
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बिडन की पहल पर 09 और 10 दिसंबर को सम्मिट फॉर डैमोक्रेसी-2021 का आयोजन वाइट हाउस में अंजाम दिया गया। सम्मिट में सौ से अधिक राष्ट्रों के शीर्ष लीडरों ने अपनी शिरकत अंजाम दी। बारह देशों के शीर्ष लीडरों को सम्मिट फॉर डेमोक्रेसी को संबोधित करने का अवसर प्रदान किया गया, विश्व के इन बारह शीर्ष लीडरों श्रेणी में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सम्मिट फॉर डैमोक्रेसी को संबोधित किया। सम्मिट फॉर डेमोक्रेसी का आगाज करते हुए राष्ट्रपति जो बाइडन ने फरमाया कि लोकतांत्रिक संस्थानों के विश्वव्यापी अवनति को रोकने के लिए लोकतांत्रिक देशों को परस्पर घनिष्ठ तौर पर सहयोग करना चाहिए। राष्ट्रपति जो बाइडन ने आह्वान किया कि लोकतांत्रिक देश यह सिद्ध करके दिखाएं कि व्यवहारिक तौर से लोकतांत्रिक व्यवस्था वस्तुत: तानाशाही व्यवस्था के मुकाबले में एक बहुत बेहतर राजनीतिक व्यवस्था है। सम्मिट फॉर डेमोक्रेसी में शिरकत के लिए पाकिस्तान को आमंत्रित किया गया था, किंतु पाक हुकूमत द्वारा अमेरिकन राष्ट्रपति के निमंत्रण को बाकायदा अस्वीकार कर दिया गया।
इस अस्वीकारिता का कारण स्पष्ट है कि राष्ट्रपति पद पर विजय प्राप्त होने पर जो बाइडन ने पाक प्रधानमंत्री इमरान खान का बधाई देने वाला टेलीफोन तक नहीं उठाया और जब इमरान खान संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने के लिए अमेरिका गए तो अमेरिकन राष्ट्रपति ने पाक प्रधानमंत्री को मुलाकात का वक्त प्रदान नहीं किया।
कूटनीति के जानकारों का कहना है कि पाक हुकूमत ने चीन के कूटनीतिक प्रभाव के तहत सम्मिट फॉर डेमोक्रेसी के अमेरिकन निमंत्रण को ठुकराया है। चीन ने अमेरिका पर इल्जाम आयद किया है कि लोकतंत्र के नाम पर चीन और रशिया को कूटनीतिक तौर से निशाना बनाया जा रहा है।
अमेरिका के विरुद्ध चीन और रूस के राजदूतों द्वारा नेशनल इंटरेस्ट पॉलिसी जर्नल में एक संयुक्त लेख लिखा गया। इस वृहद लेख में दोनों देशों के कूटनीतिज्ञों द्वारा बाइडन प्रशासन की मानसिकता को दुनिया को पुन: शीत-युद्ध की आग में झोंक देने वाला करार दिया गया। लेख में दावा किया गया कि अमेरिका द्वारा आयोजित सम्मिट वस्तुत: विश्वपटल पर कूटनीतिक खाई को और अधिक चौड़ा कर देगी।
उल्लेखनीय है कि विश्वपटल पर अभी तक तकरीबन तीन अरब लोग सोशल मीडिया से संबद्ध हो चुके हैं और आगामी कुछ वर्षों में चार अरब और अधिक लोगों के इससे जुड़ जाने की संभावना है। सोशल मीडिया का बदनीयत और आपराधिक इस्तेमाल लोकतंत्र की बुनियाद को खोखला कर सकता है।
जैसा कि हाल के विगत कुछ वर्ष में देखने में भी आया है कि सोशल मीडिया द्वारा धार्मिक, सामाजिक, नस्ली और जातिय घृणा का प्रसार प्रचार अंजाम देकर अनेक मुल्कों में भीषण दंगों को अंजाम दिया गया। वैश्विक आतंकवाद को विस्तार प्रदान करने के लिए सोशल मीडिया का विशाल पैमाने पर खतरनाक और बेजा इस्तेमाल किया जाता रहा है।
अमेरिका की मेटा कंपनी के तहत ही फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, व्हाटसैप आदि संचालित किए जाते हैं। अमेरिकन हुकूमत का प्रबल दायित्व है कि लोकतंत्र की बुनियाद को खोखला करने वाले घृणा फैलाने वाले संदेशों पर कड़ी लगाम आयद की जाए। लोकतांत्रिक आजादी और अभिव्यक्ति की आड़ में लोकतंत्र को तहस नहस करने वाली ताकतों को आधुनिकतम तकनॉलाजी का इस्तेमाल करने से सख्ती से रोका जाना चाहिए।
