जनवाणी संवाददाता |
नजीबाबाद: तहसील नजीबाबाद के कस्बा साहनपुर में ठठेरा समाज द्वारा हस्त निर्मित एल्मुनियम व पीतल के बर्तन का कार्य पिछले दो दशक से अपनी चमक खोता जा रहा है और पिछले लगभग 100 सालों से अपने घरों में ही हाथों से पीतल व एल्मुनियम बर्तन बना कर परिवारों का लालन पालन करने वाला ठठेरा समाज
तकनीकी प्रतिस्पर्धा के दौर में दो जून की रोटी की लड़ाई लड़ रहा है।
युवा पीढ़ी रोजी रोटी की तलाश में पलायन कर कस्बे से बाहर जाने को मजबूर है।वहीं सरकारी उपेक्षा के चलते अब हस्त निर्मित बर्तन बनाने के काम में केवल 15 परिवार ही रह गए है। बिरादरी के अधिकांश लोगों ने प्रतिस्पर्धा के चलते आर्थिक परेशानी के कारण अपने काम छोड़ कर मजदूरी को अपना लिया।

ठठेरा बिरादरी के द्वारा साहनपुर में एल्मुनियम की पतीली,परात,,पीतल की टोकनी,पीतल की तगारी यानी छोटी परात, कढ़ाही, एल्मुनियम के चम्मच बनाए जाते थे। ये सब हस्त निर्मित बर्तन साहनपुर से जगाधरी, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मुरादाबाद के अलावा नजीबाबाद व जिला बिजनोर के कई शहरों में भेजा जाता था, परन्तु पिछले दो दशक से इस कारोबार को टेक्नोलॉजी का ग्रहण लग जाने के कारण हस्त निर्मित बर्तन बनाने का काम लगभग समाप्त हो गया और ठठेरा समाज के लोग अब केवल कच्चे माल से एल्मुनियम की शीट बना कर जगाधरी में बड़े कारखानों को बेच रहे हैं।
एल्मुनियम शीट बना कर भेज रहें है कम दाम में जगाधरी: मोहम्मद शहज़ाद
ठठेरा समाज के मोहम्म्द शहज़ादका कहना है एल्मुनियम की शीट ढालने में 105 रुपए प्रति किलो की लागत आती है जबकि जगाधरी के बड़े कारखाने इसे 140 रुपए से अधिकतम 150 रुपए तक ही खरीदते है और वे अपने कारखाने में इन एल्मुनियम शीट से पतीले बना कर अच्छे मुनाफे में बेच देते है,वे केवल 25 से 30 रूपए प्रति किलो के मार्जिन पर दिन रात भट्टी झोंक कर पसीना बहा रहे है,मजदूरों की झाड़ी भी कई बार नहीं निकल पाती।
आर्थिक साधन नहीं होने से है परेशानी: मोहम्मद इकबाल
हाजी मोहम्मद इकबाल का कहना है अगर उनके पास आर्थिक समस्या नहीं हो,आधुनिक मशीन हो तो ,रोलर हो तो एल्मुनियम शीट से बनने वाले बर्तन यहीं बना कर काफी लाभ हो सकता है। युवा पीढ़ी को यहीं रोजगार मिल सकता है। उनका कहना है कि बैंक से लोन लेने जाते हैं तो टर्न ओवर के नाम पर चक्कर कटाये जाते है।
काफी प्रयास किए, पर मिला आश्वासन: खुर्शीद मंसूरी
साहनपुर के पूर्व चेयरमैन खुर्शीद मंसूरी का कहना है अपने चेयरमैन कार्य काल में उन्होंने काफी प्रयास किये। दिल्ली से टीम भी आयी, ठठेरा समाज की हस्त निर्मित बर्तनों के काम को प्रोतसाहन देने को फ़ाइल भी बनी पर समय के साथ ठंडे बस्ते में चली गयी।
कहना गलत नहीं होगा कि अगर इस व्यवसाय को कुटीर उद्योग के रूप में प्रोत्साहन मिले और स्किल विकास योजना से जोड़ा जाए तो नगर नजीबाबाद में रोजगार के नए अवसर जुड़ सकते हैं।

