Sunday, May 24, 2026
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पुलिस हिरासत में हत्या संदेह पैदा करती है

Samvad


NIRMAL RANIगैंगस्टर एवं राजनीतिज्ञ अतीक अहमद एवं उसके भाई अशरफ अहमद की इलाहाबाद में पुलिस हिरासत में पिछले दिनों बड़े ही रहस्यमयी तरीके से हत्या कर दी गयी। बावजूद इसके कि अतीक का एक लंबा आपराधिक रिकार्ड था फिर भी जिस तरह हत्यारों ने बड़ी आसानी के साथ पुलिस हिरासत की परवाह किए बिना अतीक अहमद के सिर में गोली मारी एवं उसके भाई अशरफ की भी बिल्कुल करीब से गोली मारकर हत्या की, उसे लेकर पुलिस की चौकसी पर सवाल उठना स्वभाविक है। सवाल उठाया जारहा है कि अतीक व अशरफ के हत्यारों ने जब लगभग 22 सेकेंड तक इन दोनों पर आधुनिक हथियारों से गोलियां बरसाईं और उन पर 29 गोलियां दागीं, इसके बावजूद सुरक्षाकर्मियों द्वारा हत्यारों पर जवाबी फायरिंग क्यों नहीं की गई? खबरों के अनुसार गोलीबारी अंजाम देने के 22 सेकेंड बाद हमलावरों ने अपने हथियार स्वयं जमीन पर फेंक दिए और अपने हाथ ऊपर उठाकर आत्मसमर्पण कर दिया।

उसके बाद पुलिस उन्हें बड़ी तत्परता से गाड़ी में बिठाकर घटनास्थल से चलती बनी। उत्तर प्रदेश में पुलिस हिरासत में यहां तक कि जेल और अदालतों में हत्याएं होना कोई नई बात नहीं है। इसी इलाहाबाद में उच्च न्यायालय परिसर में 25 सितंबर 1981 को लटूरी सिंह नमक एक विधायक को गोली मार दी गयी थी।

जिस समय लटूरी सिंह पर गोलियां बरसाई गर्इं, उस समय कम से कम 50 सशस्त्र पुलिसकर्मी उसकी सुरक्षा के लिए उसकेसाथ व उच्च न्यायालय परिसर में तैनात थे। उसके बावजूद लटूरी सिंह को गोली मार दी गई थी। उस समय केवल एक हमलावर को ही मौके से गिरफ़्तार किया जा सका था जबकि शेष 13 हमलावर फरार हो गए थे।

इसके इलावा भी ऐसी दर्जनों घटनाएं प्रदेश में हो चुकी हैं। ऐसी हर घटना के बाद पुलिस की ‘कारगुजारी’ पर संदेह भी जताए जाते रहे हैं। अतीक व अशरफ की हत्या जिस आसानी से की गई व पुलिस एक तरह से मूक दर्शक बनी देखती रही, उससे कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं।

इनमें एक संदेह यह भी किया जा रहा है कि अदालती आदेश के अनुसार अतीक को पुलिस कस्टडी में इसलिए रखा गया था, ताकि पुलिस उमेश पाल हत्याकांड की जांच के अलावा अतीक के आपराधिक साम्राज्य के और गहरे राज जान सके। परंतु उसकी हत्या से वह रहस्य तो उसके साथ ही दफ़्न हो गए? वैसे भी इस हत्याकांड ने वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के उन दावों की भी हवा निकाल कर रख दी है, जिसमें वे यूपी में कानून व्यवस्था चाक चौबंद होने की बात करते हैं।

अदालती आदेश पर पुलिस हिरासत में सौंपे गए एक गैंगस्टर की सुरक्षा जो पुलिस सुनिश्चित नहीं कर सकती वह कानून व्यवस्था चाक चौबंद होने का दावा कैसे कर सकती है। अभी गत सोमवार को ही जालौन में बाइक सवार गुंडों ने स्कूल से परीक्षा देकर वापस आ रही एक छात्रा की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी।

यह है योगी राज में कानून व्यवस्था का आलम और बेटियों को संरक्षण देने के दावों की सच्चाई ? बहरहाल इसी उत्तर प्रदेश में कानपुर के निकट बिकरू गांव में 2 जुलाई 2020 की रात एक दिल दहलाने वाला हादसा हुआ था। उत्तर प्रदेश पुलिस बल उस दिन गैंगस्टर विकास दुबे को पकड़ने के लिए छापेमारी करने बिकरू गांव गई थी।

तभी विकास दूबे व उसके साथियों ने पूरे पुलिस बल पर गोलियों की बौछार कर दी। इस गोली काण्ड में एक डीएसपी व एक थानेदार सहित 8 पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी गई थी। इस घटना के बाद विकास दूबे के कई साथी पुलिस मुठभेड़ में मारे गए थे। उसका घर बुलडोजर से गिरा दिया गया था।

परंतु इस पूरे प्रकरण में सबसे चर्चित मोड़ तब आया था जबकि यूपी पुलिस विकास दुबे को उज्जैन के महाकाल मंदिर से गिरफ़्तार कर सड़क मार्ग से कानपुर ला रही थी। और कानपुर के करीब पहुंचकर पुलिस ने उसे ‘मुठभेड़’ बताकर मार गिराया। पुलिस की ओर से बताया गया कि जिस गाड़ी में विकास दुबे सवार था वह पलट गयी और गाड़ी पलटने के बाद विकास दूबे ने पुलिस हिरासत से भागने के कोशिश की। जिसके बाद पुलिस ने उसे मुठभेड़ में मार गिराया।

विकास दूबे की पुलिस हिरासत में हुई कथित मुठभेड़ के बाद भी यह सवाल उठने लगे थे कि वह उज्जैन किसके निमंत्रण पर और क्या उम्मीदें लेकर गया था? उसी समय सवाल यह भी उठा था कि जो पुलिस बल राज्य सरकार का विमान लेकर विकास दुबे को अपनी हिरासत में लेने उज्जैन गयी थी वह फोर्स उसे विमान से वापस लाने के बजाये सड़क मार्ग से लेकर क्यों आई?

इस तरह के और भी कई राज विशेषकर उसको राजनैतिक संरक्षण दिये जाने जैसे अनेक रहस्य भी विकास दूबे की ‘कथित मुठभेड़’ के साथ ही हमेशा के लिए रहस्य ही बने रह गए। आज तक विकास दूबे की ‘गाड़ी पलटने’ की घटना पर यूपी पुलिस को शर्मिंदगी उठानी पड़ती है।

यूपी में किसी अपराधी की गाड़ी पलटना गोया एक मुहावरा सा बन गया है। विकास दूबे की कथित मुठभेड़ हो या अतीक ब्रदर्स की पुलिस हिरासत में हुई हत्याएं, इतने बड़े अपराधियों का पुलिस की मौजूदगी में इतनी आसानी से निपट जाना या निपटा दिया जाना यह सवाल जरूर खड़े करता है कि पुलिस हिरासत में होने वाली इस तरह की हत्याएं वास्तव में आपराधिक घटनाएं ही हैं या फिर किन्हीं बड़े रहस्य को दफनाने की साजिश? और इन रहस्य्मयी हत्याओं या तथाकथित मुठभेड़ों के पीछे के रहस्यों से क्या कभी पर्दा उठ भी सकेगा?


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