाकुर! ये तो मुझसे भी बड़े डकैत है। सारे अफसर नेता पूरी सड़कों को गायब करके बरसों से डकैती डालते आ रहे हैं। आज से मैं भी इनके डकैत ग्रुप में शामिल हो जाता हूं।’ पहले लोग कहते थे, गब्बर से डर लगता है। लेकिन अब गब्बर कहने लगा- ‘सांभा, मुझे गड्ढों से डर लगता है। जल्दी करो मुझे भी इन अफसरों के डकैत ग्रुप में शामिल होने दो।’ सांभा बोला-‘सरदार, आप तो पचास-पचास को मार देते थे, और आज गड्ढे देखकर कांप रहे हो!’ गब्बर गरजकर बोला-‘अरे पचास आदमी तो जिंदा थे, जवाब देते थे…ये गड्ढे तो बिना बताए हमला कर देते हैं।’
गाड़ी फिर उछली और गब्बर छत से टकराया।
दर्द से कराहकर बोला-‘बस करो रे! ठाकुर, तुझे बदला लेना था तो सीधे गोली मार देता। ये सड़क और गड्ढे क्यों दिए? इन गड्ढों से रोज मर-मर के मरना पसंद नहीं।’ गब्बर ने गाड़ी रोक दी, हाथ जोड़कर बोला-‘रामगढ़वासियों! आज से गब्बर सिंह डकैत नहीं, सड़क पीड़ित कहलाएगा। डकैती छोड़ दी, अब तो सड़क विभाग के खिलाफ धरना दूंगा। असली खतरनाक डकैत मैं नहीं, ये सारे अफसर हैं।’ गब्बर थककर बैठ गया। उसकी आखिरी करुण पुकार थी-‘सांभा…अगर मुझे फिर गाड़ी चलानी पड़े…तो गोली मार देना!’ सांभा क्या करता! बेचारा! वह तो खुद किसी एक गड्ढे में कूद कर पहले से ही मर चुका था।

