Wednesday, October 27, 2021
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Homeसंवादसामयिक: क्या अपने पूर्वाग्रह छोड़ेगी सरकार?

सामयिक: क्या अपने पूर्वाग्रह छोड़ेगी सरकार?

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डॉ. सुनीलम
पूरे देश की नजर 30 दिसंबर यानी को 2 बजे विज्ञान भवन में भारत सरकार और 40 किसान संगठनों के बीच बातचीत पर टिकी हुई है। पहले भी 5 वार्ताएं हो चुकी हैं। इस बार भारत सरकार की ओर से आमंत्रण पत्र कृषि सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव संजय अग्रवाल द्वारा भेजा गया है। सरकार की ओर से एजेंडा में तीनों कृषि कानूनों, एमएसपी की खरीद व्यवस्था, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के आस पास वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए आयोग, अध्यादेश एवं विद्युत संशोधन विधेयक 2020 में किसानों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा एजेंडा बनाया गया है। भारत सरकार द्वारा इसके पहले किसान संगठनों को लिखे गए पत्रों में एमएसपी के सवाल उठाने को भारत सरकार के संयुक्त सचिव विवेक अग्रवाल द्वारा भेजे गए पत्र में कहा गया था कि कृषि सुधार से संबंधित तीनों कानून से न्यूनतम समर्थन मूल्य का कोई संबंध नहीं है। इस विषय को वार्ता में शामिल किया जाना तर्कसंगत नहीं लगता है।
इससे यह स्पष्ट है कि भारत सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे पर किसान संगठनों से चर्चा को आगे बढ़ाने की मंशा मजबूरी में दर्शाई है। अभी तक हुई 5 बैठकों के लिए पत्र संयुक्त सचिव विवेक अग्रवाल द्वारा लिखे जाते थे लेकिन इस बार का पत्र कृषि मंत्रालय के सचिव द्वारा लिखा गया है। इससे यह लगता है कि किसानों द्वारा गत 34 दिनों से चल रहे दिल्ली और देश भर में चलाए जा रहे किसान आंदोलन का सरकार पर असर पड़ना शुरू हुआ है। हालांकि पत्र में तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने के मुद्दे पर चर्चा का कोई उल्लेख नहीं करने से स्पष्ट है कि सरकार ने किसानों द्वारा दिए गए एजेंडे को स्वीकार नहीं किया है तथा खुले मन से किसान संगठनों से अभी भी बात करने को सरकार तैयार नहीं है।
इससे स्थिति से साफ है कि 30 दिसंबर की बातचीत से तत्काल कोई हल निकलने वाला नहीं है। लेकिन दोनों पक्ष बिना शर्त वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध दिखलाई दे रहे हैं। देश के नागरिकों को यह जानना जरूरी है । सरकार कुछ भी दावा करे पर वह खुले मन से किसानों से बात करने को तैयार नहीं है। शुरू से जानबूझकर भारत सरकार द्वारा 250 किसान संगठनों के मंच अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के वर्किंग ग्रुप को वार्ता से साजिशपूर्ण तरीके से बाहर रखा है। वर्किंग ग्रुप के एक सदस्य डॉ दर्शन पाल को क्रांतिकारी किसान यूनियन के पंजाब राज्य के अध्यक्ष के तौर पर, कविता कुरुगंटी को महिला किसान अधिकार मंच के तौर पर, हन्नान मौल्ला को कुल हिंद किसान संघर्ष तालमेल कमेटी के तौर पर शामिल किया गया है। लेकिन 40 किसान संगठनों में 250 संगठनों के मंच के प्रतिनिधि के तौर पर एक भी प्रतिनिधि को आमंत्रित नहीं किया गया है। यह सर्वविदित है कि वर्किंग ग्रुप के सदस्य पूर्व सांसद राजू शेट्टी ने लोकसभा में किसानों की ओर से दोनों बिल पेश किए थे। वे संयुक्त किसान मोर्चा की 7 सदस्यीय समिति के सदस्य हैं। इसी तरह योगेंद्र यादव को अमित शाह की आपत्ति पर जानबूझ कर बाहर किया गया है।
