Wednesday, June 17, 2026
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महाराष्ट्र सरकार का काला कानून

 

SAMVAD


Screenshot 2024 07 16 115103भाजपा सरकार के आने के बाद केंद्र सरकार तथा भाजपा शासित राज्य सरकारें जनआंदोलनों का दमन करने के लिए अनेक काले कानूनों को लागू कर रही हैं, इसी कड़ी में महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना के धड़े द्वारा शासित राज्य सरकार ने एक काले कानून को लागू करने का विधेयक विधानसभा में पेश किया। महाराष्ट्र सरकार ने गुरुवार को महाराष्ट्र विशेष सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक पेश किया, जिसमें कहा गया कि ‘नक्सलवाद का खतरा’ नक्सली संगठनों के माध्यम से शहरी क्षेत्रों में बढ़ रहा है। विधेयक 2024; जो जेल की सजा का प्रस्ताव करता है, भले ही कोई व्यक्ति किसी गैरकानूनी संगठन का सदस्य न हो, लेकिन कोई योगदान या सहायता देता है, प्राप्त करता है, मांगता है या उसके सदस्य को पनाह देता है, साथ ही उन लोगों के लिए भी; जो ऐसे समूहों की बैठक को बढ़ावा देते हैं या बढ़ावा देने में सहायता करते हैं’। विधेयक राज्य सरकार को किसी संगठन को ‘गैरकानूनी’ घोषित करने का अधिकार देता है। यह एक ऐसा निर्णय है,जिसकी समीक्षा राज्य सरकार द्वारा गठित सलाहकार बोर्ड द्वारा की जा सकती है। महाराष्ट्र में ‘माओवादी नेटवर्क के सुरक्षित ठिकानों और शहरी ठिकानों’ का हवाला देते हुए इसमें कहा गया है कि ऐसे समूह ‘संवैधानिक जनादेश के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह की अपनी विचारधारा का प्रचार’ करना चाहते हैं। विधेयक में ‘गैरकानूनी गतिविधि’ को इस प्रकार परिभाषित किया गया है, जो सार्वजनिक व्यवस्था, शांति और सौहार्द के लिए खतरा या संकट उत्पन्न करती है। सार्वजनिक व्यवस्था ‘कानून प्रशासन या इसकी स्थापित संस्थाओं और कार्मिकों’ के रखरखाव में हस्तक्षेप करती है, किसी भी लोकसेवक पर आपराधिक बल का प्रयोग करने के लिए बनाई गई है। हिंसा, बर्बरता, आग्नेयास्त्रों, विस्फोटकों का उपयोग या रेल, सड़क, वायु या जल द्वारा संचार को बाधित करने के कार्यों में लिप्त या प्रचारित करना, ‘स्थापित कानून और इसकी संस्थाओं की अवज्ञा को प्रोत्साहित करना या प्रचार करना’, गैरकानूनी गतिविधियों को करने के लिए धन या सामान एकत्र करना।

विधेयक में कहा गया है कि इस कानून के तहत सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे तथा इनकी जांच उप-निरीक्षक स्तर से नीचे के रैंक के पुलिस अधिकारी द्वारा नहीं की जाएगी। विधेयक में अपराधों के लिए दंड का उल्लेख करते हुए कहा गया है: ‘जो कोई भी किसी गैरकानूनी संगठन का सदस्य है या किसी ऐसे संगठन की बैठकों या गतिविधियों में भाग लेता है या किसी ऐसे संगठन के प्रयोजन के लिए योगदान देता है या प्राप्त करता है या कोई योगदान मांगता है, उसे तीन साल तक की कैद की सजा दी जाएगी और साथ ही 3 लाख रुपये तक का जुर्माना भी देना होगा।’ ‘जो कोई भी किसी भी तरह से किसी गैरकानूनी संगठन का सदस्य न होते हुए ऐसे संगठन के लिए योगदान देता है, प्राप्त करता है या कोई योगदान या सहायता मांगता है या ऐसे संगठन के किसी सदस्य को शरण देता है, उसे दो साल तक की कैद की सजा दी जाएगी और 2 लाख रुपये तक का जुर्माना भी देना होगा।’

