Monday, May 25, 2026
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और एक सीट जीतने के बाद भी शून्य भी शून्य हो गई थी: रालोद

  • वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में रालोद अपने किले छपरौली को ही जीतने में रही थी कामयाब
  • छपरौली से रालोद से जीतकर विधानसभा पहुंचे सहेंद्र सिंह ने बाद में भाजपा का था दामन

मुख्य संवाददाता  |

बागपत: एक समय था जब रालोद के विधायकों की संख्या सत्ता की कुर्सी के लिए अहम होती थी, लेकिन धीरे-धीरे वह कम होती चली गई और रालोद शिखर से शून्य पर पहुंच गई। 2017 में एक सीट जीतकर पार्टी को संतोष करना पड़ा था, लेकिन बाद में छपरौली से रालोद से विधायक बने सहेंद्र सिंह रमाला के भाजपा ज्वाइन करने पर रालोद का विधानसभा में खाता शून्य हो गया था। या यूं कहा जाए कि सहेंद्र के भाजपा में जाने के बाद यह सीट भी भाजपा की गिनी जाने लगी थी।

इतना जरूर है कि भाजपा यहां कभी जनता के जनमत से नहीं जीत पाई, लेकिन रालोद विधायक को अपने पाले में करके छपरौली में भी सेंधमारी कर दी थी। अब चुनावी मैदान में एक तरफ जहां भाजपा है वहीं सामने रालोद-सपा गठबंधन भी है। रालोद के सामने शून्य के दाग को हटाने की अग्नि परीक्षा है। देखना यह है कि शून्य होने का जो जख्म रालोद को लगा था वह इस बार भरता है या नहीं?

सियासत के अखाड़े में कब कौन चित हो जाए और कौन बाजी मार जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि यहां फैसला जनता के हाथ में होता है। जतना के दिलों में जो राज कर जाएगा वही सत्ता के अखाड़े का विजेता होगा। परंतु कभी-कभी विजेता होकर भी पराजय की श्रेणी में आना पड़ता है। कुछ ऐसा ही रालोद के साथ पिछले चुनावों में हुआ है। रालोद कभी शिखर पर थी और लखनऊ की कुर्सी में अहम भूमिका निभाती थी, लेकिन समय की करवट के साथ रालोद शिखर से शून्य पर पहुंच गई।

रालोद को कभी धोखे मिले तो कभी मनमुटाव होकर यहां से नेता दूसरे दलों में पहुंचते चले गए। 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद रालोद की सियासी जमीन खिसकती चली गई और 2017 में महज एक सीट पर ही सिमट गई थी। 2017 के विधानसभा चुनाव में रालोद अपनी परंपरागत सीट छपरौली ही जीत पाई थी, लेकिन वह जीत भी छपरौली के इतिहास की सबसे कम वोटों की जीत थी। रालोद की ओर से सहेंद्र सिंह रमाला व भाजपा से सतेंद्र तुगाना में कांटे का मुकाबला हुआ था। जिसमें सहेंद्र सिंह ने जीत दर्ज की थी। सहेंद्र सिंह रमाला ने रालोद से जीत दर्ज करने के बाद 2018 में भाजपा का दामन थाम लिया था।

यानी विधानसभा में रालोद शून्य हो गई थी। जो रालोद कभी सत्ता परिवर्तन की सीटों को अपने पास रखती वह 2018 में शून्य हो गई थी। उस समय सहेंद्र सिंह का पाला बदलना भले ही कोई मुख्य कारण रहा हो, लेकिन सियासी अखाड़े में रालोद दल बदलने की नीति से चित हो गई थी। या यूं कहें कि छपरौली विधायक की गिनती भी भाजपा के रूप में होने लगी थी। जिस छपरौली को रालोद का अभेद किला कहा जाता है वहां से भी रालोद का खाता खुला नहीं रहा। हालांकि रालोद जनमत के माध्यम से यहां कभी नहीं हारी है और दूसरी पार्टियों को ही यहां हार का मुंह देखना पड़ा है।

अब फिर से विधानसभा चुनाव का सियासी अखाड़ा सजा हुआ है और राजनीतिक पार्टियों की ओर से खिलाड़ी उतारे गए हैं। वह जनता के द्वार जाकर जीत के लिए एडी-चोटी तक का जोर लगा रहे हैं। इतना जरूर है कि इस बार भी छपरौली में रालोद सपा का मुकाबला भाजपा से माना जा रहा है। यहां कांग्रेस, बसपा व आप ने भी अपने प्रत्याशी उतारे हैं। उन पर भी सभी की निगाहें टिकी है। देखा जाए तो रालोद के सामने अपने वजूद को तय करने की अग्नि परीक्षा है।

क्योंकि छपरौली की जनता ने जनमत हमेशा रालोद को दिया है, भले ही बाद में पाला बदलने से वह शून्य हो गई हो। इस बार रालोद मुखिया चौधरी जयंत सिंह के सामने शून्य से उठने की जहां अग्नि परीक्षा है वहीं पिता चौधरी अजित सिंह के बिना उनका पहला चुनाव भी है। वह इस चुनाव में छपरौली सहित पूरे प्रदेश में कहां तक सफल होते हैं, इस पर सभी की निगाहें हैं। जो जख्म शून्य होने का लगा है|

उसे वह कहां तक भर पाते हैं? छपरौली की जनता इस बार किस ओर फैसला लेगी, यह भी देखने वाली बात होगी? क्योंकि कहीं न कहीं शून्य होने का दर्द जरूर पार्टी व उसके समर्थकों को हुआ है। उसका क्या परिणाम होगा? यह तो समय ही बताएगा, लेकिन छपरौली पर सभी की निगाहें टिकी हैं।

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