- मरीज को जिंदगी देने वाली दवाओं का नशे की लत के लिए किया जा रहा धंधा
- मानसिक रोगियों को दी जाने वाली ज्यादातर दवाओं का नशे के लिए प्रयोग
- खांसी के सिरप, दस्त आदि रोग में कारगर दवा भी नशे के लिए की जा रहीं इस्तेमाल
शेखर शर्मा |
मेरठ: जिन दवाओं को जिंदगी बचाने के लिए तैयार किया गया है, उन दवाओं को युवा पीढ़ी की मौत की आगोश तक पहुंचाने का जरिया नशा के सौदागरों ने बना लिया है। बाजार में ऐसी करीब एक हजार से ज्यादा दवा हैं जो मरीज की जिंदगी बचाने के काम में आती है, लेकिन इनका ज्यादा प्रयोग नशे के लिए किया जा रहा है।
देश के जिन राज्यों में इन दवाओं की खरीद फरोख्त प्रतिबंधित कर दी गई है, पंजाब सरीखे ऐसे ही राज्यों में इन दवाओं की बड़ी बड़ी खेपें भेजी जा रही हैं। सुना तो यहां तक जाता है कि देश के जिन राज्यों को गरीब और पिछड़ा माना जाता है उन राज्यों में इन दवाओं की बड़ी भारी सप्लाई की जा रही है।
दरअसल, शराब और दूसरे मादक द्रव्यों के अनुपात में यह नशा काफी सस्ता बताया जाता है, लेकिन यह नशा जितना सस्ता है उतनी ही तेजी से इनको नशे का जरिया बनाने वालों को मौत की दहलीज तक पहुंचा देता है।
तेजी से पैर पसार रहा मौत का कारोबार
मौत का यह कारोबार तेजी से पांव पसार रहा है। इसको सूखे नशे का नाम दिया गया है। दरअसल, नशे के तौर पर प्रयोग किए जाने वाले दूसरे मादक द्रव्यों के मुकाबले यह अधिक सस्ता और सर्व सुलभ तथा ज्यादा असर कारक होने की वजह से नशे के शौकीनों की यह पहली पसंद बना हुआ है। दूरदराज के देहात के इलाकों में मजदूरी करने वाले गरीब तबके में यह कारोबार तेजी से पांव फैला रहा है। ऐसे नशे की डिमांड सबसे ज्यादा पिछडे इलाकों में है।
दवाओं से भरा पड़ा बाजार
नशे के तौर जिन दवाओं का सिरप का प्रयोग किया जाता है, उनसे बाजार भरा पड़ा है। इतना ही नहीं ये तमाम दवाएं सर्व सुलभ हैं। नाम न छापे जाने की शर्त पर दवा कारोबारी बताते हैं कि तमाम ऐसी दवाएं जो मानसिक रोगियों को दी जाती हैं। उनका प्रयोग इन दिनों युवा पीढ़ी नशे के लिए प्रयोग करने लगी है। युवा पीढ़ी के लिए ऐसी दवाएं पहली पसंद बनी है। इसके अलावा खासी के सिरप और पेट के दर्द में काम आने वाली गालियां भी अब नशे के तौर पर प्रयोग की जानी लगी हैं।
बिल से खरीद-फरोख्त की इजाजत
नशे के तौर पर प्रयोग की जाने वाली दवाओं की बिक्री के संबंध में ड्रग विभाग के अधिकारियों का कहना है कि जहां तक मेरठ की बात है तो यहां कोई भी दवा नकली बेची जा रही हो ऐसा नहीं है। दरअसल हो यह रहा है कि जो दवा दूसरे राज्य में प्रतिबंधित है वो उत्तर प्रदेश में प्रतिबंधित नहीं है।
मसलन एक दवा पंजाब में प्रतिबंधित है, लेकिन बिल पर खरीदने व बेचने की अनुमति उत्तर प्रदेश में है। जहां तक विभाग की बात है तो उन दवाओं की धरपकड़ की जाती है जिनको बेचने की अनुमति नहीं या बगैर बिल के बेची जा रही है।
इन दवाओं की ज्यादा डिमांड
नशे के लिए जिन दवाओं की अधिक डिमांड है उनमें पहली पसंद एविल की गोलिया हैं। आमतौर पर एविल को चर्म रोग में राहत के लिए प्रयोग किया जाता है, लेकिन इन दिनों एविल नशे के शौकीनों की फर्स्ट च्वाइस बनी है। इसके अलावा लोमोटिन, लोमोफिन, एल स्ट्रेक और कोरैक्स सीरप भी नशे के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। करीब 100 से ज्यादा ऐसे साल्ट हैं जिनसे अलग अलग नामों से कंपनी करीब डेढ़ हजार प्रकार की दवा गोली व कैप्सूल आदि तैयार किए जाते हैं।
ये कहना है चिकित्सकों का
आईएमए के स्टेट प्रेसीडेंट डा. महेश बंसल का कहना है कि नशे के लिए किसी भी दवा का प्रयोग किया जाना बेहद घातक है। यह समस्या जितनी गंभीर है उतना ही दुष्कर ऐसे मामलों में कार्रवाई का किया जाना है। कई बार देखने में आया है कि चिकित्सक के पर्चे पर नशे के लिए दवा खरीद ली जाती हैं। इसके लिए जरूरी है कि अभिभावक व परिवार के सदस्य ध्यान रखें। जो युवा नशे के आदि हैं उनकी काउंसिलिंग भी की जाए। इसके लिए कई स्तर काम किया जाना जरूरी है।

