Tuesday, May 5, 2026
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पितृसत्ता का उत्स और स्त्री अस्मिता की तलाश

 

Ravivani 12


Sudhanshu Gupta 1यह दिलचस्प बात है कि हिंदुस्तान के इतिहास के लिखित दस्तावेज मिलने के समय से ही स्त्री सहायक की भूमिका में दिखाई देती है। प्राकृतिक रूप से पुरुष के साथ सह-अस्तित्व में रह रही स्त्री कब और कैसे सामाजिक रूप से सहायक की भूमिका में चली गई, इसकी पड़ताल के लिए पितृसत्ता के उत्स और उसके जड़ें जमाने की प्रक्रिया को समझना जरूरी है। प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर नीलिमा पाण्डेय ने अपनी पुस्तक ‘इतिहास में स्त्री अस्मिता की तलाश’ (अध्ययन पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स) इसी प्रक्रिया को जानने और समझने का प्रयास किया है। वे स्वयं भी यह मानती हैं कि ‘इतिहास में स्त्री अस्मिता की तलाश’ प्राचीन भारत में स्त्री की स्थिति और प्रस्थिति (स्टेटस) को जानने-समझने का प्रारम्भिक प्रयास है।

इस प्रयास में नीलिमा ने ऐतिहासिक, पौराणिक, महाकाव्यात्मक, थेरी गाथाएं, चयार्गीतों, ऋग्वैदिक ऋचाओं के साथ-साथ कलियुग में स्त्री, प्राचीन भारतीय संदर्भ में वेश्याओं के माध्यम से स्त्री की स्थिति, जातक कथाओं के जरिये स्त्री की स्थिति और कई अन्य महत्वपूर्ण स्रोतों का अध्ययन किया है।

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ऋग्वेद का अध्ययन करते समय उन्हें संतान प्राप्ति से संबंधित अनेक प्रार्थनाएं मिलती हैं। इनमें दिलेर,पराक्रमी पुरुष (पुत्र संतान) को प्राप्त करने की मंशा है। दिलचस्प तथ्य है कि विरोधियों को ऐसी संतान न हो, इस आशय की भी प्रार्थनाएं हैं। ऋग्वेद में उपस्थित अनेक ऋषिकाओं से यह स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि स्त्रियां पुरुषों की बराबरी में शिक्षित और सुसंस्कृत थीं।

लेकिन यहीं नीलिमा प्रश्न उठाती हैं कि क्या हमारा पितृसत्तात्मक समाज (मंत्र रचने की योग्यता के साथ-साथ) इन स्त्रियों की ऋचाओं की विषयवस्तु से भी इत्तेफाक रखता है? ऋग्वैदिक स्त्री को उसकी स्वतंत्र यौनाभिव्यक्ति की सहमति देता है, उसे सहजता से लेता है? ऋग्वेद में विभिन्न स्थतियों, परिस्थितियों में जीवन निर्वाह करने वाली स्त्रियां मिलती हैं पर उन सभी की सामाजिक प्रस्थिति एक जैसी है। समाज में उनका दर्जा दोयम है।

वे पुरुष से निचले पायदान पर अवस्थित हैं। नीलिमा महाभारत में स्त्री अस्मिता की गूंज सुनती हैं। इस महाकाव्य में अनेक स्त्रियां हैं। लेकिन कुछ ही स्त्रियां अपनी अस्मिता की बात करती हैं। इनमें पहली स्त्री शकुन्तला को माना जा सकता है, जो अपनी इच्छा से दुष्यन्त से गंधर्व विवाह करती है। वह कालिदास की रोती-गिड़गिड़ाती नायिका शकुन्तला नहीं है। महाभारत की शकुन्तला दुष्यंत की राजसभा में अपने पुत्र का हाथ थामे प्रवेश करती है और अपने अधिकारों की निडरता से मांग करती है।

एक अन्य स्त्री अम्बा है, जो क्षत्रिय कुल में प्रचलित स्वयंवर की प्रथा की कठोर आलोचना करती है, जहां वास्तव में स्त्री के पास वर चुनने का अधिकार नहीं है। अम्बा धर्मशास्त्रीय निदर्शों के विपरीत व्यवहार करती है। सर्वप्रथम वह बलपूर्वक अपहृत होने के बावजूद अपने विवाह प्रस्ताव को नकारती है। इसकी अनुमति धर्मशास्त्र में कन्या को नहीं दी गई है। नीलिमा लिखती हैं, विविध रंगी स्त्री चरित्रों, उनके आचरण से स्पष्ट है कि प्राचीन काल में समाज का एक सीमित हिस्सा धर्मशास्त्रीय निदर्श के अनुरूप संचालित था।

उसे पूरे समाज का प्रतिबिंबन नहीं मान लेना चाहिए। उनका यह भी मानना है कि कुन्ती और द्रौपदी के चरित्र भी आभास कराते हैं कि पितृसत्ता में पतिव्रता स्त्री वह नहीं, जो एक पुरुष के प्रति एकनिष्ठ हो बल्कि वह है जो पुत्र और पत्नी की भूमिकाओं में अपनी भूमिका को नियंत्रित करने का अधिकार, अपने बारे में निर्णय लेने का अधिकार, परिवार के पुरुष सदस्यों पिता, व पुत्र को सौंप देती है।

