नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन हैै। पितृदोष तब उत्पन्न होता है जब जातक अपने पूर्वजों के अधूरे कर्म, अशांत आत्माओं या अपने ही पूर्व जन्म के पाप कर्मों के दुष्परिणाम से ग्रस्त होता है। यह दोष जीवन में बार-बार आने वाली रुकावटों, संघर्षों और मानसिक अशांति का प्रमुख कारण माना गया है। सूर्य, चंद्रमा, गुरु, मंगल, बुध, शुक्र, शनि आदि जब राहु के साथ युति (संयोग) बनाते हैं। नवम भाव (पितृ भाव) पर राहु, केतु या शनि की कुप्रभावी स्थिति। पंचम भाव (पूर्व जन्म कर्म) पर राहु-केतु का दुष्प्रभाव। मंगल रक्त संबंध और वंश परंपरा का कारक ग्रह है।
जब मंगल राहु-केतु या शनि से पीड़ित होता है तो जातक पर पितृदोष का प्रभाव गहरा हो जाता है। यदि बृहस्पति पर्वत (तर्जनी उंगली के नीचे का भाग) और मस्तिष्क रेखा के बीच से कोई रेखा निकलकर दोनों को काटती है, तो यह पितृदोष का संकेत माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में इसे मंगल का कारक भी माना गया है, क्योंकि मंगल ज्योतिष शास्त्रानुसार रक्त संबंध को जोड़ता है। यही कारण है कि विद्वान पितृदोष की तुलना मंगलदोष से करते हैं। कुछ उपायों से पितृदोष के असर को कम किया जा सकता है।
कैसे करें निवारण
पितृ पक्ष में प्रतिदिन भोजन करने से पहले अपने आहार में से कुछ हिस्सा गाय, कुत्ते और कौवे या अन्य पक्षी को जरूर दें।
पितृ पक्ष के पहले दिन एक पीपल का पेड़ किसी सुरक्षित स्थान अथवा मंदिर में लगाएं। पीपल का पेड़ लगाने से पहले संकल्प लें- ‘मैं यह पौधा अपने पूर्वओं के लिए एवं जाने-अनजाने में मेरे तथा परिवार के किसी अन्य सदस्यों से हुई गलतियों की माफी मांगते हुए लगा रहा हूं। इसके माध्यम से मैं अपने पापों का प्रायश्चित करना चाहता हूं और पूरे वर्ष इस पेड़ की सेवा करूंगा तथा प्रत्येक महीने की अमावस्या को भोजन दान करूंगा।’
पितृ पक्ष के सोलह दिनों तक घर में प्रतिदिन श्रीमद्भागवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करें अथवा इस दौरान रोजाना सूर्यास्त के समय पीपल पेड़ के नीचे दक्षिण मुख कर चार बत्ती वाला दीपक, सरसों के तेल में लोबान मिलाकर जलाएं तथा प्रार्थना करें कि पितृ मुझे और मेरे परिवार को पितृदोष से मुक्त करें।
श्राद्ध के दौरान किसी बालक या जरूरतमंद को भोजन कराएं अथवा भोजन दान भी कर सकते हैं। भोजन देने से पहले संकल्प करें कि मैं यह भोजन अपने पितरों को समर्पित करता हूं। आपका आशीर्वाद और मार्गदर्शन प्राप्त हो।
पितृ पक्ष में नागबलि, नारायण बलि, त्रिपिंडी श्राद्ध आदि का पाठ नित्य करने से भी पितृदोष का प्रभाव कम होता है। इन दिनों पूर्वजों का ध्यान कर दो मूली दान करने या गाय को खिलाने से भी पितरों का आशीर्वाद मिलता है।
पितृ पक्ष में रोजाना स्नान करने के बाद एक माला महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। इससे भी पितृदोष दूर होता है। इसके अलावा आप प्रत्येक महीने की नाग पंचमी का व्रत भी एक साल तक के लिए कर सकते हैं।

