
बीते कुछ दिनों में देश की सियासत में जो कुछ हो रहा है, उससे भले ही सरकार बन और बिगड़ रही हों, लेकिन इससे लोकतंत्र की मूल आत्मा पर कुठाराघात तो हुआ ही है। एक तो सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्शन बॉन्ड से राजनीतिक दलों की चंदा लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी पाई और उसे अवैध घोषित कर दिया। फिर चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण के बाद एक समाचार पोर्टल ने बताया कि किस तरह राजनैतिक चंदे- सरकार और सरकार की जांच एजेंसियों के बीच मिलीभगत होती है। उसी दौरान चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव में महज 36 में से आठ वोट लूट लिए गए, वह भी कैमरे के सामने और सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव परिणाम में दखल दिया। हाल ही में संपन्न राज्यसभा चुनावों के दौरान भले ही बात कर्णाटक की हो या फिर बिहार, उत्तर प्रदेश या हिमाचल प्रदेश की, एक बात स्पष्ट है कि सुनियोजित तरीके से आम लोगों को भरोसा दिलवाया जा रहा है कि नैतिकता और वैचारिकता का चरम पतन बहुत बढ़िया बात है, क्योंकि मीडिया में पीड़ित या जिसके लोगों ने पाला बदला, उसे निकम्मा और वहीं अनैतिकता को बढ़ावा देने वाले को विजेता के रूप में पेश किया जा रहा है। दूसरी बात स्पष्ट है कि संविधान निहित दलबदल कानून अब रद्दी का टुकड़ा है और यह केवल ताकतवर को और शक्ति देने के लिए ही दुरुपयोग का है। तीसरा अब मान लो कि लोकतंत्र का अर्थ है -जिसकी लाठी, उसकी भैंस। जिस राज्य में जिसकी ताकत है वह वोट लूट लेगा। आम लोग जो मत या वोट देते हैं वह नेता के लिए लाखों की कमी का जरिया मात्र है।
भारत में लोकतंत्रात्मक गणराज्य का सपना देखने वाले सेनानियों का मत था कि ‘वोट के लिए निजी अपील करना संसदीय लोकतंत्र और सामूहिक हित की भावना के प्रतिकूल है। वोट मांगने का काम केवल सार्वजनिक सभाओं के जरिए होना चाहिए।’ यदि कोई भी सरकार लोकतंत्र की इस मूल भावना को जीवित रखने के लिए निर्वाचन प्रक्रिया में आमूल-चूल परिवर्तन करती है तो आम आदमी खुद को लोकतंत्र के करीब समझेगा। असल में यह किसी से छिपा नहीं है कि चुनाव बहुत खर्चीले हो गए हैं। किसी भी दल से टिकट पाना हो या प्रचार के लिए समर्थकों को मैदान में भेजना या फिर मतदाताओं को रिझाना-लुभाना, सभी कुछ केवल धन पर आश्रित है और चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित सीमा में ये सब खर्च संभव नहीं होता। ऊपर के खर्चों के लिए ऊपर से ही कमाई होती है और इस राह में अनाचार, भ्रष्टाचार और दुराचार को विजेता की नैतिकता का जामा पहना दिया जाता है।
यह समय की मांग है कि एक जनकल्याणकारी और लोकतंत्रात्मक शासन के लिए चुनावी तंत्र में आमूल चूल परिवर्तन अनिवार्य है और इसकी शुरुआत वित्तीय तंत्र से ही करना होगा। ऐसा नहीं कि चुनाव सुधार के कोई प्रयास किए गए नहीं, लेकिन विडंबना है कि सभी सियासती पार्टियों ने उनमें रूचि नहीं दिखाई। वीपी सिंह वाली राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार में कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी की अगुआई में 1990 में गठित चुनाव सुधारों की कमेटी का सुझाव था कि राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दलों को सरकार की ओर से वाहन, र्इंधन, मतदाता सूचियां, लाउड-स्पीकर आदि मुहैया करवाए जाने चाहिए। इसमें यह भी कहा गया था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को न केवल सरकार के अंतर्गत किसी नियुक्ति बल्कि राज्यपाल के पद सहित किसी अन्य पद के लिए अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। साथ ही किसी भी व्यक्ति को दो से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों पर चुनाव लड़ने की अनुमति न देने, निर्दलीय चुनाव लड़ने पर जमानत राशि बढ़ाने की बात भी इस रिपोर्ट में थी।
इन सिफारिशों में से केवल एवीएम से चुनाव को लागू किया गया, शेष सुझाव कहीं ठंडे बस्ते में पड़े हैं। वैसे भी आज के भ्रष्ट राजनैतिक माहौल में समिति की आदर्श सिफारिशें कतई प्रासंगिक नहीं हैं। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि नेता महज सरकारी खर्चे पर ही चुनाव लड़ लेंगे या फिर सरकारी पैसे को ईमानदारी से खर्च करेंगे। 1984 में भी चुनाव खर्च संशोधन के लिए एक गैर सरकारी विधेयक लोकसभा में रखा गया था, पर नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा।
सन 1962 में सांसद के. संथानम की अध्यक्षता में चार सांसद और दो आल अफसरों की एक कमेटी भ्रष्टाचार के विभिन्न पहलुओं के जांच के लिए गठित की गई थी। हालांकि इस कमेटी के दायरे में राजनीतिक लोग नहीं थे, फिर भी 1964 में आई इसकी रिपोर्ट में कहा गया था कि राजनैतिक दलों का चंदा एकत्र करने का तरीका चुनाव के दौरान और बाद में भ्रष्टाचार को बेहिसाब बढ़ावा देता है। 1970 में प्रत्यक्ष कर जान के लिए गठित वांचू कमेटी की रपट में कहा था कि चुनावों में अंधाधुंध खर्चा काले धन को प्रोत्साहित करता है। इस रपट में प्रत्येक दल को चुनाव लड़ने के लिए सरकारी अनुदान देने और प्रत्येक पार्टी के एकाउंट का नियमित आॅडिट करवाने के सुझाव थे। 1980 में राजाचलैया समिती ने भी लगभग यही सिफारिशें की थीं। ये सभी दस्तावेज अब भूली हुई कहानी बन चुके हैं।
अगस्त 1998 में एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए थे कि उम्मीदवारों के खर्च में उसकी पार्टी के खर्च को भी शामिल किया जाए। आदेश में इस बात पर खेद जताया गया था कि सियासती पार्टियां अपने लेन-देन खातों का नियमित आॅडिट नहीं कराती हैं। अदालत ने ऐसे दलों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही के भी निर्देश दिए थे। लेकिन हुआ कुछ भी नहीं।
असल बात तो यह है कि अब चुनाव आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है, उसी का परिणाम है कि उससे उपजा प्रतिनिधि भी जनता से बहुत दूर है। तभी उसके समाज से सरोकार नहीं है और जनता भी वोट देने के बावजूद उसे अपना प्रतिनिधि नहीं मानती। दिनों दिन बढ़ती यही दूरी लोकतंत्र को नए किस्म की राजशाही में परिवर्तित कर रही है। चुनाव प्रक्रिया में शुचिता, पारदर्शिता और खर्च काम करना आज लोकतंत्र के सशक्तिकरण की अनिवार्य जरूरत है।