नीलिमा पाण्डेय थेरी गाथाओं के माध्यम से भी स्त्री अस्मिता की तलाश करती हैं। कुछ इतिहासकारों की अवधारणा के हवाले से वह कहती हैं, बौद्ध धर्म ने तत्कालीन समाज में स्त्री की प्रस्थिति को ऊपर उठाया। संभवत: इस अवधारणा के मूल में गौतम बुद्ध द्वारा स्त्रियों को बौद्ध संघ में प्रविष्ट होने की अनुमति देना है। किन्तु संघ में उनको प्रवेश देने की गौतम बुद्ध की प्रारम्भिक हिचक, उनके संघ में प्रवेश सम्बंधित नियम, संघ में उनके आचरण को लेकर तय की गई पाबंदियाँ यह बताती हैं कि तत्कालीन समाज की ही भांति बौद्ध धर्म भी अपने प्रारूप में पितृसत्तामक सोच से प्रभावित था। इस बात के पक्ष में नीलिमा थेरियों द्वारा रचे गए अनेक गीतों का भी अपने अध्ययन में उल्लेख करती हैं।

हालांकि वह पाती हैं कि सामाजिक-सांघिक भेदभाव से संघर्ष करती, जूझती स्त्रियों में से अनेक ऐसी हैं, जिन्होंने बौद्ध संघ और धर्म में अपने लिए महत्वपूर्ण प्रतिष्ठित और सम्मानित स्थान प्राप्त करने गौरव हासिल किया। सभी स्त्रियों को अपनी योग्यता और प्रबुद्धता को दशार्ने का अवसर महाप्रजापति गौतमी के सतत प्रयासों से मिला। स्त्रियों के प्रति सदेच्छा की भावना ही उनका सर्वाधिक उल्लेखनीय योगदान है, जिसने तमाम स्त्रियों के निराश जीवन में आशा का संचार कर उनके जीवन को एक नयी दिशा दी और इतिहास में स्त्रियों को अपनी पृथक पहचान भी दी।

जातक कथाओं को भी नीलिमा ने अपने अध्ययन का स्रोत बनाया है। कुल 500 जातक कथाओं का कथानक राजतंत्र की पृष्ठभूमि पर विकसित है। 600 ई.पू. की नगरीय क्रांति के बाद उत्तर भारत के शहर और समाज से तो परिचित कराती ही हैं, साथ ही इस समाज का अपनी स्त्रियों के प्रति क्या दृष्टकोण था, इसे भी जातक कथाओं के माध्यम से समझा जा सकता है। स्त्रियों को सम्बोधित करने वाला जातकों का प्रिय शब्द ‘दुश्चरित्र स्त्री’ था।

नीलिमा अनेक जातक कथाओं के माध्यम से यह नतीजा निकालती हैं कि स्त्री के दुगुर्णों को जातक एवं धर्मशास्त्रों में ‘स्त्री स्वभाव’ कहकर व्याख्यायित किया गया है और स्त्री के प्रति यह द्वेषपूर्ण रवैया समाज की पितृसत्तात्मक मनोवृत्ति के अनुरूप है।

नीलिमा प्राचीन भारतीय समाज में वेश्यावृत्ति के प्रचलित स्वरूपों का अध्ययन करती हैं। इस अध्ययन में वह पाती हैं कि वेश्यावृत्ति पेशे से संबंधित अधिकांश साहित्य पुरुषों द्वारा रचा गया है। यदि उस काल की कोई स्त्री रचना उपलब्ध होती तो इस संदर्भ में बेहतर अन्तर्दृष्टि मिलती और वेश्याओं के मानवीय भावनात्मक सरोकारों से हम परिचित हो पाते। नीलिमा पाण्डेय स्त्री अस्मिता की तलाश में भोजपुरी और अवधी गीतों का भी अध्ययन करती हैं, वर्णाश्रम व्यवस्था में स्त्री(देवी या दासी) अस्मिता की खोजबीन करती हैं, कलियुग में स्त्री की स्थिति और प्रस्थिति पर बात करती हैं।

मकसद वही है पितृसत्ता के उत्स तलाशना और स्त्री अस्मिता की खोज करना। ‘इतिहास में स्त्री अस्मिता की तलाश’ किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए नहीं लिखी गई है|

बल्कि इस दिशा में संभवत: यह पहला पत्थर है, जो और भी बहुत सारे छात्रों, शिक्षाविदों को इस दिशा में काम करने के लिए प्रेरित करेगा। निश्चित रूप से विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए एक बेहद उपयोग किताब साबित हो सकती है। यह किताब स्त्री विमर्शकारों को भी बहुत से पूर्वाग्रहों से मुक्ति का रास्ता दिखाएगी-अगर वे मुक्त होना चाहें।

सुधांशु गुप्त


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