अमेरिका ने विकीलीक्स के संपादक जूलियन असांजे को इराक और सीरिया में अमेरिकी सेना द्वारा अंजाम दिए गए मानवाधिकारों के हनन की रिपोर्ट प्रकाशित करने लिए जेल में डाला है। अमेरिका में गोरे और काले नागरिकों के मध्य भेदभाव के सामाजिक हालत के कारण विकट स्थिति कायम बनी रही है।
भयावह आर्थिक और सामाजिक विषमताएं अपने चरम पर रही हैं। आक्यूपाई वॉलस्ट्रीट आंदोलन के तहत एक प्रतिशत बनाम निन्यानवे प्रतिशत अभियान जबरदस्त तौर पर संचालित किया।
अमेरिका की बर्बर साम्राजयवादी फितरत ने अफगानिस्तान, सीरिया और इराक पर नृशंस कहर ढाया। पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के समर्थकों ने अमेरिका के लोकतांत्रिक शिखर पर गंभीर और घातक आक्रमण अंजाम दिया।
ब्लादिमीर पुतिन लोकतंत्र के नकाब में रूस के एक बहुत दौलतमंद तानाशाह बन जाते हैं, जो रूस के आम में चुनाव धांधली अंजाम देकर बारम्बार सत्तानशीन होता रहता है। तानाशाह चीनी हुकूमत वीगर मुसलमानों पर जालीमाना कहर ढाती रही है।
चीनी समाजवाद के परचम के नीचे चीनी अरबपतियों का वस्तुत: चीन की दो तिहाई दौलत पर आधिपत्य स्थापित हो चुका है। 72 वर्षीय भारतीय लोकतंत्र में अमीर और अमीर बनता गया और गरीब और अधिक गरीब होता गया। भारत की कुल पूंजी की तीन चौथाई पूंजी वस्तुत: कुछ पूंजीशाह घरानों के आधिपत्य में जा चुकी है।
भारत के अस्सी करोड़ नागरिक गरीबी की सीमा रेखा के नीचे किसी तरह जिंदा रहते हैं। वर्षों में जनमानस के खून पसीने से अर्जित सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को अमीर कॉरपोरेट घरानों के हवाले किया जा रहा है। आर्थिक समता और इंसानियत के आभाव में लोकतंत्र अंतत: अमीरों की वर्गीय तानाशाही बन जाता है।
असीम दौलत के दमखम पर संचालित होने वाला लोकतंत्र वस्तुत: मुठ्ठीभर अमीर घरानों की अप्रत्यक्ष तानाशाही में परिवर्तित हो जाता है। घनघोर आर्थिक विषमता से परिपूर्ण समाज में सच्चा लोकतंत्र कदापि पल्लवित नहीं हो सकता है। लोकतंत्र के नकाब में राजसत्ता पर अमीरों का आधिपत्य कायम बना रहता है।
ऐसे विषमतापूर्ण समाज में एक साधारण नागरिक लोकतांत्रिक चुनाव लड़ने की हिमाकत नहीं कर सकता है। जो बाइडेन भले ही अमेरिका को लोकतंत्र और मानवाधिकारों विश्व चैम्पियन करार दें, किंतु उन्हीं के अलफाजों में किसी देश का लोकतंत्र कदाचित तौर पर संपूर्ण नहीं है, इसे संपूर्ण बनाने की महती आवश्यकता है। संपूर्ण लोकतंत्र की सबसे बड़ी शर्त है, इसे पूर्णरुपेण पारदर्शी बनाया जाना चाहिए।
आम चुनाव को पारदर्शी बनाने के लिए चुनाव खर्च को बाकायदा कानूनी सख्ती के साथ सीमित किया जाना चाहिए, ताकि अमीर वर्ग का आधिपत्य लोकतंत्र के चुनाव तंत्र से समाप्त किया जा सके।
लोकतंत्र वास्तव में किसी देश में कुछ वर्ष पश्चात चुनाव के माध्यम केंद्रीय, प्रांतीय और स्थानीय सरकार निर्मित करने का व्यवस्था नहीं है, वरन संस्कृति, समाज और राजनीति में परस्पर संवाद द्वारा जिंदगी के प्रत्येक पहलू को संचालित करने की व्यवस्था है। लोकतंत्र के तहत कोई राजनीतिक शत्रु नहीं होता है और राजनीतिक असहमति को हर पग पर आदर प्रदान करके ही लोकतंत्र की हिफाजत की जाती है।


