Saturday, April 17, 2021
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अंतहीन हो गए नक्सली हमले ?

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गत शनिवार को छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के ताजा सर्च आपरेशन के दौरान नक्सलियों द्वारा उसके व पुलिस के 24 जवानों को शहीद और इससे ज्यादा को घायल कर देने के बाद, भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह ने दोहरा रहे हैं कि जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा लेकिन एक बार फिर साफ हो गया है कि केंद्र व नक्सल प्रभावित राज्यों में सत्ता परिवर्तनों के बावजूद नक्सल समस्या के सिलसिले में कुछ भी नहीं बदला है। ठीक है कि सुरक्षाबलों ने इस आपरेशन में कई नक्सलियों को भी मार गिराया है, लेकिन इससे जवानों की शहादतों का त्रास कतई कम नहीं होता। वैसे ही, जैसे कांग्रेस व भाजपा के नेताओं के बीच नए सिरे से शुरू आरोपों-प्रत्यारोपों का सिलसिला भी छिपा नहीं पाता कि नक्सलवाद के जन्मकाल से ही उससे निपटने को लेकर चला आ रहा नीतिगत असमंजस अभी भी जस का तस बना हुआ है। सुरक्षाबलों पर नक्सलियों के हमले थम जाते हैं तो दावे किए जाने लगते हैं कि यह बलों के ऑपरेशन की सफलता है और अपने नेताओं के लगातार मारे या पकडे़ जाने से नक्सलियों का मनोबल टूट गया है। लेकिन जैसे ही किसी ऑपरेशन के दौरान नक्सली भारी पड़ते दिखते हैं, राजव्यवस्था के शब्दवीर ‘पुराना कहा सुना माफ’ की तर्ज पर अपने गलत आकलन पर कतई अफसोस न जताते हुए ‘कायराना नक्सली हरकत’ के खिलाफ शब्दभंडार खाली करने लग जाते हैं।

कोई उसे ‘लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला’ बताने लग जाता है और कोई शर्मनाक। जनहानि ज्यादा हुई तो बर्बर व जघन्य जैसे शब्द भी इस्तेमाल किए जाने लगते हैं। फिर तो नक्सलियों का टूटा हुआ मनोबल उनके बढ़ते मंसूबों में बदल जाता है और बताया जाने लगता है कि वे नेपाल के पशुपतिनाथ से आंध्र प्रदेश के तिरुपति तक ‘लाल गलियारे’ में अपनी स्थिति मजबूत कर बड़ी चुनौती पेश करने का मंसूबा बांध रहे हैं।

सवाल है कि क्या हर चुनौती के वक्त ऐसी ही शब्दवीरता की आड़ लेने वाली राजव्यवस्था को नक्सली समस्या के लगातार नासूर बनती जाने की जिम्मेदारी से बरी किया जा सकता है? नक्सलियों ने कब कहा कि उनका लोकतंत्र में अगाध विश्वास है और वे उसकी परीक्षा देने को तैयार हैं।

उन्होंने तो इस राजव्यवस्था को उखाड़ फेंकने को अपना खुला लक्ष्य घोषित कर रखा है और दावा करते हैं कि उनके पास उसकी प्राप्ति की दीर्घकालिक योजना है। उनके शिविर में भी कोई इस योजना के आड़े आता है तो वे उसे बख्शते नहीं। अब यह तो राजव्यवस्था की समस्या है कि वह उनके युद्ध को महज लाल आतंक के रूप में देखती है और निर्णायक ढंग से नहीं निपट पाती। इस अर्थ में नक्सलविरोधी अभियानों में जितनी भी मौतें होती हैं, वे नक्सलवादियों की हों, सुरक्षाबलों की या इन दोनों के शिकार निदोर्षों की, सबकी जिम्मेदार यह राजव्यवस्था ही है, जो कभी आॅपरेशन ग्रीनहंट की सोचती है यानी अपने ही नागरिकों के खिलाफ सेना के इस्तेमाल की और कभी ‘नक्सलपीड़ित’ आदिवासियों का विश्वास जीतने की बातें करने लगती है।

कभी वह नक्सली समस्या को सामाजिक आर्थिक समस्या मानती है तो कभी कानून व्यवस्था की समस्या तक सीमित कर देती और कभी सलवा जुड़ूम के नाम पर आदिवासियों को आपस में भिड़ाकर कांटे से कांटा निकालने के फेर में अपने हाथ जला बैठती है।

