Saturday, May 21, 2022
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सूर्य पुत्र शनि-प्रकाश और अंधकार

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कर्म और कर्म को करने वाला कर्ता परस्पर एक साथ रहते हैं। प्रयत्नों के बिना कोई कर्म फलीभूत एवं धनवान नहीं होता। उद्यम उद्योग को त्याग देने से कर्म का फल नहीं मिलता। अपनी शक्ति और अथक प्रयत्नों के बावजूद भी यदि कार्य (कर्म) सिद्ध न हो तो इसमें पुरूष का तिरस्कार, अपमान नहीं हो जाता क्योंकि उसका पुरूषार्थ शनि (ग्रह स्थिति) द्वारा नष्ट किया होता है। त्रोता युग में भगवान श्री राम को राज्याभिषेक मिलते मिलते बनवास मिल गया। भगवान श्री राम को माता कौशल्या से भी अधिक प्रेम करने वाली माता कैकेयी की बुद्धि शनि ने नष्ट-भ्रष्ट कर डाली। अपनी जवानी के दिनों में अतिशूरवीरता पूर्वक शनि का सामना करने वाले महाराज दशरथ की अचानक मृत्यु का कारण भी शनि बना।

शनि को रोहिणी नक्षत्र भेदन से रोकने में अपने दिव्य शस्त्रस्त्रों सहित महाराज दशरथ ने ही उद्यम उद्योग किया था। शनि महादशा में ही सीता जी का अपहरण हुआ। महाविद्वान ब्राहमण दशानन रावण ने शनि को अपने पलंग से बांध रखा था, फिर भी शनि उस दशानन की बुद्धि को भ्रष्ट करने में सफल रहे।
महान शिल्पकार विश्वकर्मा जी द्वारा भगवान शिव पार्वती हेतु बनवाई गई लंका शनि के लंका में निवास के दौरान ही श्री हनुमान जी द्वारा जलाकर राख कर दी गई। विक्र मी सम्वत् के प्रवर्तक चक्र वर्ती सम्राट विक्र मादित्य पर भी शनि ने चोरी का आरोप लगवा दिया। महान सत्यवादी सम्राट हरिश्चन्द्र को शनि ने महर्षि विश्वामित्र के माध्यम से तरह-तरह के गहरे संकटों में फंसाया। सम्राट को अपने पुत्र-पत्नी तक को बेचने हेतु विवश किया। महाभारत का युद्ध दुर्योधन पर शनि की महादशा लगने के बाद प्रारंभ हुआ।

सबसे पहले यह निर्धारित कर लिया जाये कि ‘शनि’ है क्या? शनि कैसे सूर्य का पुत्र है? ह्णपरम-तत्वह्य के नियन्ता परम आत्मा, अनन्त शक्ति सम्पन्न भगवान नारायण की लीला से ब्रह्याण्ड में अनेकानेक अद्भुत एवं असामान्य घटनायें घटती रहती हैं।

सूर्य को आदि नारायण भगवान का प्रत्यक्ष स्वरूप माना जाता है। उस सूर्य का एक भाग अलग होकर उस से दूर अति दूर होता चला गया। फिर उसने सात छल्लों (आवरणों) का रूप धारण कर लिया। ये सातों छल्ले अथवा परतें एक दूसरे से गुथी जुड़ी हुई हैं। अत्यंत हानिकारक बीमारियां फैलाने वाली विभिन्न गैसों के भण्डार इस शनि में से हर समय उत्सर्जित हो रहे हैं।

यह सूर्य से अलग होकर बना ग्रह है। अत: इसे सूर्य-पुत्र कहा जाता है और माना जाता है। इस शनि में से उत्सर्जित होने वाली गैसों का रंग नीला और काला है। शनि बहुत चमकीला ग्रह नहीं है। इसकी लौ (रोशनी) बिलकुल मामूली सी है। इसकी गति कभी टेढ़ी मेढ़ी हो जाती है, कभी यह सीधी चाल चलने लगता है।

शनि ग्रह का ठोस आकार अत्यधिक टेढ़ा मेढ़ा है। छल्लों (आवरणों) में से कुछ बहुत बड़े आकार के हैं और बाकी छोटे हैं, इसीलिये यह असंतुलित चाल चलता है। मंगल, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, बृहस्पति सहित सभी ग्रहों के संचालन तंत्र पर शनि अपना दुष्प्रभाव समय-समय पर दिखाता रहता है। पृथ्वी के सभी प्राणियों, प्रकृति, वनस्पतियों, पर्वतों, समुद्रों नदियों पर हर समय यह अपना दुष्प्रभाव दिखलाता रहता है।

एकदम अचानक होने वाले परिवर्तन, जिनकी वजह से विश्व में अनेकानेक दुर्घटनाएं होती हैं, इस सबके पीछे मूल कारण एवं कारक शनि होता है। शनि को दुर्घटनाओं के स्वामी की उपाधि दी जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। विश्व में नई से नई बीमारियां पैदा करने, असाध्य रोग फैलाने, अनेक तरह के विषाणुओं को पृथ्वी पर पैदा करने और उन्हें फलने-फूलने हेतु उपयुक्त वातावरण बनाने की जिम्मेदारी भी शनि की है।

