Tuesday, June 16, 2026
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काशी में होगा माता भगवती बगलामुखी का नौ दिवसीय 108 कुंडीय महायज्ञ

  • मानव कल्याण और सनातन परम्परा की रक्षा के संकल्प के साथ होगा महायज्ञ

जनवाणी ब्यूरो |

लखनऊ: मानव कल्याण, समाज कल्याण, राष्ट्र कल्याण और विश्व कल्याण की मंगल कामना और सनातन परम्परा की रक्षा के संकल्प के साथ स्वामी दिव्यानंद महाराज के संयोजन में बाबा विश्वनाथ की पावन नगरी काशी में मोक्षदायिनी मां गंगा के पवित्र तट पर शक्ति की अधिष्ठात्री माता भगवती बगलामुखी का नौ दिवसीय 108 कुंडीय महायज्ञ होने जा रहा है। माता बगलामुखी का यह महायज्ञ भारत ही नहीं बल्कि विश्व का अब तक का सबसे बड़ा महायज्ञ होगा।

गुप्त नवरात्रि के सुअवसर पर अगले वर्ष 22 जनवरी से शुरु होने वाले इस महायज्ञ की तैयारियों को लेकर देश के अलग-अलग भागों में अब तक कई बैठकें हो चुकी हैं। केंद्र सरकार के कई मंत्रियों, कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों, धर्म गुरुओं, आचार्यों, देश-विदेश के सैकड़ों गणमान्य लोगों को आमंत्रित किया जा रहा है।

स्वामी दिव्यानंद महाराज ने माता भगवती बगलामुखी के वैशिष्ट्य और नौ दिवसीय 108 कुंडीय महायज्ञ के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि काशी में मणिकर्णिका घाट के सामने गंगा जी के दूसरी तरफ यह महायज्ञ होगा। महायज्ञ की तैयारियों को लेकर अब तक कई दौर की बैठकें हो चुकी हैं।

उन्होंने बताया कि शास्त्रों में वर्णित है कि सम्पूर्ण सृष्टि में जो भी तरंग है, वो माता बगलामुखी जी की वजह से है। यही वजह है कि माता बगलामुखी जी को ब्रह्मास्त्र भी कहा जाता है। इस विशाल महायज्ञ में देश-विदेश का कोई भी वयक्ति हिस्सा ले सकता है। महायज्ञ में प्रवेश पूरी तरह निःशुल्क है। महायज्ञ में हिस्सा लेने से व्यक्ति के सभी दुखों का नाश होने के साथ ही मंगल एवं कल्याण होगा।

स्वमी दिव्यानंद जी महाराज ने बताया कि माता भगवती बगलामुखी को माता पीताम्बरा के नाम से भी जाना जाता है। यह इतनी शक्तिशाली हैं कि समूचे ब्रह्मांड की सभी शक्तियां मिलकर भी इनका मुकाबला नहीं कर सकतीं। इन्हें स्तम्भन की देवी भी कहा जाता है। माता बगलामुखी को ब्रह्मास्त्र भी कहा जाता है।

माता बगलामुखी सर्वशक्तिरूपा, सर्वरूपा, सर्वाकार और पराशक्ति हैं, इसलिए ये भैरवी, मातंगी, त्रिपुरा, कामेशी, श्रीविद्या, भद्रकाली आदि सब कुछ हैं। भगवती बगलामुखी एकरूपा नहीं, बहुरूपिणी हैं, अनंतस्वरूपा हैं। शक्ति ही सम्पूर्ण जगत की सृष्टि, स्थिति और प्रलय करने वाली हैं। ब्रह्मा सृष्टि का निर्माण करते हैं, विष्णु सृष्टि की रक्षा करते हैं, और रूद्र जो सृष्टि का संहार करते हैं, वह सब शक्ति का ही स्फुरण है।

भगवती बगलामुखी अत्यंत गम्भीर आकृति वाली, मदोन्मत्त और तपाये हुए स्वर्ण के रंग की हैं। इनकी चार भुजाएं व तीन नेत्र हैं। यह सदैव पद्मासन लगाकर बैठी रहती हैं। इनके दायें हाथ में मुद्गर और पाश है तथा बायें हाथ में शत्रु की जिह्वा और बज्र को धारण किए हुए हैं। इनकी देहयष्टि पर जो वस्त्र हैं, वे पीले रंग के हैं।

माता के सिर पर स्वर्ण मुकुट है। इनके दोनों कानों में स्वर्णकुंडल हैं तथा इन्होंने किरीट को भी धारण कर रखा है। ये सदैव सुवर्ण सिंहासन पर ही विराजित रहती हैं। माता बगलामुखी के सुनहरे मुखमंडल पर सदैव मुस्कान विराजमान रहती है जो मन को मोह लेती है। भगवती बगलामुखी का अविर्भाव काल वीर रात्रि की चतुर्थ संध्या है।

