Friday, May 15, 2026
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सामाजिक हैसियत का आइना भी है कॅरियर

कैरियर हमेशा सिर्फ कमाई का साधन ही नहीं रहा, वह सामाजिक हैसियत का आईना भी होता है, इस बात को हम सब जानते हैं। एक जमाने में डॉक्टर और इंजीनियर बनना महज एक पेशा चुनना नहीं था बल्कि में सोशल स्टेटस हासिल करना भी था। ठीक उसी तरह से जैसे इन दिनों किसी टेक्नो स्टार्टअप का फाउंडर होना या किसी बड़ी टेक कंपनी में मैनेजमेंट में होना है।

विजय गर्ग

इस समय के सोशल स्टेटस कैरियर्स में डेटा साइंटिस्ट, एआई एक्सपर्ट जैसे टेक वर्ल्ड के नये डॉक्टर, इंजीनियर , फिल्म और ओटीटी से जुड़े क्रिएटिव कैरियर स्टेटस सिंबल हैं। सोशल मीडिया में बड़ा कंटेंट क्रिएटर होना भी स्टेटस है। लेकिन सबसे लोकप्रिय कैरियर स्पोर्ट्स की दुनिया से आते हैं, वह भी क्रिकेट और बैडमिंटन जैसे खेलों से। लेकिन अगर टेक्नोलॉजी की ठोस दुनिया की बात करें तो ग्रीन एनर्जी और हेल्थ केयर सेक्टर ऐसे क्षेत्र हैं, जहां कैरियर बनाना स्टेटस सिंबल है।

आईसीएस, आईएएस की शान

लेकिन आज के ये तमाम कैरियर एक दशक के पहले तक भी रोजगार के परिदृश्य में नहीं थे और अगर थे भी तो इनकी खास हैसियत नहीं थी। आजादी के बाद अलग-अलग दशकों में अलग अलग कैरियर भारत में सोशल स्टेटस सिंबल रहे हैं। अगर 1950 से 1960 के दशक तक सरकारी अफसर होना विशेषकर आईसीएस, आजादी के बाद में आईएएस और आईपीएस होना न सिर्फ कैरियर के लिहाज से बल्कि समाज में इज्जत के लिहाज से भी शानदार था।

डॉक्टर और प्रोफेसर की प्रतिष्ठा का दौर

इसके बाद 1960 के दशक में जिन पेशों को हम समाज की नजरों में सबसे ऊंचा पेशा गिन सकते थे, उनमें डॉक्टर और प्रोफेसर की इंट्री हो गई। नेहरू युग में विज्ञान, स्वास्थ्य और शिक्षा पर खूब जोर दिया गया था, साथ ही इन पेशों की अच्छी खासी इज्जत भी बनी। सत्तर के दशक में यह हैसियत इंजीनियरों और पीएसयू में प्रोफेशनल्स होना कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया था। दरअसल 1970 का दौर भारी उद्योग और पब्लिक सेक्टर का दौर था। इसी दौर में भेल, सेल और ओएनजीसी पब्लिक उपक्रम देश की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाने वाले उपक्रम बनकर उभरे थे। ऐसे में इन संस्थानों में इंजीनियर होना, सामाजिक रूप से गर्व की बात थी और यही वह दौर था, जब आईआईटी से निकलना भी हीरो बनने के जैसा था।

बैंक मैनेजर और रेलवे के अफसर

1980 का दशक आते-आते बैंक और वित्तीय संस्थानों में अधिकारी होना महत्वपूर्ण हो गया था। दरअसल 1980 के दशक में हर कोई अपना कारोबार जमाने या अपनी हैसियत को ऊपर उठाने के लिए बैंक से लोन लेकर आगे बढ़ रहा था। इन दिनों बड़े पैमाने पर देश में पक्के मकान बनने शुरू हुए और होम लोन का एक सिलसिला भी। जिस कारण समाज में बैंकों की भूमिका महत्वपूर्ण बन गई। 1980 के पहले बैंकों से रिश्ता बमुश्किल 20-25 फीसदी भारतीयों का था, उसके बाद 40-50 प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप से बैंक से जुड़ने लगे। जाहिर है इस दौर में बैंक आॅफिसर होना महत्वपूर्ण हो गया था। उस दौर में बैंक मैनेजर की पूछ बहुत ज्यादा बढ़ गई थी। इसके अलावा एलआईसी में मैनेजर के पद में होना, रेलवे में बड़ा अधिकारी होना और टेलीकॉम सेक्टर में इंजीनियर होना भी शानदार था।

आईटी और एमबीए के चमकते कैरियर

फिर आया 1990 का दशक जिसमें आईटी और एमबीए सबसे महत्वपूर्ण सोशल स्टेटस बनाने वाले कैरियर बनकर उभरे। लिबरलाइजेशन के बाद भारत में पहली बार आईटी क्रांति हुई, इन्फोसिस, टीसीएस और विप्रो जैसी कंपनियों में नौकरी पाना आईएएस या आईपीएस से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया। आईआईएम से एमबीए और एमएनसी में जाना स्टेटस सिंबल बन गया। एनआरआई खास तौरपर अमेरिका में नौकरी भी समाज की सबसे ऊपरी प्रतिष्ठा का हिस्सा बन गया। कारपोरेट मैनेजमेंट और ग्लोबल कैरियर पढ़े-लिखे शहरी, मिडल क्लास के बीच सबसे बड़े सोशल स्टेटस सिंबल बने।

स्टार्टअप, क्रिएटिव इंडस्ट्री से एआई

लेकिन साल 2000 का दशक आते-आते स्टार्टअप और क्रिएटिव इंडस्ट्री की दुनिया चमकी। जिस कारण फ्लिपकार्ट, पेटीएम, ओला जैसे स्टार्टअप फाउंडर्स को समाज में हर कोई जानने लगा और इनकी चर्चा होने लगी। डिजिटल मीडिया, फिल्म निर्माण और फैशन इंडस्ट्री भी स्टेटस का प्रतीक बन गये। कारपोरेट लॉयर के अलावा चार्टर्ड एकाउंटेंट का पेशा भी महत्वपूर्ण सोशल स्टेटस बना। जबकि 2020 के दशक में टेक और सोशल इम्पैक्ट में एआई, रोबोटिक और डाटा साइंस ने हैसियत की जगह घेर ली और सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर्स तथा कंटेंट क्रिएटर भी बड़े पैमाने पर नोटिस लिए जाने लगे। इसी दौरान ग्रीन एनर्जी और क्लाइमेट इंटरप्रिन्योर की भी प्रतिष्ठा बढ़ी। क्रिकेट के अलावा इस दौर में सफल खिलाड़ी भी महत्वपूर्ण कैरियर माने गये।

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