Friday, April 24, 2026
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चार महीने पहले हो चुका रजिस्ट्रेशन, डील वापसी मुश्किल

  • अशोक लीलैंड के स्थान पर महेन्द्रा ब्लेजो डंपर खरीद का मामला
  • ज्वाइंट डिपो पर निगम चौकीदारों के पहरे में खड़े हैं सभी 10 डंपर
  • पोल खुलने के बाद नगर निगम के अधिकारियों ने साध लिया मौन

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: महाघोटाले की पटकथा लिख चुके नगर निगम के अधिकारियों के लिए अब बड़ी मुसीबत महेन्द्रा लीलैंड के डंपरों की डील को कैंसिल करना है। वजह साफ है कि चार महीने पहले इन सभी डंपरों का रजिस्ट्रेशन हो चुका है तथा पोल खुलने के बाद इन डंपरों पर नंबर नहीं लिखे गये हैं। हां सप्लायर कंपनी बैक्सी लिमिटेड ने इन डंपरों पर अपना नाम लिखकर इन डंपरों की सप्लाई दे दी है।

भ्रष्टाचार में अकंठ डूबे नगर निगम के अधिकारियों ने इन डंपरों की चोरी छिपे आपूर्ति तो ले ली है तथा जनता के बीच यह दावा कर रहे हैं कि इन डंपरों की डील कैंसिल की जायेगी। जबकि वास्तव में रजिस्ट्रेशन होने के बाद इन डंपरों को कोई आधी कीमत पर भी नहीं लेगा। कुल मिलाकर नगर निगम के अधिकारी अपने भ्रष्टाचार के मंसूबों को अंजाम तक पहुंचाने में कामयाब हो गये हैं।

घोटाले का पर्याय बन चुके नगर निगम में इन दिनों अधिकारियों में लूट का ऐसा मर्ज चढा है कि हर अधिकारी का जहां दांव चढ़ रहा है, वह वहीं भ्रष्टाचार करने में फख्र महसूस कर रहा है। एक ओर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भ्रष्टाचार का खात्मा करने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर नगर निगम के अधिकारी सीएम की भ्रष्टाचार विरोधी इस मुहिम को तिलांजलि दे रहे हैं।

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वह खुलेआम नगर निगम को अपनी खाला का घर समझ बैठे हैं और जो मर्जी हो रही है, उसके हिसाब से खुलेआम लूट कर रहे हैं। पार्षदों मे भी एका का अभाव होने की वजह से वह आपस में उलझे बैठे हैं। इसका सीधा फायदा इन्हीं भ्रष्ट अधिकारियों को मिल रहा है।

ये है लूट का पूरा मामला

नगर निगम के स्वास्थ्य अनुभाग ने शहर में सफाई व्यवस्था दुरूस्त करने के लिए साढ़े चार करोड़ रुपये से दस डंपर ट्रकों की खरीद के लिए आॅर्डर बनाया। नगर निगम ने विषय विशेषज्ञों से सलाह मश्वरा करने के बाद तय किया कि अशोक लीलैंड कंपनी के डंपर ट्रक खरीदे जायेंगे। नगर निगम के स्वास्थ्य अनुभाग ने विषय व तकनीकी विशेषज्ञों से सलाह मश्वरा करने के बाद गत वर्ष 7 अक्टूबर 2023 को वर्क आॅर्डर जारी किया। यह वर्क आॅर्डर बैक्सी लिमिटेड कंपनी के नाम जारी किया गया था।

कंपनी को हिदायत दी गई थी कि अशोक लीलैंड कंपनी के डंपर ट्रक सप्लाई करके उनकी चेसिस व अन्य पत्रावलियां जैम पोर्टल पर भी डाउनलोड की जायें। वर्क आॅर्डर जारी कराने के बाद फाइलों की कागजी खानापूर्ति तो बंद कर दी गई। लेकिन इसके बाद नगर निगम के स्वास्थ्य अनुभाग के अधिकारियों ने खेल शुरू कर दिया। बैक्सी लिमिटेड कंपनी के अधिकारियों के साथ मिलीभगत करके अशोक लीलैंड के स्थान पर महेन्द्रा ब्लेजो डंपर ट्रकों की सप्लाई मंगवा ली गई। यह सभी नये डंपर नगर निगम के दिल्ली रोड वाहन डिपो पहुंचे तथा इन्हें यहीं पर खड़ा भी करा दिया गया।

डिपो पर ही जब नये डंपर ट्रक आये तो इस खेल की पोल खुल गई। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि उक्त निविदा में प्रतिभागी समस्त फर्मों द्वारा अपलोड किये गये प्रपत्र आॅनलाईन जैम पोर्टल पर संरक्षित है, जिनका अवलोकन जैम पोर्टल पर भी किया जा सकता है। लेकिन आपूर्ति के महेन्द्रा ब्लेजो डंपर जब सामने खड़े रहे। और अधिकारियों की छिछालेदारी होती रही तो इन डंपरों को चोरी छिपे नगर निगम के दिल्ली रोड वाहन डिपो के सरस्वती लोक में बनाये गये नये ज्वाइंट वाहन डिपो में भेज दिया गया।

