
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 3 दिसंबर को पहली बार 90 रुपये के स्तर को पार कर गया, जबकि 2 दिसंबर को रुपया 89.95 के स्तर को पार कर गया था। रुपया इस साल की शुरुआत से अब तक 5 प्रतिशत से अधिक गिर चुका है और यह इस अवधि में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली एशियाई मुद्रा रही है। उल्लेखनीय है कि रुपए के 80 रुपये से 90 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंचने में महज 773 कारोबारी दिन लगे। इस बीच, डॉलर इंडेक्स, जो 6 करेंसियों के मुकाबले डॉलर की मजबूती को मापता है, 0.13 प्रतिशत गिरकर 99.22 के स्तर पर आ गया और देसी बाजार में 3 दिसंबर को लगातार चौथे दिन इसमें गिरावट दर्ज की गई।
रुपए के कमजोर होने से 3 दिसंबर को कारोबार के दौरान सेंसेक्स 375 अंक तक फिसल गया था, लेकिन अंत में 31.5 अंक यानी 0.04 प्रतिशत की गिरावट के साथ 85,107 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 46 अंक यानी 0.2 प्रतिशत गिरकर 25,986 पर बंद हुआ। इतना ही नहीं, 16 प्रमुख क्षेत्रीय सूचकांकों में से 11 में गिरावट दर्ज की गई। निफ्टी स्मॉलकैप 100 और निफ्टी मिडकैप 100 क्रमश: 0।7 प्रतिशत और 1 प्रतिशत टूटे। निफ्टी पीएसयू बैंक सूचकांक में सबसे ज्यादा 3.01 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो 7 महीनों में सबसे ज्यादा है।
मौजूदा प्रतिकूल परिस्थिति के कारण चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में भुगतान संतुलन 10.90 अरब डॉलर नकारात्मक हो गया, जबकि वह पिछले वर्ष की समान तिमाही में 18.6 अरब डॉलर सकारात्मक था। व्यापार घाटा भी बढ़ा है और यह भी अंदेशा है कि चालू खाते का घाटा भी चालू वित्त वर्ष में बढ़ेगा। बहरहाल। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की निकासी से बाजार और लोगों के बीच चिंता का माहौल बना हुआ है। अमेरिका के साथ कारोबारी करार पर अनिश्चितता के कारण भी बेहतर प्रतिफल की आस में विदेशी निवेशक बिकवाली कर रहे हैं।
हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक मौजूदा स्थिति से बहुत ज्यादा चिंतित नहीं है और उसे लग रहा है जल्द ही स्थिति काबू में आ जाएगी। इसलिए, उसने शुरुआती दौर में रुपए की मजबूती के लिए कोई पहल नहीं की, लेकिन बाद में भारतीय रिजर्व बैंक ने सुधारात्मक कार्रवाई की और इसके तहत राष्ट्रीयकृत बैंकों ने 2 दिसंबर को डॉलर की भारी खरीद की, जिससे रुपए में थोड़ी मजबूती आई। रुपए के लगातार कमजोर होने के कारण अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने (आईएमएफ) ने हाल में भारत के विनिमय दर व्यवस्था को स्थिर से क्रॉल-जैसी व्यवस्था की श्रेणी में डाल दिया है, जो गलत है, क्योंकि भारत निर्यात से ज्यादा आयात करता है, इसलिए, आयात और अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए देश में हमेशा डॉलर की मांग बनी रहती है और कई बार इसके कारण रुपया कमजोर होता है, लेकिन जल्द ही वह फिर से मजबूत हो जाता है। लिहाजा, मौजूदा परिवेश में भी रिजर्व बैंक चिंतित नहीं है। दूसरी तरफ, रिजर्व बैंक के पास 21 नवंबर तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 688 अरब डॉलर था, जो लगभग 11 महीने के आयात बिल की भरपाई करने के लिए पर्याप्त है।