‘जो कोई भी किसी गैरकानूनी संगठन का प्रबंधन करता है या उसके प्रबंधन में सहायता करता है या किसी ऐसे संगठन या उसके किसी सदस्य की बैठक को बढ़ावा देता है या बढ़ावा देने में सहायता करता है या किसी भी तरह से या किसी भी माध्यम या उपकरण के माध्यम से ऐसे संगठन की किसी भी गैरकानूनी गतिविधि में लिप्त होता है, उसे तीन साल तक की कैद की सजा दी जाएगी और 3 लाख रुपये तक का जुर्माना भी देना होगा।’

‘जो कोई भी ऐसे गैरकानूनी संगठन की किसी गैरकानूनी गतिविधि को अंजाम देता है या करने के लिए उकसाता है या करने का प्रयास करता है या करने की योजना बनाता है, उसे सात साल तक की कैद की सजा दी जाएगी और साथ ही 5 लाख रुपये तक का जुमार्ना भी देना पड़ सकता है।’ विधेयक के अनुसार एक सलाहकार बोर्ड का गठन किया जाएगा,जिसमें तीन व्यक्ति होंगे ‘जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किए जा चुके हैं या नियुक्त किए जाने के योग्य हैं।’ किसी संगठन को गैरकानूनी घोषित करने के छह सप्ताह के भीतर सरकार को बोर्ड को एक संदर्भ देना होगा, जिसे उसके सामने रखे गए साक्ष्यों की जांच करने और संगठन में शामिल व्यक्तियों की सुनवाई करने के बाद तीन महीने के भीतर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, यदि बोर्ड किसी संगठन को गैरकानूनी घोषित करने के लिए पर्याप्त कारण खोजने में विफल रहता है, तो सरकार अधिसूचना को रद्द कर देगी।

विधेयक के ‘उद्देश्यों और कारणों के विवरण’ में कहा गया है, ‘नक्सलवाद का खतरा केवल नक्सल प्रभावित राज्यों के दूरदराज के इलाकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि नक्सली संगठनों के माध्यम से शहरी इलाकों में भी इसकी मौजूदगी बढ़ रही है। नक्सली समूहों के सक्रिय संगठनों के प्रसार से उनके सशस्त्र कैडरों को रसद और सुरक्षित शरण के मामले में निरंतर और प्रभावी सहायता मिलती है। नक्सलियों के जब्त साहित्य से पता चलता है कि महाराष्ट्र राज्य के शहरों में माओवादी नेटवर्क के ‘सुरक्षित घर’ और ‘शहरी ठिकाने’ हैं। नक्सली संगठनों या उनके जैसे संगठनों की गतिविधियां उनके संयुक्त मोर्चे के माध्यम से आम जनता के बीच अशांति पैदा कर रही हैं, ताकि संवैधानिक जनादेश के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह की उनकी विचारधारा का प्रचार किया जा सके और सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित किया जा सके।’

पिछले साल नवंबर में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस; जो गृह विभाग भी संभालते हैं-ने कहा था कि राज्य सरकार अन्य राज्यों के इसी तरह के कानूनों का अध्ययन कर रही है। इस बीच विपक्ष ने इसे ‘कठोर कदम’ बताया है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस विधायक पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा, ‘यह विरोध को दबाने के अलावा और कुछ नहीं है…सरकार इस विधेयक को आज ही पेश करना और पारित करना चाहती थी। हमने इसका विरोध किया और स्पीकर से अनुरोध किया कि इसे आगे न बढ़ाया जाए। हम इस विधेयक का पुरजोर विरोध करेंगे।’

वास्तव में कुछ वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया था-‘किसी भी व्यक्ति को किसी गैरकानूनी संगठन का सदस्य होने पर तब तक सजा नहीं दी जा सकती, जब? तक कि वह सीधे-सीधे किसी हिंसक गतिविधियों में शामिल न हो।’ वास्तव में यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के इसी निर्णय को निष्क्रिय करने के लिए लाया गया है। पिछले दिनों देश के अनेक राज्यों में अर्बन नक्सल के नाम पर ढेरों कार्यकर्ताओं, वकीलों, लेखकों, पत्रकारों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पहले के दिए गए निर्णयों के कारण उन्हें रिहा करना पड़ा। वास्तव में यह विधेयक देश में फासीवादी राज्य को वैधानिक जामा पहनाने जैसा है, इसीलिए सभी जनपक्षधर ताकतों को इस तरह के काले विधेयकों तथा कानूनों का पुरजोर विरोध करना चाहिए।


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