तब से पिछले पांच महीने से यह ट्रक सरस्वती लोक के ज्वाइंट डिपो में खड़े धूल फांक रहे हैं। खरीद के इस खेल की पोल खुली तो अब अधिकारी इस मामले की लीपापोती करना चाहते हैं। सब कुछ शांति से निपट जाये। इसलिए इंतजार किया जा रहा है कि कुछ वक्त और निकल जाये। इसलिए सरस्वती लोक के जवाइंट डिपो में दो कर्मचारियों की इन डंपरों की हिफाजत में ड्यूटियां लगाई गई हैं।

पोल खुलने के बाद नंबर प्लेट रोकीं

जब सौदे की खरीद पर सवाल उठना शुरू हुए तो नगर निगम के अधिकारियों ने बैक्सी लिमिटेड कंपनी के अधिकारियों के साथ अपना सौदा खुलने से बचाने के लिए इन डंपरों को चोरी छिपे दिल्ली रोड वाहन डिपो के सरस्वती लोक स्थित ज्वाइंट डिपो में भेज दिया। सब कुछ ऐसे ही शांति से निपटने का इंतजार किया जा रहा था। लेकिन भ्रष्टाचारियों के राज फाश करने की मुहिम चला रहे जनवाणी ने इस पूरे काले कारनामे को उजागर किया तथा नगर निगम के अधिकारियों व बैक्सी लिमिटेड के इस खेल का राज फाश कर दिया।

अपनी पोल खुलने के बाद नगर निगम के अधिकारियों ने सोचा कि जब मामला शांत हो जायेगा तो डंपरों को सीधे शहर में भेज दिया जायेगा। उधर बैक्सी लिमिटेड ने पोल खुलने के बाद इन सभी डंपरों की कंप्यूटराइज्ड नंबर प्लेट अभी डंपरों पर नहीं लगवाई हैं। क्योंकि नंबर प्लेट लगाने के लिए एक्सपर्ट आते हैं तथा सभी को अपनी काली करतूतों से बचाने के लिए इन वाहनों को चोरी छिपे छिपा दिया गया है।

वाहन रजिस्ट्रेशन कैंसिल होना असंभव

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार की वाहन नियमावली में स्पष्ट तौर पर उल्लेख किया गया है कि कोई भी दोपहिया या चार पहिया वाहन शोरूम से बाहर निकलने से पहले उसका पहले टैम्प्रेरी रजिस्ट्रेशन होता है। यह टैम्प्रेरी रजिस्ट्रेशन परिवहन विभाग द्वारा जारी किया जाता है। इस टैम्प्रेरी रजिस्टेÑेशन में एक माह की समय सीमा होती है। फिर एक माह बाद परमानेंट रजिस्ट्रेशन नंबर एलॉट होता है।

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बैक्सी लिमिटेड ने गत वर्ष अक्टूबर-2023 में इन सभी डंपरों को टैम्प्रेरी रजिस्ट्रेशन नंबर के साथ नगर निगम के अधिकारियों को सौंप दिया था। अब मार्च महीने का सप्ताह भर से ज्यादा का समय बीत चुका है तथा नवंबर महीने से इन सभी डंपरों का परमानेंट रजिस्ट्रेशन नंबर एलॉट हो चुका है।

मेयर से मामले का पटाक्षेप कराने की जुगत

अपनी पोल खुलने के बाद नगर निगम के अधिकारियों ने मौन साध लिया है। अंदरखाने अधिकारी इस मामले का पटाक्षेप करने के लिए महापौर को समझाने में लगे हैं। क्योंकि सीएम कार्यालय से इस सौदे पर सवाल जवाब होते हैं तो भाजपा का मेयर होने के नाते हरिकांत अहलूवालिया इन भ्रष्ट अध्ािकारियों का बचाव कर सकते हैं। इसलिए महापौर से नगर निगम के अधिकारी इस मामले का पटाक्षेप कराने की मुद्रा में हैं। हालांकि एआईएमआईएम और भाजपा के पार्षद इस मामले में आक्रामक रूख अपनाये हुए हैं। इसलिए महापौर के लिए भी बीच का रास्ता निकाल पाना मुश्किल हो रहा है।

चार महीने पहले हो चुका है रजिस्ट्रेशन

नगर निगम के जानकार बताते हैं कि बैक्सी लिमिटेड नामक कंपनी से सेटिंग होने के बाद जब नगर निगम अधिकारियों ने अंदरखाने महेन्द्रा ब्लेजो डंपरों को खरीदने पर सहमति जता दी तो बैक्सी लिमिटेड ने महेन्द्रा ब्लेजो की खरीद कर ली। इन डंपरों को लेने के बाद एक महीने का पहले टैम्प्रेरी नंबर मिला। इसके बाद मेरठ के ही परिवहन विभाग में इन सभी डंपरों का बाकायदा परमानेंट रजिस्ट्रेशन भी कराया गया।

इन डंपरों में वाहन स्वामी के रूप में नगर निगम मेरठ नाम दर्ज कराया गया है। टैम्प्रेरी नंबर प्लेट के साथ बैक्सी लिमिटेड ने अपनी कंपनी का लोगो इन डंपरों पर लिखवाकर इनकी आपूर्ति नगर निगम के दिल्ली रोड वाहन डिपो तक पहुंचा दी। इसके बाद परमानेंट कंप्यूटराइज्ड नंबर प्लेट बनने का आॅर्डर कर दिया गया।

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