Sunday, October 24, 2021
- Advertisement -spot_imgspot_imgspot_imgspot_img
- Advertisement -spot_imgspot_imgspot_imgspot_img
Homeजनवाणी विशेषछोड़ा हाथ, थामा कमल

छोड़ा हाथ, थामा कमल

- Advertisement -
साल 2014 में नरेंद्र मोदी के नाम पर आई वोट बटोरो सुनामी में बाकी दिग्गजों की तरह जितिन को भी जनता का प्रसाद नहीं मिल पाया। बस यही वो हार थी, जिसके बाद जितिन हाशिये पर खिसकते चले गए। हालिया दौर में प्रियंका गांधी को यूपी की कमान तथा अजय कुमार लल्लू को अध्यक्ष बनाया गया, जितिन के वजूद का सूरज डूबता चला गया।

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधान सभा चुनाव के लिए सियासी चौसर बिछनी शुरु हो गई हैं। भाजपा ने कांग्रेस को ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद दूसरा बड़ा झटका देते हुए जितिन प्रसाद के हाथ में कमल थमा दिया है। लंबे समय से कांग्रेस की ब्राहम्ण लाबी के अहम चेहरे के तौर पर परिभाषित जतिन प्रसाद ने भाजपा को संगठित और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुलझा और दूरदर्शी नेता करार दिया है।

यह वहीं रटी रटाई भाषा है जो अक्सर दल बदलने के बाद हर दूसरा नेता बोलता है। दरअसल जतिन के करीबी भी मानते हैं कि प्रसाद का भाजपाई होना कोई त्वरित प्रक्रिया का हिस्सा नहीं। दो साल पहले भी वह पार्टी में अपनी स्थिति और उपेक्षा से आहत हो कर भाजपाई होने को मन बना चुके थे लेकिन अपेक्षित प्रतिउत्तर न मिलने के बाद उम्मीदें और आकांक्षा विलंबित सूची में दर्ज हो गई।

कांग्रेसियों की कल्चर भी कमाल की है। ठीक सिंधिया के पाला बदलने के बाद उन्होंने बेहद अलसाई अंदाज में प्रतिक्रिया दी थी कि पार्टी बड़ी है, नेता तो आते रहते हैं लेकिन ये भी सच है कि सिधिंया हो या जितिन उस वर्ग की राजनीति का हिस्सा रहे हैं, जहां वंशानुगत और व्यक्तिगत स्तर पर उनका पार्टी से मोह भंग होना, किसी भी दल के लिए अच्छे संकेत नहीं। वैसे भी आज की तारीख में संगठनात्मक स्तर पर कांग्रेस बेहद संकट के दौर में गुजर रही है। ऐसे में सिंधिया, हेमंत सरमा और अब जतिन जैसे कद्दावर नेताओं का कांग्रेस के हाथ छुड़ाना आलाकमान के लिए गंभीर चुनौती के तौर पर सामने आया है।

कांग्रेसी सूत्र बताते हैं कि जतिन दो साल से पार्टी में हाशिये पर चल रहे थे। उन्हें बंगाल चुनाव में प्रभारी बनाया गया लेकिन पार्टी का हश्र वहां क्या हुआ, ये हर कोई जानता है। जब दुर्दिन आते हैं तो साया भी साथ छोड़ने लगता है। राजीव गांधी के करीबी रहे जितिन के पिता जितेंद्र प्रसाद की विरासत को जितिन ने बखूबी संभाला। 2004 में उन्होंने परम्परागत सीट शाहजहांपुर से लोकसभा सीट जीतकर धमाकेदार शुरुआत की।

इस युवा नेता को इनाम भी मिला तथा उन्हें यूपीए सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर का ओहदा मिला। 2009 में जितिन का जादू वोटर्स पर चला तथा वह इस बार धौरहरा सीट से विजयश्री हासिल करने में कामयाब रहे, फिर कैबिनेट में उनकी एंट्री हुई लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी के नाम पर आई वोट बटोरो सुनामी में बाकी दिग्गजों की तरह जितिन को भी जनता का प्रसाद नहीं मिल पाया।

बस यही वो हार थी, जिसके बाद जितिन हाशिये पर खिसकते चले गए। हालिया दौर में प्रियंका गांधी को यूपी की कमान तथा अजय कुमार लल्लू को अध्यक्ष बनाया गया, जितिन के वजूद का सूरज डूबता चला गया। हाल यह हुआ कि उनके गृह जनपद में उनकी पसंद का अध्यक्ष तक नहीं बनाया गया। आग में घी का काम जितिन के लिए उस जी 23 के उस ग्रुप में शामिल होना भी रहा, जिसने एक तरह से अघोषित बगावत की बानगी दिखाते हुए कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को कड़ा पत्र लिखा था। हालत इस कदर जितिन के लिए विकट हुए कि पिछले साल यूपी में संगठन को धार देने के लिए जिन सात समितियों का गठन किया, उसमें जितिन प्रसाद को शामिल करने लायक नहीं समझा गया।

