Monday, March 1, 2021
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शहर की डेयरियों से ड्रेनेज सिस्टम ध्वस्त

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  • कोर्ट में जवाब दाखिल करने में अफसर दो कदम आगे, चार कदम पीछे
  • डेयरी संचालकों ने अफसरों के पाले में डाली गेंद, मांगी कैटल कालोनी
  • डेयरियों से प्रतिदिन निकल रहा 200 मिट्री टन गोबर बहाया जा रहा है नाले नालियों में
  • दम फूलने लगा है महानगर के ड्रेनेज सिस्टम का, मानसून में शहर के जलमग्न होने की आशंका

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: दूध डेयरियों ने महानगर का ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह से डेमेज कर दिया है। वहीं, दूसरी ओर पशु डेयरियों को शहर से बाहर आबादी से दूर शिफ्ट किए जाने को लेकर दायर की गई जनहित याचिका पर हाईकोर्ट में अंतिम सुनवाई एक मार्च को होगी। इससे पहले मेरठ के अफसरों को कोर्ट में जवाब दाखिल करना है।

अफसरों की यदि बात की जाए तो जवाब दाखिल करने में दो कदम आगे और चार कदम पीछे हो रहे हैं। पूर्व में डेयरियों को आबादी से बाहर किए जाने को लेकर जो जवाब कोर्ट में दाखिल किए गए हैं जनहित याचिका दायर करने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट लोकेश खुराना ने उन्हें झूठ का पुलिंदा बताया है।

उनका कहना है कि डेयरियों को बाहर किए जाने के अफसरों के दावों और जमीनी हकीकत में जमीन आसमान का फर्क है। डेयरियों को बाहर किए जाने के नाम पर निगम अफसरों ने सिर्फ सरकारी खजाने पर प्रतिमाह 90 लाख रुपये का भार डालने का काम किया इससे ज्यादा और कुछ नहीं। प्रवर्तन दल पर आए दिन सवाल खडेÞ किए जाते हैं।

ये है डेयरियों की स्थिति

मेरठ में यदि पशु डेयरियों की बात की जाए तो उनकी संख्या लगभग दो हजार आंकी गई है। इनमें से करीब 150 डेयरियां कैंट क्षेत्र में हैं। इसको लेकर दायर की गई एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने मेरठ के अफसरों को डेयरियों को आबादी से दूर शिफ्ट किए जाने के आदेश दिए हैं। कोर्ट के आदेश के बाद कुछ डेयरियों को बाहर भी किया गया, लेकिन जितनी डेयरियां बाहर किए जाने का दावा किया गया आरटीआई एक्टिविस्ट का दावा है कि उससे ज्यादा डेयरियां इस वक्त शहर और कैंट में मौजूद हैं।

कार्रवाई के नाम पर खेल

डेयरियों को बाहर किए जाने की कार्रबाई के सवाल पर नगर निगम प्रशासन अक्सर पुलिस प्रशासन से सहयोग न मिलने की बात कह कर जिम्मेदारी से भागता आया है। इसके चलते निगम ने अपनी प्रवर्तन दल बना लिया। डेयरियों को आबादी से बाहर किए जाने की कार्रवाई को लेकर प्रवर्तन दल पर भी गंभीर आरोप लगे। शायद यही कारण है कि मकबरा और दूसरे घनी आबादी वाले इलाकों से डेयरियां बाहर नहीं की जा सकीं। ऐसे ही कुछ आरोप कैंट प्रशासन पर भी लगते रहे हैं। जिन डेयरियों को बाहर किए जाने की बात कही गई है। उनमें से कुछ स्थानों पर पहले जैसे हालात बन गए हैं।

अफसरों के पाले में गेंद

इस मामले में अब डेयरी संचालकों ने अफसरों के पाले में गेंद डाल दी है। उनका कहना है कि पशु डेयरियां उनकी आजीविका का साधन है। वो इसको नहीं छोड़ सकते, लेकिन यदि डेयरियों को बाहर ले जाना है तो प्रशासन उन्हें स्थान का विकल्प दे। वो अपने पशुओं को ले जाने को तैयार हैं। प्रशासन जहां भी जगह देगा वो वहीं पर डेयरियां शिफ्ट कर लेंगे।

अफसर काट रहे कन्नी

पशु डेयरियों को आबादी से बाहर किए जाने के सवाल से अब अफसर कन्नी काट रहे हैं। दरअसल कोर्ट में चल रही सुनवाई में प्रशासन ही नहीं बल्कि एमडीएम व नगर निगम भी पार्टी बनाया गया है। प्रशासन की ओर से प्राधिकरण व निगम अफसरों को आगे किए जाने का प्रयास किया जा रहा है। निगम अफसरों का रवैया प्राधिकरण के पाले में गेंद डालने का है। प्राधिकरण प्रशासन ने डेयरियों के नाम पर जगह की व्यवस्था से हाथ खडेÞ कर दिए हैं। आरटीआई एक्टिविस्ट लोकेश खुराना ने बताया कि मेरठ महा योजना का खाका तैयार करने वाले प्राधिकरण के अफसर पशु डेयरियोें को इस योजना में शामिल करना भूल गए।

अंतिम सांस ले रहा ड्रेनेज सिस्टम

पशु डेयरियों से प्रति दिन 200 मिट्री टन गोबर उत्सर्जित की जानकारी आरटीआई एक्टिविस्ट ने दी है। उन्होंने बताया कि डेयरियों से निकलने वाले गोबर के निस्तारण की कोई योजना किसी के भी पास नहीं। इसी कारण से इतनी बड़ी मात्रा में उत्सर्जित होने वाला गोबर नाले नालियों में बहा दिया जाता है। इसी कारण से शहर का डैÑनेज सिस्टम अंतिम सांस ले रहा है। वह पूरी तरह से डेमज होने की कगार पर है, लेकिन अफसरों का रवैया बजाए उसके इलाज के उसकी मौत का तमाश देखने सरीखा है।

टापू में तब्दील होगा शहर

डेयरियों से निकलने वाले गोबर के कारण डेमेज रहे डैÑनेज सिस्टम को यदि नहीं बचाया जा सकता तो इस साल मानसून के माह में यदि अच्छी बारिश हो गई तो शहर के निचले ही नहीं बल्कि दूसरे वो इलाके जिन्हें पॉश कहा जाता है वो भी टापू में तब्दील होंगे। नाले नालियों के चौक होने के कारण पानी का बहाव पूरी तरह से रूकेगा जिसके चलते पूरा शहर टापू में तब्दील होना तय है।

ये कहना है आरटीआई एक्टिविस्ट का

आरटीआई एक्टिविस्ट लोकेश खुराना का कहना है कि एक मार्च को डेयरी के मुद्दे पर हाईकोर्ट में अंतिम सुनवाई होनी है। उससे पहले कोर्ट से प्रार्थना की गई है कि इस मामले से जुडे मेरठ के तमाम विभागों के अफसरों से जवाब दाखिल करने को कहा जाए।

ये कहना है डेयरी संचालकों का

शहर और कैंट के डेयरी संचालकों का कहना है कि डेयरी उनकी आजीविका का साधन हैं। यदि डेयरी आबादी से दूर शिफ्ट की जानी हैं तो उन्हें स्थान दिया जाए। वो अपनी डेयरियां आबादी से दूर शिफ्ट करने को तैयार हैं, लेकिन यह बताया जाए कि पशुओं को कहां लेकर जाएं।

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