मेधा पाटकर को 35 वर्षों का सरकारों के साथ वार्ता का अनुभव है। अतुल कुमार अनजान स्वामीनाथन कमीशन के सदस्य रहे हैं। राजाराम सिंह तीन बार विधायक रहे हैं। वर्किंग ग्रुप के वीएम सिंह सहित तमाम सदस्य 3 से 5 दशकों का किसान आंदोलनों तथा सरकारों के साथ बातचीत का अनुभव रखते हैं, सभी को वार्ता से दूर रखा गया है। सरकार को सबसे ज्यादा परहेज वामपंथी किसान संगठनों से है। परंतु देश के सबसे बड़े किसानों के समन्वय को नकारने के बावजूद एआईकेएससीसी ने इसे मुद्दा नहीं बनाया है, ताकि सरकार को कोई बहाना न मिले। यह किसान आंदोलन के भीतर एक दूसरे के प्रति आपसी विश्वास की भावना और एकजुटता को भी दर्शाता है।
यह केंद्र सरकार की आंदोलन को मुख्यत: पंजाब तक सीमित आंदोलन साबित करने की रणनीति का हिस्सा भी है। मतलब यह है कि भारत सरकार देशभर के करोड़ों किसानों की भागीदारी के साथ लगभग देश के एक लाख से अधिक गांव में सक्रिय तौर पर अध्यादेश के लाने के बाद से ही चल रहे किसान आंदोलन के राष्ट्रीय स्वरूप को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। जबकि सरकार को यह मालूम है कि बातचीत में भले ही 40 में से 32 किसान संगठन पंजाब के ही क्यों ना हो परंतु पंजाब के किसान संगठन पंजाब के लिए ही नहीं, पूरे देश के लिए इन कानूनों को रद्द करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। जिस तरह से सिंघु बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर, पलवल, शाहजहांपुर, गाजीपुर में किसानों की संख्या बढ़ रही है, उससे यह पता चलता है कि आने वाले समय में दिल्ली की पूरी तरह से नाकेबंदी होना तय है।
सरकार किसान संगठनों को बांटने, थकाने तथा तमाम तरह के उकसावे की कार्यवाही कर टकराव बढ़ाने तथा सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से किसान आंदोलन को खत्म करने की रणनीति पर काम कर रही है। लेकिन आंदोलन का नेतृत्व कर रहे 500 किसान संगठनों में से एक भी संगठन का अब तक सरकार से अलग बातचीत करने के लिए तैयार नहीं होना यह बतलाता है कि दुनिया का सबसे बड़ा एवं लंबा किसान आंदोलन फौलादी एकजुटता लिए हुए है।
केंद्र सरकार के लिए यह नया अनुभव है, क्योंकि अब तक वह राजनीतिक दलों का सामना कर रही थी। 2014 से अब तक सरकार सीबीआई, ईडी, इनकम टैक्स विभागों के माध्यम से आसानी से कई पार्टियों के नेताओं को दबाव में लाकर अपनी ताकत बढ़ाई है तथा तमाम राज्यों में सरकार गिराने और बनाने में कामयाब होती रही है लेकिन केंद्र सरकार का यह फार्मूला किसान नेताओं पर रत्ती भर भी कारगर होता दिखाई नहीं पड़ रहा है। दूसरा हथकंडा सरकार द्वारा फर्जी मुकदमे में जेल भेजकर आंदोलन को कुचलने का रहा है। देश भर के उभरते दलित आंदोलन को भीमा कोरेगांव के केस में 16 लोगों को जेल भेजकर,  नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ चले आंदोलन के 30 नेतृत्वकारियों को दिल्ली के दंगों में फर्जी तौर पर फंसा कर जेल भेजने की कार्रवाइयां की हैं। इसी तर्ज पर किसान आंदोलन का दमन करने के लिए हरियाणा सरकार ने हर संभव प्रयास किया। किसान नेताओं पर गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज किए । 100 से अधिक नेताओं को जेल भेजा। परन्तु किसान पीछे नहीं हटे।
(लेखक पूर्व विधायक और किसान नेता हैं और मौजूदा किसान आंदोलन के नेतृत्व के लिए बनी कमेटी के सदस्य हैं)

 


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