कभी कहती है कि नक्सलियों से वार्ता को तैयार है, तो कभी वार्ता की मेज तक से उठाकर नापसंदों की हत्याएं करवाने लग जाती है। कई बार यह भी कहती है कि जिनका भारत के संविधान व लोकतंत्र में विश्वास नहीं है, उनसे कैसे बात करें? अलबत्ता, नक्सली किसी बड़े नेता या अधिकारी को पकड़ ले जाएं तो उसे छुड़ाने के लिए उनके सामने घुटने भी टेकती है और उनसे बात भी करती है।

2004 में डॉ. मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री पद संभालते ही नक्सलवाद को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बताया था और उनके गृहमंत्री पी चिदम्बरम नक्सलप्रभावित क्षेत्रों में आपेरशन ग्रीन हंट के सबसे बड़े पैरोकार बनकर उभरे थे। यह और बात है कि इस सरकार के दस सालों में इस समस्या से कुछ इस तरह निपटा गया कि वह और जटिल हो गई।

याद कीजिए, उन दिनों नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में, और तो और, अहिंसक गांधीवादियों तक की सक्रियता मुश्किल हो चली थी। उनके आंदोलनों को भी नक्सलियों का सहयोगी बताकर ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता था। अब नरेंद्र मोदी की सरकार ने इस रूप में इस सिलसिले में एक और कड़ी जोड़ी है कि जो सामाजिक या राजनीतिक कार्यकर्ता उसके खिलाफ मुंह खोलते या उससे असहमति जताते हैं, अरबन नक्सल बताकर उनके दमन पर आमादा हो जाती है।

राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलित किसानों में भी उसे अल्ट्रा लेफ्ट या नक्सली ही ज्यादा दिखाई देते हैं। लेकिन इस सच्चाई को सामने आने देना उसे गवारा नहीं कि मनमोहन के मुकाबले उसके काल में नक्सल समस्या और हमले बढ़े ही हैं।

सरकारी विभागों का दूसरा काम है-सरकारी तंत्र से जवाबदेही की मांग करने और उसके शोषण, उत्पीड़न व भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का ‘शिकार’ करना। यह ‘शिकार’ पल-पल की जासूसी करके उनका मनोबल तोड़ने से लेकर उन्हें नक्सलियों के साथ नत्थी करने तक कुछ भी हो सकता है।

गौरतलब है कि ये वही विभाग हैं, जिन्हें कई बार नक्सली हमलों की भनक तक नहीं मिल पाती। इन हालात में सोचने की बात है कि लोकतंत्र और उसके मूल्यों पर बड़े हमले नक्सली कर रहे हैं या यह राजव्यवस्था? वह देश के लोकतंत्र को सच्चा लोकतंत्र रहने देती, आदिवासियों समेत देशवासियों के बड़े हिस्से को उसके दायरे से बाहर न करती, शोषण, गैरबराबरी व सैन्य प्रवृत्तियों पर निर्भर न करती और भविष्य निर्धारण में सबकी भागीदारी सुनिश्चित करती तो क्या नक्सली इतने ताकतवर हो पाते? क्या वे आंतरिक लोकतंत्र से महरूम राजनीतिक पार्टियों के जनता से डिसकनेक्ट से ही सबसे ज्यादा लाभान्वित नहीं हो रहे?

विडम्बना यह कि कई भाई इन सवालों का सामना करने के बजाय कहते हैं कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए! लेकिन राजनीति नहीं होगी तो नक्सली क्षेत्रों के लिबरेट हो जाने पर भी वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया के होल्ड के हालात कैसे पैदा होंगे? वहां स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व कैसे उभरेगा? अभी तो वहां सुरक्षाबलों की गतिविधियों से ही सरकारों के होने का पता चलता है और राजव्यवस्था राजधानियों में मोद मनाती रहती है।

नक्सलियों से मात खाकर भी वह न अपनी नीति या रणनीति बदलती है, न अपने गिरेबान में झांकती है। नक्सलियों को विकासविरोधी बताती है तो यह नहीं बताती कि खुद उसे आदिवासियों से ज्यादा कारपोरेट के कल्याण की चिंता क्यों रहती है और किसी समस्या के मूल कारणों को की ओर से आंखें मूंदकर उसे कैसे खत्म किया जा सकता है?


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