
राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के मधु विहार के एक साधारण से फ्लैट से निकली खबर ने पूरे सिस्टम की परतें उधेड़ दी हैं। दिल्ली पुलिस की क्राईम ब्रांच की कार्रवाई में जिस तरह नकली नेसकेफे और ईनो का धंधा पकड़ा गया, वह सिर्फ एक अवैध फैक्ट्री का खुलासा नहीं है यह उस भरोसे के ढहने की कहानी है, जिस पर आम आदमी रोजमर्रा की जिंदगी टिकाए बैठा है। जांच में सामने आया कि इस्तेमाल हो चुका कॉफी कचरा, सस्ते पाउडर और अज्ञात रसायनों को मिलाकर नकली नेस्केफ तैयार किया जा रहा था। पैकेजिंग इतनी सटीक थी कि असली और नकली में फर्क करना लगभग असंभव था। यानी जो कप हम हर सुबह ऊर्जा के लिए पीते हैं, वही हमारे शरीर में धीरे-धीरे बीमारी बो सकता है। यह सिर्फ मिलावट नहीं, बल्कि योजनाबद्ध धोखाधड़ी है जहां उपभोक्ता की सेहत को सीधे खतरे में डालकर मुनाफा कमाया जा रहा है।
पुलिस की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, एक और चौंकाने वाला सच नकली ईनो का उत्पादन का सामने आया। साधारण एसिडिक पाउडर को मशीनों से पैक कर लाखों सैशे बाजार में उतार दिए गए। जो उत्पाद पेट की राहत के लिए जाना जाता है, वही अब पेट, किड़नी और लीवर की गंभीर समस्याओं का कारण बन सकता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतना बड़ा नेटवर्क बिना सिस्टम की नाक के नीचे कैसे फल-फूल रहा था? ये फैक्ट्रियां किसी जंगल में नहीं, बल्कि रिहायशी इलाकों में चल रही थीं। आरोपियों ने दुकानदारों को ‘कंपनी जैसे डिस्काउंट’ का लालच देकर नकली सामान को मल्टी-स्टोर्स और मॉल तक पहुंचा दिया। इसका मतलब साफ है कि सिर्फ अपराधी ही नहीं, बल्कि सप्लाई चेन के कई स्तरों पर लापरवाही या मिलीभगत मौजूद है। जब नकली सामान इतनी आसानी से बड़े रिटेल आउटलेट्स तक पहुंच जाए, तो यह केवल कानून-व्यवस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि नियामक संस्थाओं की विफलता भी है।
सबसे डरावनी बात यह है कि उपभोक्ता के पास अब असली-नकली पहचानने का कोई ठोस तरीका नहीं बचा। पैकेजिंग वही, ब्रांड वही, दिखावट वही तो भरोसा करें भी तो किस पर? यह स्थिति एक ‘ट्रस्ट क्राइसिस’ को जन्म देती है, जहां हर खरीद एक जोखिम बन जाती है। अगर वास्तव में इस समस्या का कोई समाधान करना है तो सिर्फ सतर्कता नहीं बल्कि सख्त सिस्टम चाहिए, क्योंकि इस समस्या का हल सिर्फ ‘सावधान रहें’ कह देने से नहीं निकलेगा।
दरअसल, इसके लिए ठोस और बहु-स्तरीय कदम जरूरी हैं जैसे कि ट्रैक एंड ट्रेस सिस्टम को मजबूती से चलाने की व्यवस्था होनी चाहिए हर पैकेट पर यूनिक क्यूआर कोड या डिजिटल ट्रैकिंग अनिवार्य हो, जिसे स्कैन करके उपभोक्ता असलियत जांच सके। दूसरा उत्पाद की सप्लाई चेन की सख्त निगरानी की जानी चाहिए। मैन्युफैक्चरिंग से लेकर रिटेल तक हर स्तर पर आॅडिट और जवाबदेही तय हो। बड़े स्टोर्स की भी नियमित जांच होनी चाहिए। तीसरा कदम, दोषियों को कड़ी सजा और त्वरित न्याय की जरूरत होगी क्योंकि ऐसे मामलों को आर्थिक अपराधस नहीं, बल्कि ‘जन स्वास्थ्य के खिलाफ अपराध’ माना जाए और सख्त से सख्त सजा दी जाए।
चौथा कदम, यह होना चाहिए कि लोकल स्तर पर इंटेलिजेंस नेटवर्क स्थापित होना चाहिए जिससे रिहायशी इलाकों में चल रही अवैध इकाइयों की पहचान के लिए पुलिस और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। पांचवां और आखिरी कदम, उपभोक्ता जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को जागरूक करने की पहल की जाए, लोगों को सिखाया जाए कि वे किन संकेतों से नकली उत्पाद पहचान सकते हैं और कहां शिकायत दर्ज करें। आम आदमी को पता ही नहीं होता कि वह क्या खा रहा है, क्या पी रहा है, उसका असर क्या होगा? नकली उत्पाद बनाने वालों ने तो जैसे इंसानों को कीड़ा मकोड़ा समझ लिया है। समस्या यह है कि हमारे देश में मिलावटखोरों के लिए सख्त कानून नहीं हैं। इसलिए उनका जल्दी से कुछ बिगड़ता नहीं है। भ्रष्ट अफसर भी कमजोर कड़ी हैं। घूस देकर मामला रफा दफा हो जाता है। जरूरत सख्त कानून बनाने की है।
बहरहाल उपभोक्ता को इस बात का इंतजार है कि आखिर उसके भरोसे की मरम्मत कब होगी? दिल्ली का यह खुलासा कोई अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि उस बड़े संकट का संकेत है जिसमें हमारा बाजार धीरे-धीरे फंसता जा रहा है। जब ब्रांडेड पैकेट भी भरोसे के काबिल न रहें, तो यह सिर्फ उपभोक्ता की नहीं, पूरे सिस्टम की हार है। अगर अब भी सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो ‘भगवान भरोसे’ चल रही यह व्यवस्था एक दिन सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा में बदल सकती है। और अगर भरोसा एक बार टूट जाए, तो उसे वापस लाना सबसे मुश्किल काम होता है और आज भारत उसी मोड़ पर खड़ा हुआ नजर आ रहा है। उपभोक्ता ठगा जा रहा है।

