Saturday, May 2, 2026
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अरबों की संपत्ति को लेकर 20 साल बाद भी नहीं टूटी कैंट अफसरों की नींद

  • लीज कैंसिल कोर्ट से पक्ष में फैसला ध्वस्तीकरण के आदेश फिर भी सोए हैं कैंट अफसर
  • श्री प्लाजा बनाकर करोड़ों रुपये की कीमत की दुकानें दी गई बेच, कैंट के हाथों को नहीं लगा

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: बेगलपुल स्थित बंगला नंबर-273 की भारत सरकार रक्षा मंत्रालय से लीज कैंसिल हो चुकी है। हाईकोर्ट से कैंट प्रशासन के पक्ष में निर्णय हो चुका है, इसके बावजूद अवैध रूप से बनाया श्रीप्लाजा कैंट अफसरों को चिढ़ाता नजर आ रहा है। अवैध निर्माण ही नहीं किया गया।

बल्कि यहां बनाई गई दुकानें भी बेची जा चुकी है, लेकिन करीब बीस साल होने को आए कैंट अफसरों की नींद टूटती नजर नहीं आ रही है। हैरानी की बात तो ये है कि अवैध निर्माण करने वालों ने धोखाधड़ी की व झूठ बोला, लेकिन इसके बाद भी उनके खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज नहीं किया गया।

साल 2000-01 में आया चर्चाओं में

लीज का बंगला नंबर 273 साल 2001 में पहली बार उस वक्त चर्चाओं में आया जब शहर के कई बडे नाम जिनमें ओम प्रकाश जौहरी, राजकुमार गुप्ता व कुछ अन्य लोगों ने इसमें दिलचस्पी दिखानी शुरू की। जबकि यदि जीएलआर की बात की जाए तो यह बंगला फैजुल हसन के नाम पर लीज था। इसकी लीज खास श्रेणी में शामिल थी। जिसको आसानी से रद भी नहीं किया जा सकता था, लेकिन यहां हुए खेल में भारत सरकार व रक्षा मंत्रालय ने इसकी लीज को खत्म कर दिया।

आवासीय बंगले का व्यावसायिक प्रयोग

फैजुल हसन के नाम बंगला 273 की लीज पूरी तरह से आवासीय आधार पर थी, लेकिन उसका उल्लंघन किया गया। इसमें हॉस्टल बनाने का नक्शा कैंट बोर्ड में दाखिल किया गया। बताया जाता है कि इस खेल में तत्कालीन कैंट बोर्ड के कुछ सदस्यों का पूरा समर्थन हासिल किया गया था या यूं कहें कि आवासीय बंगले के व्यावसायिक प्रयोग का रास्ता ही कैंट बोर्ड के तत्कालीन सदस्यों ने दिखाया था।

डीईओ ने की थी लीज कैंसिल

आवासीय बंगले का व्यावसायिक प्रयोग होने पर साल 2002 में तत्कालीन डीईओ धनपतराम ने इस बंगले की लीज कैंसिल किए जाने को एक सख्त पत्र रक्षा मंत्रालय को भेजा था। धनपत राम के पत्र को आधार बनाकर भारत सरकार ने 273 की लीज कैंसिल कर दी थी, लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि लीज कैंसिल किए जान के बाद भी यहां अवैध निर्माण जारी रहा।

कोर्ट को कर दिया गुमराह

बंगले की लीज खत्म कर दिए जाने के बाद अवैध निर्माण करने वाले हाईकोर्ट पहुंच गए। उनकी ओर से कोर्ट को बताया गया कि जो निर्माण किया गया है उसका नक्शा कैंट बोर्ड में दाखिल किया जा चुका है। जबकि वास्तविकता इसके उलट थी। जिस नक्शे को दाखिल किए जाने की बात कोर्ट से की गई थी, वह नक्शा कैंट बोर्ड में जमा हीं नहीं हुआ था। इस प्रकार गुमराह कर कोर्ट से स्टे हासिल किया गया।

कैंट प्रशासन के पक्ष में फैसला

कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के बाद शुरूआती निर्णय कैंट अफसरों के पक्ष में दिए। कोर्ट के फैसले और भारत सरकार द्वारा लीज समाप्त कर दिए जाने के बावजूद तत्कालीन अफसरों ने यहां अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई में दिलचस्पी नहीं दिखाई। इतना ही नहीं कोर्ट में इसकी पैरवी करने से भी कन्नी काटने लगे। जिसके चलते यहां पूरा अवैध कॉम्प्लेक्स खड़ा कर दिया।

दुकानें बेचकर हो गए अलग

273 बंगले में अवैध निर्माण कर श्रीप्लाजा बनाने वाले यहां तमाम दुकानें बेचकर इससे पूरी तरह से अलग हो गए हैं। कैंट प्रशासन के अफसरों को इस ओर आने की फुर्सत नहीं। उन्होंने इसको लेकर हाईकोर्ट में चल रही मुकदमे की अंतिम पैरवी कब की थी इसकी भी जानकारी से इनकार किया है। अब तो स्थिति यह हो गई है कि पैरवी न किए जाने की वजह से कोर्ट में भी इस बंगले की तारीखें लगना बंद हो गई हैं।

पांच एकड़ का रकबा, अरबों की कीमत

जिस बंगले में अवैध रूप से श्रीप्लाजा खड़ा कर दिया गया है उसका रकबा पांच एकड़ से ज्यादा का है। सर्किल रेट की यदि बात की जाए तो इसकी कीमत अरबों में बैठती है, लेकिन कैंट प्रशासन व कुछ बोर्ड मैंबरों के लालच के चलते यह बेशकीमती जगह भारत सरकार के हाथ से निकल गई है।

करीबियों ने किए अवैध कब्जे

श्री प्लाजा के पीछे नाले पर कैंट बोर्ड के उपाध्यक्ष के करीबी बताए जाने वाले ने अवैध कब्जा कर लिया है। ऐसा नहीं कि कैंट बोर्ड के स्टाफ को इसकी जानकारी नहीं है, लेकिन आरोपी के बोर्ड के बडेÞ सदस्य से करीबी संबंध होने की वजह से कोई भी इस पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। ऐसे कई अन्य मामले भी बताए जाते हैं। वहीं, दूसरी ओर श्रीप्लाजा के सवाल पर कैंट प्रशासन का कोई भी अधिकारी बात करने का राजी नहीं। दरअसल, हो यह रहा है कि इस प्रकार की कारगुजारियों बगैर हिस्से के संभव नहीं। स्टाफ हो या सदस्य सभी का हिस्सा तय होता है।

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