शनि का सबसे पहला आक्र मण मनुष्य की बुद्धि, विवेक और सोचने-समझने की शक्ति पर होता है। रावण, दुर्योधन, कैकेयी, मां सीता, मेघनाद, महाराज दशरथ आदि सभी की बुद्धि विवेक का अपहरण शनि द्वारा होने के पश्चात ही उन को दुखों मुसीबतों यहां तक कि मृत्यु का भी सामना करना पड़ा।

रावण द्वारा शनि को पलंग से बांधने का अर्थ है कि रावण इतना महाविद्वान ब्राहमण था कि उसने शनि से उत्पन्न होने वाले दुष्प्रभावों को समाप्त करने का नुस्खा खोज लिया था अर्थात वह शनि को अपने पलंग से बांध कर रखता था। सोने का मृग न कभी हुआ है और न आगे होगा परन्तु सोने के रंग जैसे मृग की झलक देखकर माता सीता ने, श्रीराम जी से जिद की कि वे उस मृग को पकड़ कर लावें। इसी तरह बुद्धि का अपहरण होने के पश्चात महाराज विक्र मादित्य और सम्राट हरिश्चन्द्र ने महान कष्टों को भोगा। यदि कोई व्यक्ति शनि के दुष्प्रभावों को समाप्त अथवा कम करने के उपाय नहीं जानता तो उसे सभी तरह के कष्ट झेलने ही पड़ेंगे।

शनि का दुष्प्रभाव कम करने का सबसे सरल उपाय है कि प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ न की जाये। प्रत्येक गांव, शहर, महानगर में विभिन्न इलाकों में नीम के पेड़ लगाये जायें। पीपल, कदम्ब, आम, वट, जामुन और फल-फूल देने वाले विभिन्न प्रजातियों के पेड़ लगाये जायें।

त्रिवेणी, पीपल अथवा नीम के वृक्ष पर एक दो लोटा पानी डालने के पश्चात जो शनि पीड़ित व्यक्ति चार से चौबीस मिनट तक वृक्ष के नीचे बैठकर मंत्र जप करता है, वह कष्टों से छुटकारा पा जाता है। मंत्र जप पर बैठने से पूर्व जमीन को अच्छी तरह साफ कर लें। थोड़ा जल छिडकने के पश्चात कुशा का आसन बिछायें। उस कुशा के आसन के ऊपर केसरी अथवा पीले रंग का ऊनी आसन बिछायें। फिर पूर्व या उत्तर की ओर अथवा सांय काल में पश्चिम दिशा की ओर मुख कर के मंत्र जप करें।

किसी धार्मिक स्थल पर जाने से सत्संग में बैठने से, प्रवचन सुनने से, अथवा शनि से संबंधित उपाय करने के बाद भी शनि पीड़ित व्यक्ति का मन चित शान्त नहीं होता। मानसिक अशान्ति एवं संताप बना रहता है। बुद्धि, संकल्प विकल्प, निश्चय अनिश्चय, उतार-चढ़ाव की स्थिति में फंसी रहती है।

मेष, सिंह, वृश्चिक, मकर और कुम्भ राशि में पैदा हुये मनुष्यों के जीवन में शनि जब जब कष्ट लाता है, घनघोर कष्ट लाता है। इन राशियों में पैदा हुए मनुष्यों को वृक्षों, फलों, फूलों पौधों को जल अवश्य चढ़ाना चाहिये। कीकर, बबूल तथा कांटेदार झाड़ियों और वृक्षों से स्वयं को दूर रखना चाहिये। इन कांटेदार वृक्षों झाड़ियों पर जल, दूध, सरसों, तेल, लस्सी, मावा अथवा कोई भी पेय पदार्थ या खाद्य पदार्थ नहीं चढ़ाने चाहिये।

किसी भी तरह के कांटेदार पेड़ पौधे अथवा झाड़ियों अपने घर, कोठी, मकान, दुकान, दफ्तर के बगीचों, गमलों और छत पर भी नहीं लगाने चाहिये। अनार, बेरी और सफेदा तथा कैक्टस कभी घर कोठी में नहीं लगाने चाहिये। ये पौधे घर में निराशा और मनहूसियत लाते हैं।

शनि पीड़ित प्राणी को स्वयं, अपने परिवार और मकान, दुकान व्यापार बिजनेस, कारखाना आदि को आपदाओं कष्टों से बचाने हेतु विशेष प्रयास करने पड़ेंगे। अपने घर और कार्यालय में बैठकर किये जाने वाले मंत्र-जप से नकारात्मक प्रभावों को समाप्त करके स्वयं को, अपने आसपास के वातावरण को ऊजार्वान बनाया जा सकता है।

मंत्र जप से आलस्य समाप्त होगा। दिमाग सही दिशा में उपयुक्त निर्णय लेने में सक्षम हो जाएगा। कोई अड़चन रूकावट आने पर उसका समाधान भी सूझ जाएगा।

त. के. राजेश भार्गव


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