
आमतौर पर विवाह समारोहों में होने वाले रूढ़ और पारंपरिक रीतिरिवाजों तथा कर्मकांडों से बचता हूं। कुछ स्थानीय और करीब के लोगों के निमंत्रण पर रिसेप्शन या प्रीति-भोज में कभी-कभार शामिल हो जाता हूं, लेकिन दूर यात्रा करके शामिल होने में शारीरिक कष्ट होता है। फिर भी कभी-कभी ऐसी परिस्थिति निर्मित हो जाती है कि वह कष्ट आपको सहर्ष (!) उठाना पड़ता है। यात्राओं में कष्ट के अलावा कुछ मीठे-खट्टे अनुभव भी होते हैं, जो यादगार बन जाते हैं। हाल ही में हमारे एक आरंभिक दिनों के कोई तीन दशक पुराने सहकर्मी के पुत्र के विवाह में कानपुर जाना पड़ा। चूंकि जयपुर से कानपुर का सीधा टिकिट उपलब्ध नहीं था, अत: जयपुर से आगरा और फिर टूंडला से कानपुर का टिकिट कनफर्म हुआ। आगरा से टूंडला तक कोई तीस कि मी दूरी टैक्सी या आॅटो से तय करनी थी। एक संभावना यह भी थी कोई ट्रेन यदि उस बीच हो तो अधिक सुविधाजनक रहेगा। खैर जयपुर से इंटरसिटी से करीब एक बजे दोपहर आगरा फोर्ट पहुंचज्ञ अधिकांश गाड़ियां देरी से चल रही थीं, लेकिन रेलवे की अघोषित कार्यप्रणाली के तहत उन्हें धीरे-धीरे देरी से घोषित करने की रवायत थी, तो एक ट्रेन जो एक घंटे देरी से आने की संभावना थी मैं प्लेटफॉर्म पर बैठ उसकी प्रतीक्षा करने लगा।
तभी जीआरपी और आरपीएफ का एक दस्ता यात्रियों से प्लेटफॉर्म खाली करवाने लगा। बोले एक स्पेशल ट्रेन आ रही है। सभी प्रतीक्षा करने वाले यात्रियों को बाहर जाना होगा। मुझे पुलिसकर्मी ने उच्चश्रेणी प्रतीक्षालय में बैठने की सलाह दीे कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद यह पता चला कि मैं जिस ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहा था वह और लेट हो गई है, लेकिन तभी वह स्पेशल बताई गई ट्रेन आ गई। यह कोई स्पेशल ट्रेन नहीं थी, बल्कि एक रूटीन ट्रेन थी, जो हफ्ते में शायद दो एक दिन चलती थी। संभवत: विशेष यह रहा होगा कि यह भावनगर गुजरात से आ रही थी और कोई विशेष धार्मिक समूह किसी तीर्थ स्थान जा रहा था। इसमें इतना नाटक करने की क्या बात थी, मुझे समझ नहिं आया। बहरहाल, प्रतीक्षालय पास में बैठे एक युवा यात्री को मेरी चिंता थी कि यदि मैं टूंडला जल्दी नहीं पहुंच सका तो मेरी आगे वाली ट्रेन छूट जाएगी। उसी वक्त उसने ऊबर से टैक्सी बुक कर दी और मुझे टैक्सी नंबर, ओटीपी और ड्राइवर का नंबर दे दिया। मैं बाहर आ गया, कैब ड्राइवर को तलाशा। वह मिला, लेकिन ऊबर द्वारा तय किराये पर जाने को राजी नहीं हुआ। उसने सौ रुपये अधिक चाहे। मुझे जल्दी पहुंचना था अत: राजी होने के अलावा कोई और चारा नहीं था।
एक घंटे में मुझे टूंडला स्टेशन पहुंचना था। समय पर मैं टूंडला स्टेशन पहुंच गया। मैं प्रतीक्षालय में मिले युवक की सामाजिकता और व्यवहारिकता से प्रसन्न था। यदि कुछ देर मैं और ठहरता तो मेरी ट्रेन छूट जाती। आने वाली ट्रेन भी थोड़ी देरी से चल रही थी। कुछ प्रतीक्षा के बाद वह स्टेशन पर आ गई और पांच मिनिट बाद गंतव्य की ओर रवाना हुई। मेरी सीट पर लखनऊ जाने वाली दो महिलाएं बैठी थीं। मैने उन्हें अपना सीट नंबर बताया तो उन्होंने मुझे आगे एक सीट पर बैठने को कहा जो उनमें से एक की थी। मुझे कोई परेशानी नहीं थी। बैठने की बराबर जगह थी।