रिजर्व बैंक के आकलन के अनुसार रुपया खुद से मजबूत हो जाएगा। यह मुमकिन भी है, क्योंकि रुपये के कमजोर होने के कारण तात्कालिक हैं और लंबी अवधि तक ये टिकने वाले नहीं हैं। गौरतलब है कि कमजोर रुपया भारतीय निर्यातकों की मदद भी करता है, क्योंकि उन्हें बेचे गए उत्पादों की कीमत डॉलर में मिलती है। हालांकि, अमेरिकी शुल्क से जो नुकसान हो रहा है, उसकी पूरी तरह भरपाई रुपये के अवमूल्यन से नहीं हो सकती है। फिर भी, इससे भारतीय निर्यातकों को नए बाजार का विकल्प तलाशने में कुछ मदद जरूर मिलेगी। पुनश्च: रुपया दूसरी मुद्राओं की तुलना में जरूर गिरा है, लेकिन कोरोना महामारी के बाद से यह चीन की मुद्रा युआन के मुकाबले काफी मजबूत हुआ है। इसके कारण चीन से आयात करना वर्तमान में सस्ता हो गया है। इससे चीन से आयात की जाने वाली बहुत सारी जरूरतें आसानी और सस्ती दरों में पूरी की जा सकती है।
अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ को खत्म करने के लिए द्विपक्षीय वार्ता चल रही है और उम्मीद है कि जल्द ही मामले में सकारात्क परिणाम निकलेंगे, क्योंकि धीरे-धीरे ट्रंप का रुख नरम पड़ रहा है। इसलिए, माना जा रहा है कि टैरिफ विवाद के खत्म होते ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक फिर से भारत में पहले की तरह निवेश करना शुरू कर देंगे। गौरतलब है कि विदेशी निवेशकों ने 2025 में अभी तक 15 अरब डॉलर की निकासी कर चुके हैं। नवंबर महीने में निर्माण क्षेत्र में धीमी वृद्धि दर्ज हुई। एचएसबीसी मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई 56.6 के स्तर पर रही, जो अक्टूबर के 59.2 से कम है। यह पिछले 9 महीनों में सबसे धीमी सुधार की स्थिति दर्शाता है। नए आॅर्डर और उत्पादन में वृद्धि बनी रही, लेकिन यह भी पिछले 9 महीनों में सबसे कम रही, लेकिन रिजर्व बैंक के द्वारा रेपो दर में हालिया कटौती करने से कर्ज और आर्थिक गतिविधियों की रफ़्तार बढ़ने की संभावना है। दरअसल, कर्ज के सस्ता होने से रियल एस्टेट, कोपोर्रेट्स और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) के कारोबार में इजाफा होने की संभावना है। इससे और रुपए के कमजोर रहने से निर्यात को भी बल मिल सकता है।
इधर,नवंबर महीने में सेवा क्षेत्र में तेजी की स्थिति बनी रही। एचएसबीसीइंडिया सर्विसेज पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) के अनुसार, सेवा से संबंधित कारोबारी गतिविधियाँ अक्टूबर में थोड़ी धीमी होने के बाद नवंबर में तेजी से बढ़ी। इस महीने पीएमआई 59.8 रहा, जो अक्टूबर में 58.9 रहा था। इन आंकड़ों से पता चलत्ता कि उत्पादन में उछाल आ रहा है। पीएमआई में 50 से ऊपर का स्तर आर्थिक विस्तार को दर्शाता है, जबकि 50 से नीचे का स्तर कारोबारी संकुचन की तरफ इशारा करता है, जबकि 50 का स्तर बताता है कि उत्पादन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।
इस मामले में बार्कलेज के विदेशी मुद्रा रणनीतिकारों का कहना है कि 2026 में रुपया कमजोर होकर 94 रुपए प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच सकता है, लेकिन इस अनुमान में अतिश्योक्ति प्रतीत हो रहा है, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत बनी हुई है। अस्तु, रुपये के कमजोर होने से बहुत ज्यादा दबाव में आने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इसके कारण तात्कालिक हैं, जो जल्द ही खत्म होने वाले हैं। इसके साथ, स्थिति से निपटने के लिए रिजर्व बैंक के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार उपलब्ध है और बीते महीनों से भारतीय रुपया चीन की मुद्रा युआन के मुकाबले बहुत ज्यादा मजबूत हुई है, जिससे भारतीय कारोबारियों के लिए चीन से कारोबार करना आसन हुआ है। ऐसे में, रुपये में आ रही गिरावट से बहुत ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है।