दस महाविद्याओं में भगवती बगलामुखी का अपना अलग ही महत्व है। भगवती बगलामुखी कलियुग में सद्यः फलप्रदा मानी जाती हैं और इनकी उपासना या पूजा इस कालिकाल में सर्वोच्च मानी जाती है। भगवती बगलामुखी की उपासना करने से मनोवांछित कामनाएं पूर्ण होती हैं। मुंडमाला तन्त्र के अनुसार, दस महाविद्याओं में बगला का क्रम आठवां है। बगला सिद्ध विद्या है, इसलिए इनकी उपासना सम्पूर्ण प्रतिबंधों से रहित है तथा विशेष रूप से कलियुग में सरलता से सर्वसिद्धिदायिनी हैं।

स्वामी दिव्यानंद जी महाराज ने बताया कि काशी में माता भगवती बगलामुखी के महायज्ञ का शुभारम्भ होने से पूर्व देश के 20 प्रमुख शहरों में माता भगवती की कथा होगी। विभिन्न शहरों में होने वाली माता भगवती की कथा के आयोजन का उद्देश्य लोगों को माता भगवती की महिमा के बारे में जानकारी देना और सनातन धर्म के प्रति लोगों को जागरूक करना है। माता भगवती की पहली कथा काशी में इसी वर्ष शारदीय नवरात्रि में होगी। उसके पश्चात माता भगवती की कथाएं क्रमशः दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, जयपुर, उदयपुर, अहमदाबाद, सूरत, राजकोट, भोपाल, इंदौर, कानपुर, वृन्दावन (मथुरा), अयोध्या, प्रयागराज, लखनऊ एवं हरिद्वार में होंगी।

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में ‘विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्’ कहकर जिस शक्ति का समर्थन किया है, तंत्र में वही स्तम्भन शक्ति बगलामुखी के नाम से जानी जाती हैं। श्री बगलामुखी दस महाविद्याओं में से एक हैं। भगवती बगलामुखी दक्षिणाम्नाय और उत्तराम्नाय दोनों की उपास्यादेवी हैं। इनकी उपासना वाममार्ग और दक्षिणमार्ग दोनों में स्वीकृत और प्रचलित है। ये तैंतीस कोटि देवताओं में से कोई व्यक्तिगत देवता नहीं हैं। व्याकरणशास्त्र के अनुसार, इनके नाम की व्युत्पत्ति इस प्रकार से है- ‘वलगो वृणोतेः’ में ‘वृण आच्छादने’ धातु से अलग शब्द निष्पन्न होता है। तंत्रशास्त्र इसी शक्ति को बगलामुखी के नाम से संबोधित करता है। माता भगवती बगलामुखी की साधना प्रायः शत्रु से मुक्ति और वाक् सिद्धि के लिए की जाती है। इनकी उपासना में हरिद्रा माला, पीत पुष्प एवं पीत वस्त्र का विधान है।

भगवती बगलामुखी जी का वैदिक नाम है- वल्गा। यही वैदिक नाम वल्गा तंत्र में बगला कहलाता है। मुंडमाला तंत्र में कहा गया है कि इनकी सिद्धि के लिए नक्षत्रादि विचार और कालशोधन की भी आवश्यकता नहीं है। इनकी उपासना तीन प्रकार से की जाती है- 1- सात्विक, 2- राजसी, 3- तामसी। गृहस्थ के लिए इनकी सात्विक उपासना करना ही श्रेयस्कर होगा क्योंकि वेद भी सात्विक पूजा को प्रधानता देता है। स्तम्भनकारिणी शक्ति व्यक्त और अव्यक्त सभी पदार्थों की स्थिति का आधार पृथ्वीरूपा शक्ति हैं। बगला उसी स्तम्भन शक्ति की अधिषाठात्री देवी हैं। महाशक्ति बगलामुखी शीघ्र फलदायिनी हैं।

ऐहिक या पारलौकिक, देश अथवा समाज में दुखद अरिष्टों के दमन और शत्रुओं के शमन में बगलामुखी के मंत्र समान कोई मंत्र नहीं है। शक्तिरूपा बगला की स्तम्भन शक्ति से द्धयुलोक वृष्टि प्रदान करता है। उसी से आदित्य मंडल ठहरा हुआ है और उसी से स्वर्गलोक भी स्तम्भित है। ऐहिक या पारलौकिक, देश अथवा समाज में दुखद अरिष्टों के दमन और शत्रुओं के शमन में बगलामुखी के मंत्र समान कोई मंत्र नहीं है। चिरकाल से साधक इन्हीं बगलामुखी महादेवी का आश्रय लेते आ रहे हैं। इनके बड़वामुखी, जातवेदमुखी, उल्कामुखी, ज्वालामुखी, तथा वृहदभानुमुखी पांच मंत्र भेद हैं। इनकी साधना में वीर व दिव्य दोनों ही भावों की प्रधानता है। इनकी सर्वप्रथम अराधना भगवान विष्णु, जो कि सृष्टि के पालक हैं, ने की थी।

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