Tuesday, April 28, 2026
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सामाजिक न्याय और कविता

Samvad 1


KRISHNA PRATAP SINGH 2राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा द्वारा राज्यसभा में स्मृतिशेष ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून, 1950-17 नवम्बर, 2013) की ‘ठाकुर का कुआं’ शीर्षक कविता पढ़ने के बाद झा के राज्य (बिहार) के उनकी विरोधी तो विरोधी खुद उनकी ही पार्टी के विधायक द्वारा उसकी अंट-शंट व्याख्या और इस विधायक के उम्रकैद से दंडित पूर्व सांसद पूर्व विधायक बाप द्वारा जबान खींच अथवा गरदन काट लेने के मंसूबे तक जा पहुंचने से शुरू हुई बात अब उतने तक ही सीमित नहीं रह गई है-झा ने स्वयं भी उसे महिलाओं, दलितों-वंचितों और पिछड़ों से बरते जा रहे सामाजिक अन्याय से संदर्भित किया था-इसलिए बेहतर होगा कि उसे एक कविता की ही मार्फत और आगे बढ़ाया जाए। लेकिन उससे पहले एक तफसील। जिस कविता की हम यहां बात कर रहे हैं, वह स्मृतिशेष विश्वनाथ प्रताप सिंह की है, जिन्होंने 1989 में ‘राजा नहीं फकीर’ व ‘देश की तकदीर’ बनने के बाद प्रधानमंत्री पद पाया था। लेकिन अपनी सरकार के सम्मुख उत्पन्न संकट के निवारण के लिए ही सही, उन्होंने जैसे ही मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर हिंदुत्ववादी राजनीति के बरक्स, सामाजिक न्याय की दिशा में यात्रा शुरू की, ‘राजा नहीं रंक’ और ‘देश के कलंक’ बना दिए गए। अनंतर, हिंदुत्व की समर्थक और सामाजिक अन्याय की पैरोकार ‘उच्च’ जातियों और उनका वर्चस्व बरकरार रखने की इच्छुक राजनीतिक शक्तियों ने विप्र सिंह की बेदखली का ‘जश्न’ यह जताते हुए मनाया कि संविधान के शासन के चार दशक बाद भी किसी को भी उन्हें कमजोर समझने की गलती नहीं करनी चाहिए। क्योंकि वे सामाजिक न्याय की बात करने वालों को ‘कलंकित’ करने के लिए ‘अपने’ युवाओं पर इमोशनल अत्याचार करते हुए उनके ‘उद्वेलन’ को आत्मदाह तक भी पहुंचा सकती हैं।

आज, वे खुश हैं कि उन्होंने अस्मिता व उन्माद की राजनीति के रास्ते सामाजिक न्याय के सवाल को देश के राजनीतिक एजेंडे तो क्या चर्चाओं से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया है। इससे एक पवित्र संवैधानिक संकल्प की राह इतनी अवरुद्ध हो गई है कि महिलाओं के लिए विधायिका में 33 प्रतिशत आरक्षण का कानून बनाते हुए भी उसका ध्यान नहीं रखा जा रहा तो उनकी इस खुशी की बला से। तभी तो वह सब-कुछ उलट-पलट डालने की प्रतिक्रांतिकारी करतूतों तक जा पहुंचने से भी परहेज नहीं कर रही और वंचितों को अब तक उपलब्ध थोड़े बहुत सामाजिक न्याय के भी छिन जाने का खतरा पैदा कर रही है। याद कीजिए, सत्ताच्युत विप्र सिंह कहते थे कि उन्होंने सामाजिक न्याय की अपनी पहल को सेमीफाइनल तक पहुंचा दिया है और फाइनल भी अब बहुत दूर नहीं है। लेकिन जल्दी ही उन्होंने जिनपे तकिया था, उन्हीं पत्तों को हवा देते देखा तो अपनी ‘मैं और वक्त’ कविता में लिखा था: मैं और वक्त/काफिले के आगे-आगे चले/चैराहे पर/मैं एक ओर मुड़ा/बाकी वक्त के साथ चले गए।

यह समझना कतई कठिन नहीं है कि ये ‘बाकी’ लोग कौन थे? जब अन्यायी व शोषक समाज व्यवस्था को फाइनल हराने के लिए वक्त को और बदलने में लगने की जरूरत थी, लालू व मुलायम जैसे सामाजिक न्याय के स्वयंभू सिपहसालार भी इस जरूरत से नजरें चुराकर सामाजिक न्याय आन्दोलन की तोड़ी जमीन पर वोटों की फसल उगाने के लिए वक्त के साथ हो लिए थे। बहुजन समाज पार्टी ने भी आगे चलकर खुल्लमखुल्ला पलटीमार राजनीति अपना ली और व्यवस्था-परिवर्तन के उद्देश्य को सत्ता-परिवर्तन तक सीमित कर लिया।

