Tuesday, June 16, 2026
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सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी है ओल्ड पेंशन स्कीम

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सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी है ओल्ड पेंशन स्कीम 2

सरकारी कर्मचारी देश व व्यवस्था की रीढ़ का काम करते हैं। हर परिवार का सपना रहता है कि उनके बच्चे सरकारी सेवा में जाएं। आज के बेरोजगारी के युग में सरकारी विभागों में चपरासी व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के लिए आवेदन, परीक्षा व साक्षात्कार में नेट क्वालीफाइ, एमफिल, पीएचडी, मास्टर डिग्री किए हुए युवक-युवतियां भी हिस्सा लेते हुए दिखाई देते हैं तो यह सरकारी सेवा का आकर्षण ही है। सरकारी सेवा की सबसे खास बात यह रही है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी कर्मचारियों को पेंशन के रूप में सामाजिक सुरक्षा मिलती थी। लेकिन वर्ष 2004 से सरकार द्वारा पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) के स्थान पर एनपीएस (न्यू पेंशन स्कीम) को लागू कर दिया गया।

कर्मचारियों के विरोध के बावजूद सरकार ने इस योजना के बारे में बहुत गुणगान किए। सच्चाई लोगों के सामने तब सामने आई जब 2004 के बाद लगे कर्मचारी सेवानिवृत्त हुए। ऐसे कर्मचारियों की पेंशन सात सौ से लेकर 2-3 हजार रुपए तक तय हुई। जोकि बुढ़ापा पेंशन से भी कम है। हालांकि सरकारी सेवा का आकर्षण तो फिलहाल ज्यों का त्यों है, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद सामाजिक सुरक्षा की स्थिति पुरानी पेंशन योजना की समाप्ति के बाद पूरी तरह बदल गई है। कर्मचारी लंबे समय से पुरानी पेंशन की मांग कर रहे हैं। कर्मचारियों द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर एनएमओपीएस (पुरानी पेंशन योजना के लिए राष्ट्रीय आंदोलन) चलाया जा रहा है।

जिस पुरानी पेंशन योजना को सरकार ने कर्मचारियों के लिए समाप्त कर दिया, उस योजना को विधायकों, सांसदों, न्यायिक सेवा व सेना में बरकरार रखा हुआ है। यह कर्मचारियों के साथ भेदभाव ही तो है। जो कर्मचारी अपने जीवन का बड़ा हिस्सा सेवा में लगाता है, उसके लिए पुरानी पेंशन बंद कर दी गई और एक बार जीत कर विधायक व सांसद बने नेता अपने लिए पुरानी पेंशन बरकरार रखे हुए हैं। 2004 के बाद सरकार एनपीएस की प्रशंसा करते नहीं अघाती थी। लेकिन इसके खिलाफ व ओपीएस के लिए कर्मचारियों के आंदोलन और सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारियों की दयनीय स्थिति की सच्चाई के उजागर होने के बाद जब एनपीएस की किरकिरी हुई तो सरकार ने यूपीएस (यूनिफाइड पेंशन स्कीम) के नाम से एक नई योजना की घोषणा की। अप्रैल 2025 से इस योजना को लागू किया गया।

इस योजना की सच्चाई भी कर्मचारियों के सामने है। यही कारण है कि पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (पीएफआरडीए) द्वारा एनएमओपीएस की आरटीआई के जवाब में गत 22 अक्तूबर को दिए गए आंकड़ों के अनुसार एनपीएस के कुल 24,64,437 केन्द्रीय कर्मचारियों में से 97094 कर्मचारियों ने ही केंद्र सरकार की इस योजना को चुुुना, जोकि कुल कर्मचारियों का केवल तीन प्रतिशत है। यह भी तब है जब सरकार द्वारा बार-बार यूपीएस का विकल्प चुनने की समय सीमा को बढ़ाया जा रहा है।

कर्मचारियों का मानना है कि पुरानी पेंशन बुढ़ापे की लाठी है। एनपीएस व यूपीएस केवल झुनझुना है। यह योजनाएं केवल पेंशन का भ्रम पैदा करने के लिए बनाई गई हैं। आज तक सरकार एनपीएस को अच्छा बताती थी। यदि यह योजना इतनी अच्छी थी तो फिर यूपीएस क्यों लेकर आई। यह बाजार की रणनीति होती है कि वह उपभोक्ताओं के सामने एक उत्पाद के बाद दूसरा उत्पाद प्रस्तुत करता है। सरकार अपनी जनकल्याणकारी भूमिका को भूल कर एक कंपनी की तरह से पेश आ रही है। कर्मचारियों का कहना है कि जैसे सरकार ने एनपीएस व यूपीएस में से एक विकल्प चुनने का मौका दिया है।

इसी तरह से इनमें ओपीएस को भी शामिल कर लिया जाए। तीनों में से जिसे जो योजना पसंद हो, उसे चुन ले। फिर दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। जानकारों का मानना है कि जितना पैसा यूपीएस के प्रचार के ऊपर खर्च किया गया है या किया जा रहा है, उससे बहुत से कर्मचारियों को पुरानी पेंशन का लाभ दिया जा सकता था।

एनपीएस और यूपीएस दोनों की विशेषता यह है कि दोनों शेयर बाजार के रहमोकरम पर निर्भर हैं। विभिन्न सरकारी विभागों में अपना जीवन लगा देने वाले कर्मचारियों के कल्याण से भी ज्यादा सरकार को बाजार के हित प्रिय हैं। सरकार को शेयर बाजार में निवेश करना व कर्मचारियों के अंशदान को भी उसमें झोंक देना बेहतर लगता है। कथित आर्थिक सुधारों के समर्थक अर्थशास्त्री व सरकार ओपीएस को बोझ मानते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि ओपीएस की बजाय बोझ एनपीएस व यूपीएस हैं। कर्मचारियों और सरकार के अंश को शेयर मार्केट में लगाया जा रहा है, जहां पर वह धन पूरी तरह से असुरक्षित है। ओपीएस को बोझ बताने वाले लोगों को सरकार के अन्य खर्चों की तरफ निगाह डालनी चाहिए। कारपोरेट घरानों को दिए जाने वाले ऋण और फिर उसे बट्टे खाते में डाल दिया जाना क्या सरकारी खजाने पर बोझ नहीं है?

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