वैसे यह भी सच कि संगठन की जिम्मेदारी लेकर भी जितिन सफल नहीं रहे। इनके प्रभारी रहते ही हाल के पश्चिम बंगाल चुनावों में कांग्रेस का पूरी तरह से सफाया हो गया। 44 सीटों से कांग्रेस जीरो पर आ गई। अब यूपी में जितिन की परफॉर्मेंस की बात करें तो यहां भी वह कुछ खास कमाल नहीं कर पाए। पिछले तीन बार से लगातार चुनावों में उन्हें करारी शिकस्त मिल रही है। उनकी ढीली होती पकड़ का ये आलम कि शाहजहांपुर, लखीमपुर खीरी. बरेली समेत रूहेलखंड के इलाके में जो जनाधार उनके पिता जितेंद्र प्रसाद और कांग्रेस ने बनाया था वो लगभग खत्म सा हो गया है।

अब जितिन के प्रति भाजपाई मोह के कारण भी एकदम स्पष्ट दिख रहे हैं। कोरोना से मचे मौत के तांडव व यूपी में मचे हाहाकार के बीच आम आदमी की सत्ताधारी दल के प्रति आक्रोश की लपटें पार्टी की अगले साल होने वाले विधान सभा चुनावों में जीत की संभावनाओं को झुलसा भी सकती है।

बेशक इस समय पार्टी हाईकमान के पास मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विकल्प के तौर पर दूर दूर तक कोई चेहरा नजर नहीं आता लेकिन संघ और और पार्टी का संगठन अभी से डैमेज कंट्रोल में जुट गई है। खासकर ब्राह्मण वर्ग को लेकर पार्टी के रणनीतिकारों की पेशानी पर बल पड़े हुए हैं। डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा, रीता बहुगुणा जैसे चंद बड़े नामों के बीच अब पार्टी ने जितिन को कमल थमा कर यूपी में 12 फीसदी इस वर्ग को यह संदेश देने की कोशिश की है कि पार्टी इस वर्ग के प्रति कितनी गंम्भीर है।

इसी कवायद के तहत पीएम मोदी के करीबी एके शर्मा को यूपी में सक्रियता के ट्रैक पर ला कर सियासत की बिसात पर भाजपा ने अपने मोहरे चल दिए हैं। पश्चिम यूपी में जतिन को अपने पाले में ला कर भाजपा इस कवायद को नया सिरा धमा दिया है।

भाजपा ने जितिन के बहाने एक तीर से दो निशाने किए हैं। राहुल के कोर ग्रुप में शामिल सिंधिया भाजपाई हो चुके। अब राहुल गांधी के खासे करीबी और दून में सहपाठी रहे जितिन प्रसाद को कमल थमा कर भाजपा ने कांग्रेस के थिंक टैंक पर चोट की है। अब अगला निशाना राजस्थान में सचिन पायलट हो सकते हैं। अशोक गहलोत की नाक में दम करके रखा है सचिन ने।

कांग्रेस हाईकमान की उदासीनता और असमंजस के आलम पर तरस आता है कि दस माह के अंतराल के बाद भी सचिन पायलट गुट की मांगों को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है। यूपी के अमिता सिंह, जगदम्बिका पाल, संजय सिंह, अम्मार रिजवी, राजकुमारी रत्ना सिंह, रीता बहुगुणा जैसे कद्दावर लोग कांग्रेस का हाथ झटक चुके। कारवां लूट रहा है। लूटने वाले को मत कोसिए, लुटने वाली की निरीहता भी उतनी ही खतावार।

ट्विटर और बयानबाजी के बाउंसर दागने भर से हालत नहीं बदलने वाले, काबिल लोगों की कद्र करिए। उन्हें तरजीह दीजिए, नहीं तो कल सिंधिया, आज जतिन तो कल मिलिंद देवड़ा और फिर सचिन पायलट जैसे लोग खोती रहेगी कांग्रेस।
                                                         यशपाल सिंह (लेखक जनवाणी समूह के ग्रुप एडिटर हैं)

What’s your Reaction?
+1
697
+1
0
+1
12.9k
+1
2k
+1
9.9k
+1
3
+1
0
- Advertisement -

Leave a Reply

- Advertisment -spot_imgspot_imgspot_imgspot_img

Most Popular

- Advertisment -spot_img

Recent Comments