उस वक्त इन सबने हिंदुत्ववादी शक्तियों द्वारा पैदा किए जा रहे गंभीर खतरों को बहुत हल्के में लिया और किसी सुविचारित दीर्घकालिक रणनीति के बजाय चुनावी समीकरणों के सहारे ही उनसे निपटते रहे। इन समीकरणों ने उन्हें सत्ता दिलाई तो भी सामाजिक न्यायोन्मुख नीतियां लागू व कार्यक्रम चलाकर उसकी अपील का विस्तार नहीं किया और अपने समीकरणों की जीत को समता व धर्मनिरपेक्षता जैसे पवित्र संवैधानिक मूल्यों की जीत बताकर खुश होते रहे।

सामाजिक अन्याय के शिकार दलितों, पिछड़ों व अल्पसंख्यकों की वृहत्तर एकता के ईमानदार प्रयासों को कभी भी अपने एजेंडे पर नहीं लिया। न अपने सत्ताकालों को सामाजिक न्याय की ओर यात्रा का प्रस्थान बिंदु बनाया, न पिछड़ों व दलितों के बीच के बढ़ते अंतर्विरोध सुलझाये। फल यह हुआ कि 85 प्रतिशत के प्रतिनिधित्व की उनकी दावेदारी बेतरह सिकुड़ गई। आगे हिंदुत्ववादियों की सबसे बड़ी फ्रंट भाजपा ने जैसे ही उनके जातीय समीकरणों का तोड़ ढूढ़ा और अकेले दम पर देश की सत्ता पा ली, वे उससे उसूलों पर आधारित लंबी लड़ाई का माद्दा प्रदर्शित नहीं कर पाये। 1977 में विपक्षी एकता के जनता पार्टी वाले प्रयोग को विफल कर देने वाले समाजवादियों का एक खेमा तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के रास्ते पहले ही भाजपा की गोद में जा बैठा था। कभी सामाजिक न्याय के सिपहसालार बने फिरने वाले नेता और पार्टियां अब इस डर से उसकी बात मुंह पर नहीं लातीं कि कहीं हिंदूविरोधी या सनातनविरोधी न करार दी जाएं। उनका यह ‘आत्मसमर्पण’ इस हद तक जा पहुंचा है कि सॉफ्ट हिंदुत्व और विपक्षी एकता के सिवाय भाजपा से पार पाने का उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझता।

गनीमत है कि राजद के शिखर पुरुष लालू ने झा को चंद्रशेखर जितना अकेला नहीं किया और उनके स्टैंड के समर्थन में आगे आए। लेकिन इससे ज्यादा काबिल-ए-गौर उनका ‘असहाय’ होकर यह कहना है कि ‘अगर उनके (झा पर हमलावर राजद विधायक और उसके पिता वगैरह के) पास इतनी कम बुद्धि है तो क्या कर सकते हैं?’ अब कौन है जो उन्हें पार्टी सुप्रीमो के तौर पर उनकी शक्तियां याद दिलाए? कौन पूछे कि यह कम बुद्धि का मामला है या दुस्साहस का और यह क्योंकर हुआ कि इतनी ‘कम बुद्धि’ और जातिगर्व से उन्मत्त शख्स उनकी पार्टी में इतने ‘ताकतवर’ हो गए तो क्या यह उसमें नेताओं व कार्यकर्ताओं के राजनीतिक प्रशिक्षण के घोर अभाव का द्योतक नहीं है? इस अभाव के रहते इस जवाब का भी भला क्या अर्थ है कि झा व ओमप्रकाश वाल्मीकि से पहले भी कई दूसरे संतों-कवियों व साहित्यकारों ने सामाजिक अन्याय के विरुद्ध कहीं ज्यादा कड़ी बातें कही हैं? क्या दुस्साहसी ‘कम बुद्धि’ इसके जवाब में पलटकर यह नहीं कह सकते कि-‘कही होंगी कभी, अब हमारा वक्त है और अब हम नहीं कहने देंगे?’

सोचिये जरा: ऐसे में एक दिन कोई एक और दलित कवि मलखान सिंह की कविता ‘सुनो ब्राह्मण’ पढ़े और कोई ‘ब्राह्मण’ आगबबूला हो उठे! फिर? जिन समुदायों व समूहों को सामाजिक न्याय की जरूरत है, क्या उनकी इसके मद्देनजर कोई तैयारी है? और जो उन्हें सामाजिक न्याय दिलाने के लिए लड़ने के दावे करते आए हैं, उनकी? अगर नहीं तो अभी आगे और दुर्दिन हैं या और लड़ाई है।


dainik janwani 123

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