गाड़ी आगे बढ़ रही थी, मुझे थोड़ी-थोड़ी देर बाद कुछ फोन काल आ रहे थे जो सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक थे। दो नंबर, दो अलग-अलग मोबाइल सेट में थे। दोनों मोबाइल दो अलग-अलग जेबों में रखे थे। उन्हीं में से एक जेब में पर्स और रूमाल भी था। मोबाइल बार-बार निकालता और जेब में रखता था। इसी प्रक्रिया में मेरा पर्स सीट के नीचे गिर गया। उस पर मेरा ध्यान नहीं गया। गाड़ी कानपुर रुकी और मैं उतर कर प्लेटफॉर्म से बाहर आ गया। तभी मुझे एक काल आया। उसने पूछा आप शैलेंद्र सिंह बोल रहे हैं, मैंने कहा जी हां बोल रहा हूं। उधर से आवाज आई, देखिये कहीं गिरा हैं। मैंने कहा, गिरना तो नहीं चाहिए फिर भी देख लेता हूं। जेब टटोली तो वाकई में पर्स नहीं था। मैंने कहा, गिरा तो है। आवाज आई, मैं टीटीई गौरव शाह बोल रहा हूं। पर्स मेरे पास है। उसमें छह हजार से कुछ अधिक रुपये हैं और पेन कार्ड हैं। मैंने कहा, स्टेशन पर आकर ले लेता हूं। बोले, गाड़ी चल चुकी है। तो फिर कैसे लिया जाएगा? मैंने पूछा? उन्होंने कहा, एक तरीका है यदि लखनऊ में कोई परिचित हो और मुझसे स्टेशन पर आकर ले ले तो ठीक अन्यथा फिर जीआरपी थाने में जमा करा दूंगा। कागजी कार्यवाई करनी पड़ेगी। अब इतनी जल्दी लखनऊ में किसी को ढूंढ़ कर स्टेशन भेजना संभव नहीं है। मैंने रिक्वेस्ट की आप इसे अपने साथ घर ले जाइए, सुबह तक मैं कुछ इंतजाम करता हूं। इसके बाद मैंने जिनके यहां विवाह में जाना था, उनसे पूछा कि क्या लखनऊ में उनका कोई परिचित है जो पर्स कलेक्ट कर सके? उन्होंने कहा दो लोग हैं, उनसे बात करता हूं। कल वे लोग शादी में भी आएंगे।
बात होने के बाद गौरव शाह का नंबर उन्हें दे दिया। उनमें से एक महेश द्विवेदी ने गौरव शाह से बात कर सुबह पर्स लेने का निश्चय कर लिया। रात के दस बज चुके थे। मुझे जहां शादी में जाना था, वह जगह स्टेशन से काफी दूर थी और मैट्रो के निर्माण के चलते बहुत जाम लगता था, अत: ऊबर और ओला आॅटो और कैब वाले जाने को तैयार नहीं हो रहे थे। मैंने वहां खड़े एक आॅटो वाले से पूछा कि मुझे फलां जगह जाना है चलोगे? बोला, तीन सौ रुपये लगेंगे और पता ठिकाना समझाना होगा। वह जीपीएस का इस्तेमाल नहीं करता था। मैंने जहां जाना था, उनसे आॅटो वाले को रास्ता और पता समझाने के लिए कहा। वह समझ गया। रात सवा ग्यारह बजे मैं गंतव्य पर पहुंच गया। उसके फोन नंबर पर यूपीआई से पैसा भी चुका दिया। मुझे जब से पर्स खोने की सूचना मिली, मैंने मन से अपने आपको पर्स से डिटैच कर लिया था। मुझे नहीं लग रहा था कि कुछ अनापेक्षित हुआ है। मैंने आराम से खाना खाया और सो गया।
सुबह नहा-धोकर चाय नाश्ता किया। शत्रुघ्न जिनके बेटे की शादी थी और महेश द्विवेदी जो उसी प्रतिष्ठान में काम करते हैं, जहां से मैं सेवा निवृत्त हुआ हूं, पर्स पाने की प्रक्रिया में लगे हुए थे। महेश द्विवेदी ने अपने एक वरिष्ठ सहकर्मी जो जो गौरव शाह के पास रहते थे, उनसे पर्स लाने की रिक्वेस्ट की। वह तैयार हो गए। वह घर से निकल ही रहे थे, तभी उनकी बेटी कहीं गिर पड़ी और उसे चोट आ गई। उसे अस्पताल ले जाने के चक्कर में वे पर्स लेना भूल गए। यह द्विवेदी जी से सूचना मिली। तब मैने अपने एक और पूर्व सहकर्मी उमेश जी को फोन लगाया। उन्हें समस्या बताई और गौरव शाह का नंबर दिया। वे गौरव शाह से बात कर उनके घर जाने को तैयार हो गए। एकाध घंटे बाद वे वहां पहुंचे और शाह जी से मेरी बात कराई। गौरव शाह की ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा देखकर मैं चकित था। अंतत: लखनऊ घूमघाम कर पर्स मेरे पास लौट आया।


